BBCHindi.com
अँग्रेज़ी- दक्षिण एशिया
उर्दू
बंगाली
नेपाली
तमिल
सोमवार, 27 अक्तूबर, 2003 को 05:45 GMT तक के समाचार
मित्र को भेजेंकहानी छापें
सब मिलता है लंदन में

साउथॉल में ख़रीदारी करती महिलाएँ
साउथॉल में ख़रीदारी करती महिलाएँ

आम तौर पर दीवाली की मूर्तियाँ और पटाख़े बिकते तो भारत के हर शहर में हैं, मगर हर शहर में कुछ ख़ास इलाक़े ऐसे होते हैं जहाँ से बड़े पैमाने पर इनकी ख़रीदारी होती है.

जैसे दिल्ली का सदर बाज़ार या बनारस का गोदौलिया या फिर पटना में पटना सिटी, दीवाली में ये इलाक़े ख़रीदारी के सबसे नामी बाज़ार समझे जाते हैं.

लंदन में भी ऐसा ही एक इलाक़ा है साउथॉल. भारत में ख़रीदी जा सकने वाली तक़रीबन हर काम की चीज़ यहाँ मिल जाती है.

चाहे कपड़े हों, हिंदी सिनेमा के कैसेट, जलेबी-समोसे या फिर मूर्तियाँ और पटाख़े.

दीवाली के सामान


 जहाँ तक भारत की चीज़ों की बात है तो देसी पटाखों को छोड़कर भारत की बनी हर चीज़ मिल जाती है यहाँ

एसएस सीकरी

साउथॉल में पिछले बीस वर्षों से लिटिल इंडिया नाम की दूक़ान चला रहे एसएस सीकरी का कहना है,"जहाँ तक भारत की चीज़ों की बात है तो देसी पटाखों को छोड़कर भारत की बनी हर चीज़ मिल जाती है यहाँ".

दिल्ली या ऐसे ही किसी ‘फुटपाथ-संपन्न’ शहर की तर्ज़ पर साउथॉल में भी फुटपाथों पर क़दम बढ़ाते कई जगहों पर मूर्तियाँ, दीए और मोमबत्तियाँ जैसी भारतीयों को अपनी ओर आकर्षित करती हैं.

कीमतें

लक्ष्मी की मूर्तियाँ 4 पाउंड से लेकर 100 पाउंड तक में ख़रीदी जा सकती हैं यानी 300 रूपए से लेकर साढ़े सात हज़ार रूपए तक.

दीए रंग-बिरंगे भी मिलते हैं और खांटी देसी स्टाईल वाले भी. रंग-बिरंगे चार दीए तीन पाउंड और देसी दीए एक पाउंड के दो या तीन मिल जाते हैं.एक मोटी सी मोमबत्ती के जोड़े की कीमत एक पाउँड है.

यानी 300 रूपए की छोटी-सी मूर्ति और 37 रूपए का बड़ा दीया.

 रौनक पहले कम रहा करती थी मगर अब साल-दर-साल ये बढ़ रही है. अब दूक़ानें भी ज़्यादा हो गई हैं

आनंद सदानी

याद पड़ता है कुछ साल पहले तक भारत के एक साधारण शहर में दीवाली पर दस-बीस रूपए में सौ-सौ दीए मिल जाते थे और मूर्तियों के लिए 30 रूपए भी बड़ी बात हुआ करती थी.

ख़याल आया कि मिट्टी लंदन की है तो मूर्ति तो महँगी होगी ही. मगर ऐसा नहीं है, न मिट्टी लंदन की थी और न मूर्तियाँ.

'ऑल यू नीड' नाम की दूकान के युवा मालिक भरत ने बताया कि सारी मूर्तियाँ भारत से आती हैं.

हाँ पटाखे भारत के नहीं होते. पटाखे सारे चीन के बने होते हैं.

चीन के पटाखे

रॉकेट, फुलझड़ी, चकरी, अनार सब मिलते हैं, मगर सब चीन के. भारत का सुविख्यात ‘मुर्गा छाप’ यहाँ नहीं नज़र आता. यहाँ दिखता है रेड ड्रेगन.

भरत ने बताया,"चीन के पटाखे इसलिए बिकते हैं यहाँ क्योंकि एक तो वे ज़्यादातर आसमान में छोड़े जानेवाले पटाखे होते हैं और साथ ही उनकी कीमतें भी भारतीय पटाखों से कम होती हैं".

लंदन में पटाखे छोड़ने की तो छूट है मगर सुरक्षा के ख़याल से ज़मीन पर छोड़े जानेवाले पटाखों के मामले में सख़्ती बरती जाती है.

इससे जुड़ी ख़बरें
इंटरनेट लिंक्स
बीबीसी बाहरी वेबसाइट की विषय सामग्री के लिए ज़िम्मेदार नहीं है.
सुर्ख़ियो में
मित्र को भेजेंकहानी छापें
मौसम|हम कौन हैं|हमारा पता|गोपनीयता|मदद चाहिए
BBC Copyright Logo^^ वापस ऊपर चलें
पहला पन्ना|भारत और पड़ोस|खेल की दुनिया|मनोरंजन एक्सप्रेस|आपकी राय|कुछ और जानिए
BBC News >> | BBC Sport >> | BBC Weather >> | BBC World Service >> | BBC Languages >>