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गुरुवार, 16 अक्तूबर, 2003 को 08:05 GMT तक के समाचार
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रोम में मदर टेरेसा पर बना संगीत नाटक
मदर टेरेसा पर संगीत नाटक
ये संगीत नाटक लोगों को मदर टेरेसा के जीवन के बारे में बताता है

मदर टेरेसा को संत की उपाधि देने के अंतिम चरण में रोम में आयोजित हो रहे कार्यक्रमों के साथ ही वहाँ के एक थियेटर में उनके जीवन पर आधारित संगीत नाटक दिखाया जा रहा है.

इस मौके पर रोम में काफ़ी बड़ी संख्या में लोग पहुँचे हैं और ये लोग उस संगीत नाटक में काफ़ी रुचि भी ले रहे हैं.

पॉप गानों के ज़रिए दिखाया जा रहा है कि किस तरह मदर टेरेसा ने कोलकाता में पाँच दशकों तक ग़रीबों की मदद की.

पहली रात जब ये प्रस्तुति थियेटर में हुई तो लगभग डेढ़ हज़ार लोग वहाँ मौजूद थे.

शो के लिए पूरी मेहनत करने वाले मिशेल पॉलिसेली का कहना है, "इस शो का मक़सद किसी तरह की राजनीतिक समस्या नहीं दिखाना है बल्कि छोटे-छोटे पहलुओं को उजागर करना है."

 संगीत नाटक के संदेश को और ज़्यादा सच्चा बनाने के लिए काल्पनिक नाटकीयता का पुट डाला गया है

मिशेल पॉलिसेली

संत की उपाधि देने के अंतिम चरण में रोम में आयोजित कार्यक्रमों में लगभग ढाई लाख लोगों के हिस्सा लेने की उम्मीद है.

रविवार को आयोजित होने वाले उस कार्यक्रम से पहले तरह-तरह के आयोजन हो रहे हैं और ये शो भी उन्हीं में से एक है.

इसमें मदर टेरेसा की भूमिका 22 वर्षीया गिआदा नोबाइल ने निभाई है.

लोगों को संदेश

मदर टेरेसा का निधन 1997 में हुआ था और उनके जीवनकाल में ही लोग उन्हें संत के रूप में देखने लगे थे.

अपने मिशनरीज़ ऑफ़ चैरिटीज़ संगठन के ज़रिए उन्होंने ग़रीबों और ज़रूरतमंद लोगों की काफ़ी मदद की.

इस संगीत नाटक में पूरी तरह से मदर टेरेसा के धार्मिक और सामाजिक कार्यों को ही दिखाया गया है.

पॉलिसेली का कहना था, "संगीत नाटक के संदेश को और ज़्यादा सच्चा बनाने के लिए काल्पनिक नाटकीयता का पुट डाला गया है. दरअसल ये मदर टेरेसा की एक तस्वीर है."

इटली में हुआ इसका पहला शो जैसे ही शुरू हुआ वैसे ही लोगों ने तालियाँ बजाकर उसका ज़ोरदार स्वागत किया.

देखने वालों में मुख्यरूप से ननें, शिक्षक और छात्र शामिल थे.

कार्यक्रम देखने अपने छात्रों के साथ पहुँचीं सिस्टर मारिया लुइसा का कहना था कि कार्यक्रम अगर यह बता सकता है कि मदर टेरेसा का व्यक्तित्व किस तरह का था तो इसमें ज़रूर कुछ न कुछ है.

एक अन्य नन का कहना था, "शो ये दिखाने का तरीक़ा है कि मुश्किलें सहकर भी किस तरह साहस बनाए रखा जा सकता है."

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