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अधिक ख़र्च का मतलब मोटापा और उधार
दुनिया में ऐसे लोगों की तादाद तेज़ी से बढ़ती जा रही है जो अपनी जीवनशैली के कारण असंतुष्ट हैं और दुनिया में गरीबी भी बढ़ा रहे हैं. अमरीका में हुए एक ताज़ा अध्ययन के परिणाम बताते हैं कि लोगों में पिछले कुछ वर्षों में उपभोग की प्रवृति बहुत तेज़ी से बढ़ी है. रिपोर्ट का कहना है कि चीन और भारत इस होड़ में अब काफ़ी आगे निकल गए हैं और इन देशों का मध्यम वर्ग विलासितापूर्ण जीवन की ओर बढ़ रहा है. अध्ययन का कहना है कि इस समय दुनिया की एक चौथाई आबादी उस तरह की जीवन- शैली को अपना रही है जो किसी समय केवल अमीर लोगों का शौक़ हुआ करता था. अधिक ख़र्च करने और तरह-तरह की चीज़ें ख़रीदकर लोग ख़ुशियाँ हासिल करने के बदले मोटापा और कर्ज़ बढ़ा रहे हैं.
वर्ल्डवाच नाम की इस संस्था की रिपोर्ट में कहा गया है कि तेज़ी से बढ़ रही उपभोक्ता वस्तुओं की माँग को पूरा करने की कोशिश में पर्यावरण को भारी नुक़सान पहुँच रहा है और ग़रीब लोगों के लिए अपनी ज़रूरतें पूरी करना मुश्किल होता जा रहा है. वर्ल्डवाच की वार्षिक रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनिया में एक अरब 70 करोड़ लोग अब अमरीकी और यूरोपीय जीवनशैली अपना चुके हैं, कम से कम उपभोग के मामले में. घरेलू सामान और सुविधाओं पर होने वाला ख़र्च 1960 की तुलना में चार गुना बढ़कर 2000 में 20 खरब डॉलर हो गया. रिपोर्ट का कहना है कि मध्यम वर्ग ने अपनी ज़रूरतें बहुत बढ़ा ली हैं और ख़र्च करना अब ज़रूरत नहीं बल्कि शौक़ बन गया है. वर्ल्डवाच का कहना है कि वस्तुओं के उपभोग में कोई बुराई नहीं है लेकिन यह सीमा से अधिक बढ़ जाए तो "मोटापा, कर्ज़, पर्यावरण का नुक़सान और ग़रीबी जैसी समस्याएँ बढ़ने लगती हैं." रिपोर्ट में कहा गया है कि "अब दुनिया की सरकारों, उद्योगों और नागरिकों को सोचना चाहिए कि वे किसी तरह अपनी अकारण ख़र्च करने की आदतों पर रोक लगाएँ और देखें कि किस तरह दुनिया के अधिक से अधिक लोगों का भला हो सके." वर्ल्डवाच के प्रमुख क्रिस्टोफ़र फ़ैल्विन ने अमरीका का उदाहरण दिया कि किस तरह वहाँ नए बनने वाले मकान 1975 की तुलना में 38 प्रतिशत बड़े हैं जबकि उनमें रहने वाले लोगों की तादाद कम हुई है. अमरीका के सिर्फ़ तीस प्रतिशत लोगों ने कहा कि वे ख़ुश हैं जबकि 1957 में भी इतने ही लोगों ने अपने आप को संतुष्ट पाया था जबकि वे इससे बहुत कम ख़र्च करते थे. |
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