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भारत-बर्मा गैस पाइपलाइन समझौता | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत, बर्मा और बांग्लादेश के बीच एक गैस पाइपलाइन बिछाने पर सहमति हो गई है. ये प्राकृतिक गैस बर्मा से बांग्लादेश के ज़रिए भारत आएगी. इसका तकनीकी और वाणिज्यिक आकलन करने के बाद अंतरराष्ट्रीय कंपनियाँ इसका काम सँभालेंगी. बर्मा, बांग्लादेश और भारत के तेल मंत्रियों ने एक साझा बयान में कहा है कि बांग्लादेश और भारत की सरकार कहीं भी और जब ज़रूरत हो इस पाइपलाइन का इस्तेमाल कर सकती हैं. तीनों सरकारें मिलकर इस पाइपलाइन का रास्ता तय करेंगी. इस पर एक तकनीकी वाणिज्यिक कार्यसमिति गठित की गई है, जो विस्तृत विचार-विमर्श कर इस मामले में काम शुरू करवाएगी. ये कार्यसमिति प्राकृतिक गैस, कुँओं के विकास में होने वाले निवेश, सहयोग के क्षेत्रों और इसके वितरण पर विचार करेगी. इसकी पहली बैठक सात फ़रवरी को बर्मा में होगी और इसके सहमति पत्र पर मार्च के अंत तक हस्ताक्षर होंगे. वैसे बातचीत प्राकृतिक गैस तक ही सीमित नहीं है. सीएनजी और रसोई गैस पर भी चर्चा हो रही है. भारत के पेट्रोलियम मंत्री मणिशंकर अय्यर का कहना था कि भारत की ज़रूरत बड़ी है और व्यापक है और बर्मा के पास बहुत स्रोत है इसलिए सहयोग के सभी रास्तों को टटोला जा रहा है. बांग्लादेश की चिंताएँ बांग्लादेश की चिंता ये रही है कि वह भारत के ज़रिए नेपाल और भूटान से पनबिजली का वितरण चाहता है. साथ ही वह चाहता है कि नेपाल और भूटान सामान भेजने के लिए वह भारतीय भूमि का इस्तेमाल कर सके. इसके अतिरिक्त भारत के व्यापार असंतुलन से चिंतित बांग्लादेश इसे कम करने की भी माँग कर रहा है. इन सभी पर भारत का रुख़ सकारात्मक रहा है और उसका कहना है कि इन सब की पूर्ति के लिए अगर बांग्लादेश नए प्रस्ताव लाता है तो भारत उसका अध्ययन करेगा. भारत ईरान से पिछले ही हफ़्ते तेल आयात का समझौता कर चुका है. अब इस क्षेत्र में सहयोग बढ़ाकर वह लंबे समय की अपनी ऊर्जा ज़रूरतों को पक्का करना चाह रहा है. |
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