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क्या होता है शेयर?
शब्दकोश देखें तो पता चलता है कि शेयर का मतलब है हिस्सा. और कारोबार में भी शेयर का मतलब हिस्सा ही है. जब किसी को बहुत बड़ी कंपनी खोलनी होती है तो वह बहुत से हिस्सेदार या शेयरधारक तलाशता है. वे इस कारोबार में कितनी रक़म लगाना चाहते हैं इस अनुपात में उनकी हिस्सेदारी तय होती है इस बात से कि उनके पास इस कंपनी के कितने शेयर हैं. हिसाब किताब साफ़ रखने के लिए कंपनी के प्रवर्तक तय करते हैं कि वे एक शेयर की क़ीमत क्या रखना चाहते हैं. शेयर की क़ीमत को मुखमूल्य या फ़ेस वैल्यू कहा जाता है. आम तौर पर भारत में किसी कंपनी के शेयर की फ़ेस वैल्यू दस रूपए होती है लेकिन कुछ कंपनियां इसे पच्चीस, पचास या सौ रुपए भी रखती हैं. और हाल के दौर में जिन कंपनियों के शेयरों की क़ीमत आसमान छूने लगती है वो अपने शेयरों को तोड़कर एक रूपए या दो रुपए मूल्य के शेयरों में बदलने लगी हैं. बाज़ार भाव ये तो रही शेयरों की मूल कीमत. लेकिन बाज़ार में कई बार ये शेयर अपनी मूल कीमत से कई गुना कीमत पर बिकते हैं और कई बार ऐसा भी होता है कि दस रुपए का शेयर बाज़ार में दस पैसे में भी नहीं बिकता.
कारोबार शुरू करने के लिए सबसे पहले तो कंपनी के शेयर उसके प्रवर्तकों और मित्रों परिचितों को बेचे जाते हैं. इसके बाद आमतौर पर कंपनी किसी बड़े बैंक या वित्तीय संस्थान से संपर्क करती है जो या तो कंपनी के कुछ शेयर ख़रीदता है या प्रवर्तकों की लगाई रक़म के अनुपात में कुछ कर्ज़ देता है. कई बार कुछ ऐसी व्यवस्था भी होती है कि वित्तीय संस्थान कंपनी को कर्ज़ देता है और यह विकल्प अपने पास रख़ता है कि कुछ समय बाद वह कर्ज़ शेयरों में बदल जाएगा. इसके बाद बारी आती है आम जनता को शेयर बेचने की. जनता को शेयर बेचने के लिए कंपनी पब्लिक इशू लाती है जिसे सार्वजनिक निर्गम भी कहा जाता है. पब्लिक इशू में जो लोग कंपनी के शेयर ख़रीदते हैं उसके बाद उनके पास इन शेयरों से मुनाफ़ा कमाने के दो तरीके हैं. एक तो यह कि शेयरों को बाज़ार में ऊंची कीमत पर बेचकर मुनाफ़ा कमा लें या दूसरा यह कि शेयर अपने पास रखे रहें और कंपनी से मिलने वाले लाभांश या डिविडेंड का इंतज़ार करें. लाभांश यानी लाभ का अंश तभी मिलता है जब कंपनी को कारोबार में मुनाफा होता है और प्रबंधतंत्र यह तय करे कि कंपनी को अपना कारोबार चलाने या बढ़ाने के लिए फिलहाल इस रकम की ज़रूरत नहीं है. फिर भी कुल कमाई में से कुछ हिस्सा तो सुरक्षित रख दिया जाता है जिसे सुरक्षित निधि या रिज़र्व कहा जाता है. ताकि अगले किसी साल में अगर कंपनी को अचानक पैसे की ज़रूरत पड़ जाए तो कमी महसूस न हो. और बची रकम लाभांश के रूप में बांटी जाती है. कई बार ऐसा भी होता है कि कंपनी कई साल मुनाफ़ा कमा लेती है तो उसके पास सुरक्षित रकम का काफ़ी बड़ा भंडार जमा हो जाता है. प्रबंधन को अगर लगता है कि कंपनी को इस पैसे की निकट भविष्य में कोई ज़रूरत नहीं पड़नेवाली है तो वह बोनस शेयर देने का ऐलान कर देता है. बोनस शेयर बोनस शेयर का अर्थ है मुफ़्त शेयर. इनकी घोषणा अलग अलग अनुपात में होती है. यानी किसी के पास पहले से कंपनी के कितने शेयर हैं उसी से तय होगा कि उसे कंपनी के कितने बोनस शेयर मिलेंगे.
आम तौर पर तो बोनस में मिलनेवाले शेयरों की गिनती पहले से रखे शेयरों से कम होती है, लेकिन कई बार इसका उलटा भी हो जाता है. भारत की मशहूर दवा कंपनी सिपला ने 1993 में अचानक ऐलान किया कि वो एक पर पांच के अनुपात में बोनस शेयर देगी. घोषणा से एक दिन पहले कंपनी के शेयर की बाज़ार में कीमत थी 770 रुपए और घोषणा के अगले दिन उसकी कीमत हो गई 3600 रुपए. जिन लोगों के पास उसके शेयर थे उनके लिए यह मुनाफ़ा कमाने का सुनहरा मौका था. मुश्किल फ़ैसला लेकिन ऐसे ही वक्त पर तय करना होता है कि कंपनी के शेयर बेचकर मुनाफ़ा वसूली में समझदारी है या उनको पास रखकर कंपनी के भविष्य का हिस्सेदार बने रहने में. और इसी उहापोह के भरोसे चलता है शेयरों की खुली ख़रीद फ़रोख़्त का बाज़ार जिसे सेकंडरी मार्केट भी कहा जाता है. प्राइमरी मार्केट है शेयरों के नए इशू का बाज़ार जहां लोग कंपनी से सीधे शेयर ख़रीदते हैं और सेकंडरी मार्केट जिसमें सेकंड हैंड शेयर यानी मूल शेयर धारकों के बेचे हुए शेयर ख़रीदे बेचे जाते हैं. और यही बाज़ार है जो लोगों की किस्मत बदल देता है, यहां होनेवाला कारोबार राजा को फ़कीर और फ़कीर को बादशाह बना सकता है. |
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