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शनिवार, 18 जून, 2005 को 15:34 GMT तक के समाचार
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फ़ादर्स डे पर अंबानी बेटों का उपहार

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दोनों भाइयों के बीच मतभेद की ख़बर सात महीने पहले खुलकर सामने आई थी
इसे अंबानी बेटों का अपने स्वर्गवासी पिता श्री धीरुभाई अंबानी को दिया गया फ़ादर्स डे उपहार माना जा सकता है कि दोनों बेटों ने रिलायंस समूह के कारोबारों को बांटने का फैसला बिना किसी क़ानूनी विवाद के कर लिया है.

गौरतलब है कि आज हुई घोषणा में मुकेश अंबानी और अनिल अंबानी की माँ कोकिला बेन अंबानी ने दोनों बेटों के बीच कारोबारों का बंटवारा कर दिया है.

रिलायंस इंडस्ट्री और आईपीसीएल मुकेश अंबानी के हिस्से में हैं और अनिल अंबानी के हिस्से में रिलायंस इनफोकॉम, रिलायंस इनर्जी और रिलायंस कैपिटल हैं.

गौरतलब है रिलायंस इंडस्ट्रीज़ इस समूह की मूल कंपनी और सबसे शक्तिशाली कंपनी है, जिसके शेयरों का बाजार मूल्य 80,000 करोड़ रुपये से भी ऊपर है.

रिलायंस इनफोकॉम, रिलायंस इनर्जी और रिलायंस केपिटल के शेयरों की कीमत को जोड़कर देखें, तो 40,000 करोड़ रुपये से लेकर 50,000 करोड़ तक ही बनती है.

मुकेश को फ़ायदा

मोटे तौर पर देखें, तो यह बंटवारा शांत दिखता है, पर इसके गहराई से विश्लेषण पर पता चलता है कि यह बंटवारा साफ तौर पर मुकेश अंबानी के पक्ष में झुका हुआ लगता है.

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बंटवारा मुकेश के पक्ष में माना जाता है

पर पूरी स्थितियों का एक आयाम यह भी था कि अनिल अंबानी को वर्तमान परिस्थितियों में इतना मिलना भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि कारोबार की दृष्टि से रिलायंस समूह में अनिल अंबानी की वास्तविक स्थिति बहुत ही कमजोर हो चुकी थी.

रिलायंस इंडस्ट्री समूह की मूल कंपनी है, उससे अनिल अंबानी का पत्ता पूरी तरह से साफ हो गया है, इस बंटवारे में इस कंपनी से अनिल अंबानी ने इस्तीफा दे दिया है.

विवाद की शुरुआत

पूरा विवाद गत नवंबर में सामने आया, जब एक टीवी चैनल को दिये गये इंटरव्यू में मुकेश अंबानी ने माना कि रिलायंस के स्वामित्व के मसले पर अनिल अंबानी के साथ उनके कुछ मतभेद हैं. तब से अब तक शेयरधारियों में इस झगड़े के असर के बारे में कयास लगाया जा रहा था.

मुकेश अंबानी मूलत: मीडिया से दूर रहने वाले शांत स्वभाव से कारोबार में लगे रहने वाले कारोबारी माने जाते हैं, जबकि अनिल अंबानी मीडिया में खासी चर्चा में रहते हैं, कई बार गलत कारणों से भी.

मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी के सहयोग से अनिल अंबानी के राज्यसभा में जाने का मसला भी विवाद का एक विषय बना.

मुकेश अंबानी के खेमे का इस बारे में मानना था कि जिस पार्टी का शासन पूरे देश में सिर्फ एक प्रदेश में है, उसके साथ इतनी करीबी दिखाना रिलायंस जैसे बड़े समूह के लिए ठीक नहीं है, जिसका कारोबार देश के तमाम राज्यों में फैला हुआ है.

अनिल के सामने चुनौतियाँ

कुल मिलाकर रिलायंस इंडस्ट्री के कारोबार का संचालन वास्तव में बरसों से मुकेश अंबानी ही कर रहे थे, इसलिए रिलायंस इंडस्ट्रीज में अनिल अंबानी के एक तरह से अप्रासंगिक हो जाने का इसके कामकाज पर कोई वास्तविक असर नहीं पड़ा.

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अनिल को अपनी क़ाबिलियत दिखानी होगी

पर अब असली चुनौती अनिल अंबानी के सामने है-उनको जो कंपनियां मिली हैं उनमें से रिलायंस इनफोकॉम और रिलायंस इनर्जी को अपने कामकाज की मजबूती अभी प्रमाणित करनी है.

रिलायंस इनफोकॉम ने अपने फोन नेटवर्क को फैला तो बहुत लिया है, पर अब उसे ढंग से संभालना कंपनी के लिए मुश्किल साबित हो रहा है. तमाम उपभोक्ता इसके कामकाज की गुणवत्ता को लेकर शिकायत कर रहे हैं. रिलायंस इनर्जी को भी अभी लाभप्रद परियोजनाओं को वास्तविकता में बदलकर दिखाना है.

यानी कुल मिलाकर अनिल अंबानी को अब अकेले अपनी कारोबारी क्षमताएं प्रमाणित करनी होंगी, जबकि मुकेश अंबानी और रिलायंस इंडस्ट्रीज के कारोबारी रिकार्ड को लेकर निवेशक और कारपोरेट सेक्टर आश्वस्त हैं.

आने वाले तीन सालों में यह फैसला हो जायेगा कि अनिल अंबानी मीडिया में सकारात्मक वजहों से चर्चा में रहेंगे या नकारात्मक वजहों से. पर यह बात साफ है कि अनिल अंबानी को अब अकेले अपने आप को प्रमाणित करने दिखाना है.

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