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गठबंधन का दबाव और आर्थिक सुधार | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत में नई सरकार की पहली सबसे बड़ी चुनौती होगी आनेवाला बजट. राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की हार के बाद कॉंग्रेस की सरकार को बजट पेश करने का ये मौक़ा क़रीब आठ साल के बाद मिल रहा है. सबसे अहम सवाल है कि इस बार वो ऐसा क्या करगी जो पिछली सरकार न कर सकी. आठ जुलाई, गुरुवार को भारत के नए वित्त मंत्री पी चिदंबरम पेश करेंगे 2004-2005 का बजट. वैसे चिदंबरम के लिए बजट प्रस्तुत करने का ये पहला मौक़ा नहीं होगा. इससे पहले 1996 और 1997 में उन्होनें बजट पेश किया था. उसके बाद राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की सरकार ने 1998 से लेकर इस साल के लेखानुदान पेश किया. लगातार चार बार यशवंत सिन्हा को ये अवसर मिला और फिर पिछले बजट के बाद इस बार के लेखानुदान को रखा था जसवंत सिंह ने. सात बजट बाद जिस आर्थिक सुधार के कार्यक्रम को कांग्रेस के मनमोहन सिंह ने शुरु किया उसमें क़रीब सात साल तक उनकी पार्टी की कोई भूमिका नहीं रही. वहीं पिछली सरकार,यानी एनडीए सरकार के अनुसार इन सात सालों में उसने देश को आर्थिक तौर पर चुस्त दुरुस्त रखने में कोई कसर नहीं छोड़ी. तो फिर ऐसा क्या था जो लोगों को पसंद नहीं आया, सरकार की नाकामयाबी में उसके आर्थिक कार्यक्रम की कितनी और क्या भूमिका रही? भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य और पार्टी की आर्थिक नीतियों पर सलाहकार जगदीश शेट्टीगार मानते हैं कि कहीं न कहीं भूल ज़रूर हुई, शायद संवादहीनता इसका कारण हो. जगदीश शेट्टीगार कहते हैं, “पिछली सरकार ने केंद्र में जो काम किया उसका श्रेय राज्य सरकारों को मिला, उनकी ही योजनाओं को एक नया नाम देकर उनका लाभ उठाया गया.” लेकिन आर्थिक मामलों के पत्रकार रोहित बंसल इससे सहमत नहीं हैं वे कहते हैं कि ये महज़ अपनी नाकामयाबी पर पर्दा डालने वाली बात है. वे कहते हैं कि पिछली सरकार ने देश के 80 करोड़ लोगों को नज़र अंदाज़ कर दिया था और उसकी दृष्टि में सिर्फ़ 20 करोड़ लोग थे. रोहित बंसल का मानना है कि नई सरकार ने भारत के सभी लोगों को ध्यान में रख कर अपनी नीतियाँ बनानी शुरु की हैं. लोगों की उम्मीदें बीबीसी ने विभिन्न शहरों में लोगों से बात की. लोगों को टैक्स में राहत और महंगाई से छुटकारे की उम्मीद है. कुछ लोग मानते हैं कि नई सरकार का दृष्टिकोण पहली सरकार से कुछ अलग तो नज़र आता है, मसलन, नई सरकार व्यावसायियों की तुलना में आम आदमी की बात कर रही है. लेकिन आम तौर पर लोग कहते है कि सरकारें बदलने से कोई बहुत बड़े परिवर्तन की उम्मीद दिखाई नहीं देती. यानी योजनाएँ अपनी जगह हैं लेकिन लोगों को प्रभावित करना या कर पाना अलग बात है. कम से कम इस बजट से लोगों की बहुत ज़्यादा उम्मीदें तो नज़र नहीं आ रहीं. |
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