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मंगलवार, 06 जुलाई, 2004 को 14:58 GMT तक के समाचार
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अंतिम व्यक्ति को प्राथमिकता देनी होगी - ज्याँ द्रेज़

ज्याँ द्रेज़
ज्याँ द्रेज़ दिल्ली स्कूल ऑफ़ इकॉनॉमी से जुड़े हुए हैं
भारत में रहकर काम कर रहे अर्थशास्त्री ज्याँ द्रेज़ का कहना है कि देश में उच्च और मध्यवर्ग की बजाय अंतिम व्यक्ति को प्राथमिकता देनी होगी.

हालांकि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह महात्मा गाँधी के सपनों की बात कर रहे हैं लेकिन ज्याँ द्रें मानते हैं कि यह फ़िलहाल संभव नहीं दिखाई देता.

प्रस्तुत है ज्याँ द्रेज़ से हुई बातचीत के प्रमुख अंश

सवाल - इस समय देश के सामने कौन सी आर्थिक चुनौतियाँ हैं?

ज्याँ द्रेज़ - पिछले दस सालों में आर्थिक सुधारों में तेज़ी तो आई है पर इससे ज़मीनी तौर पर कोई सार्थक बदलाव नहीं दिख रहा है. बेरोज़गारी का बढ़ता ग्राफ़ आर्थिक सुधार कैसे हो सकता है. जो 8 प्रतिशत की दर के साथ विकास का दावा कर रहे हैं, वो ही सार्वजनिक खर्च और रोजगारपरक योजनाओं के लिए पैसे की कमी का रोना रो रहे हैं. ऐसे में बाज़ार की चमक और उच्च व मध्य वर्ग के बजाय अंतिम व्यक्ति को प्राथमिकता देना बहुत ज़रूरी है.

इस बार बजट से आपको क्या अपेक्षाएँ हैं.

बहुत आशाएँ तो नहीं हैं क्योंकि पहले से तय सरकारी खर्च में किसी भी तरह की तब्दीली के आसार कम ही हैं. ऐसे में कुछ नया कर पाने की गुँजाइश कम ही रहती है. फिर भी मेरा मानना है कि अगर मज़बूत राजनीतिक इच्छाशक्ति हो और रक्षा बजट कटौती या टैक्स-जीडीपी अनुपात में बढ़ोत्तरी की जाए तो कुछ सुधार हो सकता है.

सरकार इस बात को कितना समझ पा रही है?

थोड़ी उम्मीद तो की जा सकती है क्योंकि पिछली सरकार की तुलना में इस बार का न्यूनतम साझा कार्यक्रम ख़ासा अलग और बेहतर है पर असली सवाल तो इनके लागू किए जाने का है. चुनाव के ये वादे कितने ज़मीनी साबित होंगे, ये कुछ दिनों में साफ़ हो जाएगा.

आर्थिक उदारीकरण को आप किस रूप में देखते हैं?

ज्याँ द्रेज़
ज्याँ द्रेज़ मानते हैं कि जो आर्थिक उदारीकरण शुरु किया गया था वह तो अब कहीं दिखता नहीं
इस बात से सहमत तो हुआ जा सकता है कि 1991 में जब आर्थिक उदारीकरण शुरू हुआ तो उस समय उसकी आवश्यकता भी थी पर आज उदारीकरण का जो चेहरा हमारे सामने है, वो एक छलावा भर है. पिछले वर्षों में तेजी से हुए निजीकरण, कॉर्पोरेट जगत का बढ़ता वर्चस्व और बौद्धिक संपदा के अधिकार पर जो कुछ देखने को मिला है, वह उदारीकरण की सच्चाई से कोसों दूर है और उसे उदारीकरण कहना बिल्कुल ग़लत है.

अंतिम व्यक्ति तक लाभ पहुँचाने की शुरुआत कहाँ से होनी चाहिए?

मुझे लगता है कि रोज़गार की गारंटी का क़ानून बनाना बहुत ज़रूरी है, साथ ही शिक्षा, पोषण और स्वास्थ्य पर भी विशेष ध्यान देने की ज़रूरत है. पश्चिमी देशों में सकल घरेलू उत्पाद का 40 प्रतिशत तक सार्वजनिक सुविधाओं पर खर्च होता है जबकि अपने यहाँ यह काफ़ी कम है. लोगों के जीवन स्तर में सुधार को तय करके ही हम देश के विकास का सपना देख सकते हैं और मेरे हिसाब से यह एक बड़ी चुनौती है.

प्रधानमंत्री क्या गाँधी के सपने को साकार करने के अपने वादे पर खरे उतर पाएँगे?

गाँधी का सपना आज की आर्थिक नीतियों से साकार हो सकेगा, ऐसा नहीं लगता. इसके लिए सार्वजनिक समर्थन की ज़रूरत होगी और ख़ुद प्रधानमंत्री इस बात को स्वीकारते हैं. अब यह कितना संभव होगा, यह तो उनकी राजनीतिक इच्छाशक्ति पर ही निर्भर है. चिंताजनक यह है कि प्रधानमंत्री की इस बात के ख़िलाफ़ दूसरा तबका तेजी से इस कोशिश में लगा है कि ये संभव न हो पाए.

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