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दंगों पर बनी फ़िल्म सेंसर बोर्ड में अटकी | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारतीय फ़िल्म सेंसर बोर्ड ने गुजरात दंगे पर बनी फ़िल्म 'फ़ाइनल सॉल्युशन' को प्रदर्शन की अनुमति देने से इनकार कर दिया है. फ़िल्म के निर्देशक राकेश शर्मा ने बीबीसी को बताया कि सेंसर बोर्ड ने पिछले दिनों मुंबई में एक रिव्यू बैठक में यह 'एकतरफ़ा' फ़ैसला किया. बोर्ड के कुछ सदस्यों पर दक्षिणपंथी होने का आरोप लगाते हुए उन्होंने कहा कि चूँकि उनकी फ़िल्म गुजरात दंगों में दक्षिणपंथी ताक़तों की भूमिका को उजागर करती है इसलिए इसके ख़िलाफ़ फ़ैसला किया गया है. शर्मा ने सेंसर बोर्ड की इन आपत्तियों को हास्यास्पद बताया कि 'फ़ाइनल सॉल्युशन' के प्रदर्शन से देश में सांप्रदायिक दंगे शुरू हो सकते हैं और पड़ोसी देश से भारत के संबंधों पर बुरा असर पड़ सकता है. उन्होंने कहा, "सेंसर बोर्ड का आरोप है कि मेरी फ़िल्म राष्ट्रीय अखंडता और एकता की भावना पर चोट करती है, जबकि सच्चाई यह है कि इसमें समाज को बाँटने वालों की असलियत उजागर करने का प्रयास है." 'पुराने क़ानून' शर्मा ने कहा कि उनकी फ़िल्म में उन दृश्यों का इस्तेमाल किया गया है जो कि टेलीविज़न पर पहले ही कई बार दिखाई जा चुके हैं.
सिनेमाटोग्राफ़ एक्ट-1952 की समीक्षा किए जाने की ज़रूरत बताते हुए शर्मा ने कहा, "पचास वर्षों में ज़मीनी वास्तविकताएँ काफ़ी बदल चुकी हैं, इसलिए इस क़ानून में व्यापक फ़ेरबदल की ज़रूरत है." ग़ौरतलब है कि 'फ़ाइनल सॉल्युशन' को अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सवों में अनेक पुरस्कार मिल चुके हैं जिनमें बर्लिन, हांगकांग और ज़ंज़ीबार के फ़िल्म महोत्सव शामिल हैं. 'फ़ाइनल सॉल्यूशन' में गुजरात में फ़रवरी 2002 में शुरू होकर कई महीने तक चले सांप्रदायिक दंगों की गहराई से पड़ताल की गई है. डॉक्यूमेंट्री शैली में बनी 218 मिनट की इस फ़िल्म में फ़रवरी 2002 से जुलाई 2003 के बीच के गुजरात को फ़िल्माया गया है. फ़िल्म में सांप्रदायिक दंगों की विभीषिका को भोगने वाले मुसलमानों और हिंदुओं की दास्तान तो है, साथ ही कट्टरपंथी ताक़तों के उभार को भी समझने की कोशिश की गई है. |
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