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'असमानता कम हो रही है'
अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के भारतीय मूल के अर्थशास्त्री अजित घोष ने वैश्वीकरण के बारे में प्रचलित अवधारणाओं को उलट दिया है. उन्होंने अपनी क़िताब 'जॉब्स ऐंड इनकम्स इन ए ग्लोबलाइज़िग वर्ल्ड' में कहा है कि प्रचलित अवधारणा के विपरीत वैश्वीकरण से असमानता कम हो रही है. अजित घोष का मानना है कि ऐसा माना जा रहा है कि ग़रीब देशों से अमीर देशों की ओर लोग का जाना बढ़ेगा लेकिन ऐसा हुआ नहीं. अजित घोष के विचार अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन की अवधारणा से एकदम अलग हैं. अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के विचार पारंपरिक रूप से श्रम संगठनों के काफ़ी नज़दीक रहे हैं जिनका मानना है कि दुनिया भर में असमानता, विकासशील देशों में ग़रीबी और अमीर देशों की ओर लोगों के पलायन की वजह वैश्वीकरण है. लेकिन अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन का कहना है कि दूसरा पक्ष इसे समस्याओं के समाधान का जरिया मानता है. बेवजह की चिंता अजित घोष कहते हैं कि वैश्वीकरण के बारे में लोगों के अनेक चिंताएँ बेवजह हैं.
उनकी दलील है कि भारत और चीन जैसे कम आमदनी वाले देशों में व्यापार और निवेश ने आर्थिक वृद्धि की गति बढ़ा दी है. इन देशों की जनसंख्या को देखते हुए औसत आय में वृद्धि का भारी असर हुआ है. अजित घोष का कहना है कि इससे स्पष्ट है कि निजी आय के मामले में वैश्वीकरण का कोई ख़राब असर नहीं हुआ है. इसके अलावा वैश्वीकरण से विकसित देशों को निर्यात से विकसित देशों के लाखों लोगों को लाभ हुआ है और रोजगार के अवसर बढ़े हैं. उनका कहना है कि इसके विपरीत विकसित देशों में अकुशल लोगों की नौकरियाँ गईं हैं. अजित घोष विकसित देशों से कुशल लोगों के विकसित देशों में जाने से चिंतित हैं. उनका कहना है कि ऑस्ट्रेलिया और कनाडा वर्षों से ज़रूरी तकनीकी कुशलता वाले लोगों को नागरिकता देते आए हैं. इस समय विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में क़ानूनी रूप से लोगों को देशांतरण हो रहा है. उनका मानना है कि इसका असर छोटे अफ़्रीकी और कैरीबियाई देशों में देखा जा सकता है जहाँ ऐसे लोगों की सीमित संख्या है. |
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