भारत में ऑनलाइन गेम्स कहीं जुआ तो नहीं जिस पर दाँव लगा रही हैं बड़ी कंपनियाँ

    • Author, अरुणोदय मुखर्जी
    • पदनाम, बीबीसी न्यूज़, दिल्ली

फ़ैसल मक़बूल अपने फोन पर अब ऑनलाइन गेम नहीं खेलते. इसके कई महीने बाद भी वे कई तरह के प्रलोभन से जूझ रहे हैं.

31 साल के मक़बूल पिछले साल ताश का एक ऑनलाइन गेम खेलते-खेलते पांच महीने के भीतर क़रीब 4 लाख रुपए गंवा बैठे. ताश का यह गेम कई खिलाड़ियों के बीच खेला जाता है, जिसमें दाँव पर पैसे लगाए जाते हैं.

मक़बूल कहते हैं, "आप 500 या 1,000 रुपए से शुरू करते हैं. फिर आप पर लालच हावी हो जाता है और आप तब तक अधिक से अधिक पैसे दांव लगाते जाते हैं, जब तक कि आप बुरी तरह नहीं हार जाते. हारने के बाद भी आप खेलते रहते हैं, क्योंकि आप हारे हुए पैसे वापस जीतना चाहते हैं. लेकिन आप हारते ही जाते हैं."

एक वक़्त ऐसा भी था, जब वो अपनी क़रीब 40 हज़ार के वेतन का लगभग 70 फ़ीसदी हिस्सा ऑनलाइन गेम्स में लुटा देते थे. उन्हें अपने दोस्तों से पैसे उधार पर लेना पड़ता था.

फ़ैसल मक़बूल उन लाखों भारतीयों में से एक हैं, जो दांव पर पैसे लगाए जाने वाले 'रियल मनी गेम' यानी आरएमजी को खेलते हैं.

ई-गेमिंग फेडरेशन ऑफ़ इंडिया (ईजीएफ़) का मानना है कि इस तरह के आसानी से उपलब्ध आरएमजी गेम देश के ऑनलाइन गेमिंग इंडस्ट्री का क़रीब 80 फ़ीसदी हैं. इसलिए ईजीएफ़ जैसी संस्था देश में तेज़ी से फैल रहे इस उद्योग पर सेल्फ-रेगुलेशन होने की बात भी कह रहा है.

हालांकि ईजीएफ़ जैसे समूह मक़बूल जैसे ऑनलाइन गेम खेलने वालों के बारे में कहते हैं कि वे 'दांव' लगाते हैं. लेकिन आलोचक ऐसे गेम के लिए कठोर शब्द 'जुआ' का इस्तेमाल करते हैं.

ऑनलाइन गेम की ऐसी वेबसाइटों पर प्रतिबंध लगाकर उसे ब्लॉक करने की कोशिश कर रहे सिद्धार्थ अय्यर सुप्रीम कोर्ट में वकील हैं.

वे कहते हैं, "चाहे कोई भी ऑनलाइन गेम हो, उसमें अंतत: किसी घटना के होने या न होने पर पैसा लगाया जाता है, जो खेलने वालों के हाथ में नहीं होती. चूंकि चीज़ें अनिश्चित होती हैं, इसलिए स्वभाव से यह जुआ है."

मालूम हो कि भारत में जुआ ग़ैर क़ानूनी चीज़ है. मानसिक स्वास्थ्य और लत से जुड़ी समस्याओं का हवाला देते हुए ओडिशा, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना जैसे कई राज्य ऑनलाइन गैंबलिंग जैसे गेम पर प्रतिबंध लगा चुके हैं.

हालांकि केरल और कर्नाटक जैसे राज्य की अदालतों ने सरकार के प्रतिबंधों को रद्द कर दिया है. वैसे सुप्रीम कोर्ट में इस मुद्दे से जुड़ी कई याचिकाएं अभी लंबित हैं.

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन बार-बार इस तरह के गेम पर प्रतिबंध लगाने की मांग करते रहे हैं. तमिलनाडु सरकार का कहना है कि वो ऑनलाइन गैंबलिंग पर प्रतिबंध लगाने के लिए प्रतिबद्ध हैं.

न्यूज़ एजेंसी पीटीआई के अनुसार, इस साल मार्च में तमिलनाडु के क़ानून मंत्री एस रेगुपति ने विधानसभा को बताया, "हम सरकार के बनाए क़ानून को बरक़रार रखने के लिए सुप्रीम कोर्ट गए हैं. हमें आशा है कि सुप्रीम कोर्ट हमारी अपील पर अच्छा फ़ैसला सुनाएगा."

'गैंबलिंग जुआ नहीं स्किल-गेमिंग है'

ऑल इंडिया गेमिंग फेडरेशन (एआईजीएफ) ख़ुद को ऑनलाइन स्किल-गेमिंग में देश की शीर्ष संस्था होने का दावा करता है. इस तरह के गेम के बारे में एआईजीएफ़ का मानना है कि गैंबलिंग और 'ऑनलाइन स्किल गेमिंग' के बीच अंतर करना ज़रूरी है.

एआईजीएफ का दावा है कि इस तरह के गेम में स्किल की भूमिका इसमें मिलने वाले चांस से बड़ी होती है. इसके सीईओ रोलैंड लैंडर्स इस बात को क्रिकेट के उदाहरण से समझाते हैं.

वे कहते हैं, "क्रिकेट में जो टॉस होता है, वो चांस का खेल है. लेकिन उसके अलावा बाकी का क्रिकेट पूरी तरह स्किल पर आधारित है. वैसे गेमिंग ऐप में खेलने वालों को दांव पर लगाए जाने वाले पैसे को सीमित रखने की चेतावनी दी जाती है."

उनका तर्क है कि इसे खेलने वालों द्वारा किए जाने वाले लेन-देन एंट्री फ़ीस के बराबर हैं.

वे कहते हैं, "सिर्फ़ इसलिए कि मनोरंजन (गेमिंग) के एक प्रकार के लिए कोई एंट्री फ़ीस दे रहा है, तो इसका मतलब ये नहीं कि वो जुआ जैसा है. जबकि कई लोग इस गेम को दुनिया के सबसे बड़े मनोरंजनों में से एक मानते हैं."

वे कहते हैं कि किसी फलते-फूलते उद्योग में इस तरह के गेम की ज़बरदस्त कारोबारी संभावनाओं को नज़रअंदाज़ करना महंगा पड़ सकता है.

वैसे भारत में ऑनलाइन गेमिंग का मार्केट हर साल क़रीब 30 फ़ीसदी बढ़ रहा है. इस चलते मीडिया और मनोरंजन क्षेत्र में यह सबसे तेज़ी से बढ़ने वाला सेक्टर बन गया है.

इस उद्योग के क़रीब 40 करोड़ उपभोक्ता हैं. एआईजीएफ का आकलन है कि ऑनलाइन गेमिंग इंडस्ट्री की सालाना आय 7,500 करोड़ रुपए से अधिक है और यह 2025 तक क़रीब 50 हज़ार नई नौकरियां पैदा कर सकती है.

इस उद्योग को कई क्रिकेटरों द्वारा चलाए जा रहे व्यापक प्रचार अभियानों का भी फ़ायदा मिला है.

फ़ैसल मक़बूल कहते हैं, "अपने पसंदीदा क्रिकेटर को जब मैं ऐसे किसी पसंदीदा गेम का प्रचार करते देखता हूं, तो उसे मैं भी आज़माना चाहता हूं."

हालांकि इसके आलोचक इस बाते से चिंतित हैं.

सिद्धार्थ अय्यर कहते हैं, "स्किल का गेम वो हो सकता है, जिसे खेलने के लिए बड़ी एथलेटिक या मानसिक क्षमता चाहिए होती है. और वैसी क्षमता के विकास के लिए सालों के प्रशिक्षण, अभ्यास और लगन की ज़रूरत हो."

एआईजीएफ का कहना है कि तेज़ी से बढ़ रहे गेमिंग उद्योग को कस्टमर की बढ़ती संख्या को पूरा करने के लिए गेम डेवलपर्स, आईटी सपोर्ट और बड़ी कस्टमर केयर टीमों की ज़रूरत है.

संस्था का कहना है कि ऐसे में इस तरह के गेम पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने के बजाय वह क़ानून बनाने वालों के साथ मिलकर उचित नियम बनाने के लिए काम करना चाहती है.

रोलैंड लैंडर्स का प्रस्ताव है कि इस इंडस्ट्री से मिलने वाली आय पर कर लगाया जा सकता है. वे कहते हैं कि इससे मिलने वाले कर से कोरोना महामारी के बाद पैसे से जूझ रही दुनिया को काफ़ी सहारा मिल सकता है.

वे कहते हैं कि इस तरह के गेम के लिए पहले से एक सेल्फ-रेगुलेटरी ढांचा है, जिसके तहत ये गेम खेले जा रहे हैं. हालांकि वकीलों का मानना है कि यह ढांचा अपर्याप्त है.

अय्यर कहते हैं, "सेल्फ-रेगुलेशन उस उद्योग में बहुत ख़तरनाक चीज़ है, जो अपने उपभोक्ताओं के अनिवार्य शोषण पर निर्भर हो, जैसे अल्कोहल इंडस्ट्री. वह इंडस्ट्री अधिक से अधिक शराब बेचने के लिए किसी शराबी पर ही निर्भर है."

वैसे भारत में इस तरह के क़ानून बनाना कभी आसान नहीं रहा है.

इंटरनेट से संबंधित कोई भी कानून केंद्र सरकार बना सकती है, लेकिन गैंबलिंग यानी जुए से संबंधित क़ानून बनाने का काम राज्य सरकारों के अधिकार क्षेत्र में आता है.

इसका मतलब यह हुआ कि ऑनलाइन सट्टेबाजी और जुए पर भारतीय संसद कोई क़ानून तभी बना सकती है, जब सारे राज्य इस पर सहमत हो जाएं.

अय्यर कहते हैं, "दिक़्क़त ये है कि गैं​बलिंग से संबंधित क़ानून इंटरनेट पर लागू किए जाने हैं, ऐसे में इस बारे में क़दम उठाएगा कौन? केंद्र सरकार या राज्य सरकारें? हो ये रहा है कि कोई भी इस मसले पर अपने क़दम नहीं उठा रहा."

इस तरह, ऑनलाइन गैंबलिंग पर सरकारों को अभी अपने क़दम उठाने हैं. लेकिन गेमिंग फेडरेशन और वकील समुदाय इस बात पर सहमति हैं कि इस फलते-फूलते सेक्टर को रेगुलेशन की सख़्त ज़रूरत है.

इन दोनों तबक़ों का मानना है कि रेगुलेशन न केवल इसकी कारोबारी क्षमता बढ़ाने के लिए, बल्कि इसे खेलने वालों और उनकी बचत को सुरक्षित रखने के लिए भी बहुत ज़रूरी है.

एआईजीएफ जैसी संस्थाएं तो मानती हैं कि ख़ुद को बचाने की ज़िम्मेदारी इसे खेलने वालों की ही है.

वहीं फ़ैसल मक़बूल को उम्मीद है कि गेमिंग कंपनियों को और अधिक जवाबदेह बनने को मज़बूर किया जाएगा. हालांकि तब तक इसे खेलने वालों के लिए उनकी एक उपयोगी चेतावनी है:

'यह एक दुष्चक्र है.'

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