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लंदन की देसी दीवाली
लंदन की मिट्टी अपनी न सही, उस पर बनी इमारतें अपने यहाँ के जैसी न सही, मगर आसमाँ तो अपने ही देश जैसा लगता है. और रंग-बिरंगी आतिशबाज़ी में आसमान जब एक ही जैसा दिखने लगे तो फिर चाहे भारत हो या लंदन क्या फ़र्क पड़ता है. इसी अपना जैसे लगनेवाले आसमाँ के तले मिलकर लंदन में रह रहे भारतीयों ने लंदन के 'लैंडमार्क' ट्रैफ़ेल्गर स्क्वायर में दीवाली मनाई. वही ट्रैफ़ेल्गर स्क्वायर जिसकी झलक बॉलीवुड की फ़िल्मों में मिलती रहा करती है, कभी हीरो-हीरोईन यहाँ नाचते-गाते नज़र आते हैं तो कभी कबूतरों को दाना खिलाते.
ट्रैफ़ेल्गर स्क्वायर की ये दीवाली एक मायने में मेला जैसी थी, या यूँ कहें कि एक संगीत समारोह. नाच-गाना सबसे ज़्यादा और खान-पान साथ में, ये थी दीवाली. विविधता कुछ लोगों से पूछा तो जवाब मिला," बड़ा अच्छा लग रहा है. भारतीय संस्कृति की झलक मिल रही है." ठीक ही तो है. इतना विशाल देश भारत. विविधताओं का देश. समुंदर और पहाड़ों का देश. हरियाली और रेगिस्तान का देश. विपन्नों और धनपतियों का देश. मीलों चलकर कुएँ से पानी लेनेवाली महिलाओं और मिनरल वाटर के सिवा किसी और पानी को हाथ न लगानेवालों का देश. आख़िर विविधता है तो विविधता झलकेगी भी.
विविधताओं में एकता तलाशने की कोशिश करते इसी समारोह के एक कोने में भगवान गणेश की प्रतिमा भी थी. ऊंची प्रतिमा. लोग वहाँ गणेश जी को 'बैकग्राउंड' में रख फ़ोटो खिंचवा रहे थे. अंग्रेज़ों को भी यहाँ फ़ोटो खिंचवाते देखा जा सकता था. यहीं एक युवा जोड़ा मिला जो सूरत और पहनावे से 'भारत वाले इंडियन' लग रहे थे. भारत वाला इंडियन अब 'भारत वाला इंडियन' क्या होता है ये समझने के लिए 'ब्रिटेन वाले इंडियन' को भी समझना ज़रूरी है. और दीवाली की इस भीड़ में ये फ़र्क आसानी से समझा जा सकता था. 'भारत वाले इंडियन जोड़े' का नाम था मिस्टर एंड मिसेज़ शुक्ला. आईआईटी कानपुर से पढ़े शशांक शुक्ला लंदन में आइबीएम में काम करते हैं और पत्नी वसुधा के साथ दीवाली देखने आए थे. कैसी लगी दीवाली, ये पूछने पर शशांक ने कहा,"दीवाली हमारे यहाँ घरेलू त्योहार होता है मगर यहाँ सब मिलकर मना रहे हैं. दोनों का अपना तरीक़ा है. धूम-धाम वहाँ भी होती ही है, यहाँ भी है." वसुधा बोलीं," सब मुझसे पूछ रहे हैं कि आप कहाँ के हैं, एक-दूसरे को जानने की कोशिश कर रहे हैं. ये बड़ी बात है जो हमारी राष्ट्रीयता को दिखाता है." भारतीयता के इस उत्सव का आयोजन किया था ब्रिटेन की सरकार ने. लंदन के मेयर केन लिविंगस्टन ने पहली बार इतने बड़े पैमाने पर ये आयोजन करवाया. उनके अनुसार,"ऐसे में जब लंदन में हर आठवाँ व्यक्ति एशियाई मूल का हो तो दीवाली जैसे पर्व के उत्सव से लंदन की सांस्कृतिक विविधता की झलक मिलती है."
ट्रैफ़ेल्गर स्क्वायर के अलावा लंदन में और भी भारतीय बहुल इलाक़ों में सरकारी सहयोग से दीवाली मनाई जा रही है. लंदन के मेयर को एशियाई मामलों में सलाह देनेवाले आत्मा सिंह कहते हैं,"अब उपनिवेश काल वाली बात नहीं रही. भारत और भारतीयों का प्रभाव यहाँ साल-दर-साल बढ़ रहा है और अँग्रेज़ों को लगता है कि यहाँ के भारतीयों से उन्हें फ़ायदा हो सकता है." इसमें ज़रा भी शक नहीं कि लंदन में साँप-संपेरों का देश समझे जानेवाले भारत का चेहरा अब तेज़ी से बदल रहा है. और यहाँ बसे भारतीय धीरे-धीरे अपने उस भारत को यहाँ स्थान दिलाने की कोशिश में जुटे हैं जो वतन छोडकर आने के बाद आज भी कभी उनके सपनों तो कभी छलकती आँखों में गाहे-बगाहे झलक जाता है. दीवाली के भारत में जो भी मायने होते हों, लंदन में दीवाली यहाँ के भारतीयों के लिए अपनी मातृभूमि की स्मृतियों को दोहराने की एक ईमानदार कोशिश लगती है. |
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