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मंगलवार, 16 नवंबर, 2004 को 21:27 GMT तक के समाचार
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दार्जीलिंग में कार्निवल की धूम

दार्जीलिंग कार्निवल
दार्जीलिंग में दो वर्षों से मनाया जा रहा है कार्निवल
कहीं असम का बिहू नृत्य हो रहा है तो कहीं मणिपुरी नर्तकों ने समां बांध रखा है. एक जगह अगर विश्व धरोहर में शामिल ट्वाय ट्रेन की सवारी की होड़ मची है तो दूसरी जगह लोग स्थानीय रॉक बैंड की ताल पर झूम रहे हैं.

‘पहाड़ों की रानी’ के नाम से मशहूर पश्चिम बंगाल के इस इकलौते पर्वतीय पर्यटन केंद्र में इन दिनों बहुरंगी संस्कृति सिमट आई है. यहाँ सात नवंबर से शुरू दार्जिलिंग कार्निवाल सही मायने में ‘अनेकता में एकता’ का प्रतीक बन गया है.

दस दिनों तक चलने वाले इस उत्सव को देखने के लिए देश के दूर-दराज़ के राज्यों के अलावा विदेशों से भी पर्यटकों का तांता लगा हुआ है.

मुंबई के रमेश कुलकर्णी और उड़ीसा के बारीपदा जिले के अश्विनी नायक तो दार्जिलिंग पहुँचते ही आश्चर्यचकित रह गए. वे हालाँकि पहले भी यहाँ आ चुके हैं, लेकिन इस बार की तरह पहले कभी उनका स्वागत नहीं हुआ था.

 मैं देश के कई शहरों में घूम चुका हूँ. लेकिन यहाँ अनजान लोगों ने जिस तरह मेरा स्वागत किया उससे अचानक लगा कि मैं किसी पराए शहर में नहीं, बल्कि अपनों के ही बीच हूँ
एक पर्यटक

दार्जिलिंग बस स्टैंड पर उतरते ही गमछा, जिसे स्थानीय भाषा में ‘खादा’ कहते हैं, ओढ़ा कर उनका स्वागत हुआ. उनको दार्जिलिंग चाय का एक पैकेट भी उपहार में दिया गया.

दिल्ली के अजय सक्सेना कहते हैं कि "मैं देश के कई शहरों में घूम चुका हूँ. लेकिन यहाँ अनजान लोगों ने जिस तरह मेरा स्वागत किया उससे अचानक लगा कि मैं किसी पराए शहर में नहीं, बल्कि अपनों के ही बीच हूँ."

'पर्यटक मित्र नगर'

तमिलनाडु से आए टी श्रीनिवासन को शहर में घुसने के पहले जब सड़क पर वाहनों की लंबी कतार नजर आई तो उन्होंने समझा सड़क जाम है. लेकिन जब कार्निवाल की जानकारी मिली तो उनके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा.

कार्निवल में नृत्य
कार्निवल में मणिपुरी से लेकर रॉक संगीत सब कुछ था

कार्निवाल के दौरान इस पर्वतीय शहर में आने वाले पर्यटकों के स्वागत का जिम्मा पर्वतीय परिवहन संगठन दार्जिलिंग गोर्खा हिल ट्रांसपोर्ट ज्वायंट एक्शन कमिटी ने उठाया है. उनके सदस्य बस स्टैंड और रेलवे स्टेशन पर खड़े रहते हैं.

दार्जिलिंग को पर्यटक-मित्र नगर के तौर पर विकसित करने के लिए बीते साल ही इस कार्निवाल की शुरूआत हुई थी. राज्य सरकार और विभिन्न संगठनों के अलावा ब्रिटिश काउंसिल ने मिलकर इसका आयोजन किया है.

इस समय सिर्फ दार्जिलिंग शहर ही नहीं, बल्कि पूरा पर्वतीय क्षेत्र अनोखे उत्साह और रंग में डूबा है. पर्यटकों की दिन-ब-दिन बढ़ती तादाद के कारण स्थानीय होटलों में कोई कमरा खाली नहीं है.

शहर के हर प्रमुख स्थान पर लोगों की भीड़ नज़र आती है. शाम ढलते ही कंपकंपाने वाली सर्दी के बावजूद देर रात तक शहर में चहल-पहल बनी रहती है.

कार्निवाल ने मानों पर्यटकों और स्थानीय लोगों के जीवन में कई नए रंग घोल दिए हैं.

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