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मंगलवार, 26 अप्रैल, 2005 को 21:56 GMT तक के समाचार
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विवादों के साथ फ़ैशन वीक का समापन

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कई आकर्षक डिज़ाइन देखने को मिले
रैंप पर सधी चाल चलते मॉडलों और अपने कामों को लेकर चहकते-महकते डिज़ाइनरों का देश की राजधानी में पिछले सात दिनों से चल रहा मेला आज समाप्त हो गया, अपने भीतर तमाम संभावनाओं और सवालों को समेटे हुए.

इस बीच कितने ही नए चेहरे और नए डिज़ाइनों के साथ शुरू हुए इस मेले में इसबार कारोबार से लेकर काम तक तमाम नए अनुभवों से भारतीय फ़ैशन जगत रूबरू हुआ.

50 से ज़्यादा डिज़ाइनरों का काम और पहली बार बड़े पैमाने पर विदेशी मीडिया की हिस्सेदारी, पहली नज़र में पूरे हफ़्ते की बानगी अच्छी ही जाती है.

पर बानगी का मुँह देखनेभर से काम नहीं चलता और आयोजन के संयोजन से लेकर रैंप की रोशनी तक की तमाम अव्यवस्थाओं ने भी आयोजन के दूसरे पहलुओं पर ग़ौर करने की ज़रूरत समझाई.

कुछ मीठा

कारोबार की नज़र से इस बार आयोजित, छठा लैक्मे इंडिया फ़ैशन वीक डिज़ाइनरों के लिए अच्छा साबित हुआ है.

कई डिज़ाइनरो का काम तो काफ़ी सराहनीय और सुंदर था. ख़ासकर सूफ़ी थीम पर बने वस्त्र और पारंपरिक छाप वाले डिज़ाइनों को काफ़ी सराहना मिली.

इसबार इस फ़ैशन मेले में 40 से ज़्यादा विदेशी ख़रीददारों ने भारतीय डिज़ाइनरों के काम को देखा और उसपर अपनी बोली भी लगाई.

हालांकि कारोबार उम्मीदों के अनुरूप नहीं हुआ पर इस बारे में जब हमने कुछ डिज़ाइनरों से बात की तो उनमें से एक, राघवेंद्र राठौर ने हमें बताया, “भले ही अभी कारोबार कम हुआ हो, पर इसके ज़रिए हम विदेशी ख़रीददारों को अपना काम दिखा पाते हैं और इसका हमें दूरगामी लाभ मिलता है.”

वो बताते हैं, “इसबार तो तमाम डिज़ाइनरों के पास रात की पार्टियों में जाने का वक्त भी नहीं था क्योंकि वो उस वक्त में अपने ख़रीददारों के साथ मीटिंग कर रहे थे. हमारे पास काम बढ़ा है और साथ ही दुनियाभर में हमारे काम का महत्व भी.”

वीक में हिस्सा ले रहे कई डिज़ाइनरों ने हमें बताया कि इस फ़ैशन वीक का मूल्यांकन करने पर हम इसे भारत के नहीं, एशिया का फ़ैशन वीक कहना पसंद करेंगे.

कुछ खट्टा भी

पर इससे बहुत ख़ुश होने की ज़रूरत नहीं है.

विदेशी ख़रीददार आए तो काफ़ी, पर वो ऑर्डर भारतीय डिज़ाइनरों को ठोक-बजाकर ही देंगे.

 भले ही अभी कारोबार कम हुआ हो, पर इसके ज़रिए हम विदेशी ख़रीददारों को अपना काम दिखा पाते हैं और इसका हमें दूरगामी लाभ मिलता है.
राघवेंद्र राठौर

सुनीत वर्मा के डिज़ाइन चोरी के आरोप के साथ इसबार डिज़ाइनरों में इसे लेकर कुछ असंतोष दिखा कि उनको अपना सामान प्रदर्शित करने के लिए जो जगह दी गई थी वो आपदा प्रबंधन के साथ तमाम दूसरी सुविधाओं के मामले में अंतरराष्ट्रीय मानकों से कहीं पीछे थी.

और तो और, इसबार एक एक डिज़ाइनर से रैंप के किराए के रूप में ढाई-ढाई लाख रूपए वसूल किए गए जो कुछ डिज़ाइनरों के मुताबिक पिछली बार से काफ़ी ज़्यादा है.

हालांकि इस बारे में कोई डिज़ाइनर खुलकर बोलने को तैयार नहीं था पर जवाब में फ़ैशन डिज़ाइनर्स काउंसिल ऑफ़ इंडिया की प्रमुख रति विनय झा ने हमें बताया, “यह राशि तो काफ़ी कम है. उन्हें पर्याप्त सब्सिडी दी गई है पर अगले आयोजन में तो और ज़्यादा पैसा लिया जाएगा.”

कुछ सुगबुगाहट मॉडलों को किए जा रहे भुगतान को लेकर भी थी.

पर इसके अलावा सबसे बड़ा सवाल था कुछ नया न कर पाने का. तमाम दर्शकों और पत्रकारों से जब पूरे सप्ताह के दौरान बात की तो उनका कहना था कि कुछ डिज़ाइनरो को छोड़ दें तो काफ़ी काम तो पुराने जैसा ही था और कहीं कहीं पश्चिम से प्रेरित भी.

और यह टिप्पणी भारतीय डिज़ाइनरों के लिए सबसे बड़ी चुनौती भी है.

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