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बुधवार, 20 अप्रैल, 2005 को 20:23 GMT तक के समाचार
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दिल्ली में 'इंडिया फ़ैशन वीक' की धूम

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ये कार्यक्रम 20 से 26 अप्रैल तक दिल्ली के एक पाँच सितारा होटल में चल रहा है
नपे और सधे कदमों का कैटवॉक, लंबा रैंप और उनके इर्दगिर्द बैठे तमाम लोग, चमकते हुए फ़्लैश और चहकते हुए मॉडल, चैनलों पर लाइव डिज़ाइनर और पाँच सितारा होटल की चमचमाती लॉबी.

ये किसी पश्चिमी देश की बात नहीं, ये नज़ारा था भारत की राजधानी, दिल्ली में 'लैक्मे इंडिया फ़ैशन वीक' के छठे समारोह की शुरुआत का.

ये कार्यक्रम 20 अप्रैल से 26 अप्रैल तक दिल्ली के एक पाँच सितारा होटल में चलेगा. हर साल की तरह इस बार भी कई मॉडल इसमें भाग ले रहे हैं और कई डिज़ाइनरों के काम का प्रदर्शन हो रहा है.

पचास से अधिक डिज़ाइनर

 हमारी 25 हज़ार करोड़ के कुल निर्यात में एक प्रतिशत की भूमिका भी नहीं है पर डिज़ाइनर कपड़े आम लोगों के लिए नहीं है. ये कुछ ख़ास लोगों के लिए होते हैं जो दुनियाभर में इस काम को पसंद कर खरीदते हैं
आयोजन की मार्किटिंग निदेशक

समारोह में रोहित बल, रितु कुमार, मुजफ़्फ़र अली, सब्यसाची, रीना ढाका, शहज़ाद कालिम, अबू संदीप, रोहित गाँधी, वेंडेल रॉड्रिक्स, सत्या पॉल सहित देशभर के कोई 50 से ज़्यादा नामी डिज़ाइनर हिस्सा ले रहे हैं.

आयोजन की शुरुआत हुई रितु कुमार के डिज़ाइन किए हुए परिधानों से.

सूती कपडों पर कश्मीर, लद्दाख, पँजाब और राजस्थान के पारंपरिक रंगों और शैली पर आधारित इन परिधानों में भारतीयता की साफ़ झलक थी जो रितु कुमार की ख़ास पहचान भी है.

रीना ढाका जब अपने परिधानों में लिपटे मॉडलों को रैंप पर लेकर आईं तो लोग चौंक से गए.

काले-गर्म कपड़ों में लिपटे मॉडलों को देखने के बाद जब उनसे पूछा कि इन रोंगों के चयन की क्या वजह है तो उन्होंने कहा, "मेरे ये कपड़े सर्दियों के लिए हैं. ऐसा इसलिए किया क्योंकि दुनियाभर से जो डिज़ाइनर कपड़ों के ख़रीददार यहाँ आए हैं, उन्हें हमारा काम समझने में अभी कुछ वक्त लगेगा और उनके ऑर्डर का माल तैयार करने में हमें. तब तक तो सर्दी आ जाएगी इसीलिए आयोजन में गर्म कपड़े लेकर आई हूँ."

आयोजन की मार्किटिंग निदेशक रति विनय झा ने बीबीसी को बताया कि इस बार डिज़ाइनर कपडों के ख़रीददारों की संख्या बढ़ी है और 40 से ज़्यादा ख़रीददार तो भारत से बाहर के हैं.

 मैं नहीं मानता कि हम पश्चिम की नकल कर रहे हैं. हाँ, इतना ज़रूर है कि हमारे ख़रीददार पश्चिम में ज़्यादा हैं, हमें अंतरराष्ट्रीय बाज़ार को ध्यान में रखकर काम करना होता है पर आलोचकों का काम तो आलोचना करना ही है
रोहित बल

जब उनसे डिज़ाइनर कपड़ों के निर्यात की कुल वस्त्र निर्यात की तुलना में बहुत कम होने का पूछा गया तो उन्होंने बताया, "हमारी 25 हज़ार करोड़ के कुल निर्यात में एक प्रतिशत की भूमिका भी नहीं है पर डिज़ाइनर कपड़े आम लोगों के लिए नहीं है. ये कुछ ख़ास लोगों के लिए होते हैं जो दुनियाभर में इस काम को पसंद कर खरीदते हैं."

'नकल नहीं'

आयोजन शुरू हुआ तो कभी तो ऐसा लगा कि काम में देश की अपनी कला-संस्कृति का कुछ प्रभाव है पर कुछ को देखकर ऐसा भी भ्रम हुआ कि कहीं यह पश्चिमी परिधानों की नकल तो नहीं.

भारतीय डिज़ाइनरों पर ऐसे आरोप भी लगते ही रहे हैं पर मशहूर डिज़ाइनर, रोहित बल इससे असहमत हैं.

उन्होंने बीबीसी से बातचीत में कहा, "मैं नहीं मानता कि हम पश्चिम की नकल कर रहे हैं. हाँ, इतना ज़रूर है कि हमारे ख़रीददार पश्चिम में ज़्यादा हैं, हमें अंतरराष्ट्रीय बाज़ार को ध्यान में रखकर काम करना होता है पर आलोचकों का काम तो आलोचना करना ही है."

देखना यह है कि फ़ैशन डिज़ाइनिंग के क्षेत्र में भारतीय फ़ैशन जगत अपनी पहले की छवि से कितना बाहर निकल पाता है और कितना नया कर पाता है.

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