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पाकिस्तान: महिलाएं जहां मुश्किल से देती हैं वोट, वहां 'बाहुबली' नवाबों के सामने डटकर खड़ी मजदूर की बेटी
- Author, फ़रहत जावेद
- पदनाम, बीबीसी उर्दू डॉट कॉम
शांगला की रहने वाली साजिदा बीबी (बदला हुआ नाम) ने पहचान पत्र होने के बावजूद अपनी ज़िंदगी में केवल एक बार वोट डाला है.
उन्हें वोट डालने की इजाज़त दो साल पहले स्थानीय निकाय के चुनाव में उस समय मिली जब उनके पति के दोस्त को वोट की ज़रूरत थी.
साजिदा कहती हैं, “दो साल पहले तक मुझे यह पता ही नहीं था कि एक औरत भी वोट डाल सकती है.”
वह पाकिस्तान के ख़ैबर पख़्तूनख़्वा प्रांत के स्वात डिविज़न के ज़िला शांगला की निवासी हैं.
साजिदा बीबी के अनुसार उनके पति नहीं चाहते कि घर की महिलाएं पोलिंग बूथ पर मर्दों की लाइन में साथ खड़ी हों क्योंकि 'इससे उनका पर्दा ख़त्म होगा.'
कितनी हैं महिला मतदाता
वोट डालने पर ऐसी पाबंदी का सामना केवल साजिदा और उनके घर की दूसरी महिलाएं ही नहीं करतीं बल्कि ये हाल लाखों महिला वोटरों का है.
ज़िला शांगला में सन 2018 के चुनाव में महिलाएं इतनी कम संख्या में वोट डालने निकली थीं कि चुनाव आयोग ने यहां का चुनाव रद्द कर दिया था.
ये पाकिस्तान के सबसे ज़्यादा रूढ़िवादी क्षेत्रों में से एक है जहां महिलाओं के लिए कठोर परंपराएं लागू हैं जिन्हें मानने पर ज़ोर दिया जाता है. शांगला के इतिहास में स्थानीय चुनाव हो या कोई और चुनाव, कभी कोई महिला उम्मीदवार खड़ी नहीं हुई हैं.
यहां कुल रजिस्टर्ड वोटरों में आधी संख्या महिलाओं की है मगर उन्हें घर से बाहर निकालने की इजाज़त नहीं है. दूसरी ओर मतदान के दिन ऐसी व्यवस्था भी नज़र नहीं आती जिससे उन क्षेत्रों की महिलाओं को मदद मिल सके.
हम इस क्षेत्र में कुछ महिलाओं से मिले और समझने की कोशिश की कि क्या पिछले छह सालों के दौरान कुछ बदलाव आया है.
यहां महिलाओं को वोट डालने के लिए परिवार के पुरुषों की इजाज़त चाहिए जो आमतौर पर नहीं दी जाती. यहां के मर्द महिलाओं को वोट डालने की इजाज़त नहीं देने की दो वजह बताते हैं.
एक तो दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों में यातायात की व्यवस्था न होना और दूसरी वजह महिलाओं के लिए अलग पोलिंग बूथ न बनाया जाना.
इजाज़त के बिना अस्पताल भी नहीं जातीं हैं औरतें
27 साल की शगुफ़्ता इदरीस शांगला की उन कुछ महिलाओं में से एक हैं जिन्होंने उच्च शिक्षा प्राप्त की है और एक स्थानीय स्कूल में पढ़ाती हैं. उन्होंने बताया कि बीते सालों में भी क्षेत्र की महिलाओं के अधिकारों में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया है.
वह कहती हैं, “यहां कोई औरत बीमार हो जाए तो वह पति की इजाज़त के बिना अस्पताल नहीं जा सकती. अक्सर पति इसलिए भी इजाज़त नहीं देते कि अस्पताल में या बाहर मर्द हैं. इस तरह वह औरत बीमारी और तकलीफ़ बर्दाश्त करती है मगर इजाज़त के बिना बाहर नहीं निकल सकती. यही हाल वोट का भी है.”
उनकी दोस्त सौबिया आरज़ू बताती हैं कि यहां महिलाओं को यह जानकारी ही नहीं कि वोट कितना अहम है और वह अपना यह हक़ कैसे और क्यों इस्तेमाल करें.
उनके अनुसार, “हमें तो यह भी नहीं पता था कि वोट वग़ैरह क्या होता है. मुझे तो पढ़ने-पढ़ाने के दौरान इसका पता चला है. जहां मर्द कहते हैं कि वोट दो, हम वहां दे देते थे मगर इस बार मैं सोच रही हूं कि अपनी मर्ज़ी की पार्टी को वोट दूंगी.”
यह स्थिति केवल शांगला में नहीं, इससे लगे दूसरे क्षेत्रों जैसे कि कोहिस्तान, बटग्राम और अपर और लोअर दीर में भी यही देखने को मिलता है. यहां महिलाओं का वोटिंग टर्न आउट आमतौर पर कम होता है.
कोहिस्तान उन क्षेत्रों में से एक है जहां महिला वोटर और उम्मीदवारों को रोकने के लिए फ़तवे तक जारी किए जाते हैं.
कुछ ऐसी ही स्थिति पाकिस्तान के पूर्व जनजातीय क्षेत्रों और बलूचिस्तान में भी है. यहां तक कि पंजाब और सिंध के भी कई भागों में महिला वोटरों का टर्नआउट मर्द वोटरों के मुक़ाबले में कम नज़र आता है.
शिक्षण संस्थाओं का अभाव
सन 2018 के चुनाव के बारे में चुनाव आयोग के आंकड़ों को देखें तो ख़ैबर पख़्तूनख़्वा के शहर डेरा इस्माइल ख़ान में कुल डाले गए वोटों में से केवल तीन प्रतिशत महिलाओं के थे.
इसी तरह महमंद एजेंसी में कुल मतदान में महिलाओं का हिस्सा केवल छह फ़ीसद था. वज़ीरिस्तान में भी केवल दस फ़ीसद महिलाओं ने वोट डाले थे. महिलाओं की इतनी कम भागीदारी की वजह से इन जगहों के चुनाव रद्द कर दिए गए थे.
मतदान में महिलाओं की इतनी कम भागीदारी की वजह परिवार के पुरुषों की ओर से इजाज़त न मिलना और विभिन्न तरह की सामाजिक पाबंदियां तो हैं ही, साथ ही शिक्षा की कमी और अपने अधिकारों को प्रति सजग न होना भी एक अहम वजह है.
इसे इस बात से समझा जा सकता है कि लाखों की आबादी वाले ज़िला शांगला में लड़कियों के लिए केवल एक डिग्री कॉलेज है और यूनिवर्सिटी है ही नहीं.
सौबिया आरज़ू कहती हैं कि यहां महिलाओं को पता ही नहीं कि चुनाव क्या है और उनका वोट डालना कितना महत्वपूर्ण है.
उनके अनुसार, “महिलाओं में जागरुकता नहीं है. यहां दूसरी बड़ी समस्या यह है कि अक्सर पोलिंग स्टेशन एक ही इमारत में होते हैं. पोलिंग बूथ अलग होते हैं मगर इमारत में जाने का दरवाज़ा एक ही होता है. इसके अलावा पहाड़ी क्षेत्रों में घर एक दूसरे से दूर होते हैं. आमतौर पर वहां सड़कें भी नहीं होती हैं. कभी-कभी पोलिंग स्टेशन घरों से इतनी दूर होते हैं कि पहाड़ी क्षेत्रों में कई घंटे पैदल यात्रा के बाद भी वहां पहुंचना मुश्किल समझा जाता है.”
चुनाव आयोग के नियमों के अनुसार किसी चुनाव क्षेत्र में डाले गए कुल वोटों में अगर महिलाओं की भागीदारी दस फ़ीसदी से कम होती है तो उस क्षेत्र के रिज़ल्ट को नहीं माना जाएगा और चुनाव की प्रक्रिया रद्द घोषित की जाएगी.
इस नियम पर सवाल उठाते हुए विशेषज्ञ कहते हैं कि चुनाव आयोग की ओर से घोषित केवल दस फ़ीसदी महिला वोटर टर्न आउट की सीमा बहुत कम है.
बीबीसी से बात करते हुए चुनाव की निगरानी करने वाले ग़ैर सरकारी संस्था ‘फाफ़न’ (फ़्री ऐंड फ़ेयर इलेक्शन नेटवर्क) से जुड़ी रुखसाना कहती हैं कि इतने कम वोट राजनीतिक दल अपने ख़ास कार्यकर्ताओं के परिवारों के ज़रिए आसानी से पूरा कर लेते हैं. “इस तरह बड़े पैमाने पर बदलाव नहीं आ पाता.”
उनके मुताबिक़, “कोई भी ऐसा फ़ॉर्मूला लागू करने का मक़सद यह होता है कि वक़्त गुज़रने के साथ-साथ यह इतना आम हो जाएगा कि हर साल और महिलाएं राष्ट्रीय धारा में शामिल होती जाएंगी और यह सीमा बढ़ती जाएगी. मगर यहां ऐसा नज़र नहीं आता. दस फ़ीसद की एक सीमा रखकर बात ख़त्म कर दी गई जिसका भविष्य में कोई लाभ नहीं क्योंकि यह संख्या तो दस फीसदी पर रुक जाती है.”
'डर गई तो बदलाव कैसे आएगा'
इन मुश्किल घड़ियों में भी कहीं कुछ उम्मीद नज़र आती है. बलूचिस्तान के झल मगसी क्षेत्र की रेहाना मगसी उस पिछड़े क्षेत्र में 'बाहुबली' नवाबों के ख़िलाफ़ चुनाव में खड़ी होने वाली पहली महिला हैं.
उनका कच्चा घर गोठ सारंग में है, जहां हर चीज़ में ग़रीबी झलकती है. वह हाथ में काग़ज़ लिए घर-घर पैदल और कभी बाइक पर जाती हैं.
उन्होंने बताया, “हमारे पास इतने पैसे नहीं थे कि चुनावी मुहिम के लिए पैम्फ़लेट की रंगीन प्रिंटिंग करवा सकते. मेरे पिता हारी (खेतिहर मज़दूर) हैं. मेरे भाई ने एक मोटरसाइकिल क़िस्तों पर ली और उसे बेचकर मेरे इलेक्शन लड़ने का इंतज़ाम किया है.”
वह बताती हैं कि सुबह दस बजे तक घर का काम ख़त्म करके गांव में घर-घर जाती हैं और लोगों को इस बात के लिए तैयार करने की कोशिश करती हैं कि वह उन्हें वोट दें. वह कहती हैं कि उनके क्षेत्र में यूनिवर्सिटी-कॉलेज नहीं है. यहां बिजली, गैस,अस्पताल और पक्की सड़क तक की सुविधा नहीं है.
रेहाना कहती हैं, “मैं अपनी चुनावी मुहिम में कभी बाइक से और कभी पैदल लोगों के पास जाती हूं. मेरी पहली ख़्वाहिश है कि मैं अगर जीती तो इस क्षेत्र में अस्पताल और यूनिवर्सिटी बनवाऊंगी. यहां कॉलेज, रोड और बिजली जैसी सुविधाएं नहीं हैं. हम रिश्वत के बिना और पढ़ाई के हिसाब से नौकरी देंगे. अस्पताल बनवाएंगे क्योंकि औरतों को परेशानी होती है. अगर कोई औरत बीमार हो जाए तो उसे सक्खर या सिंध जाना पड़ता है.”
पाकिस्तान के चुनाव में महिला उम्मीदवार कम ही मैदान में नज़र आती हैं. ऐसे क्षेत्र जहां महिला वोटरों का टर्न आउट ही न होने के बराबर हो वहां किसी महिला उम्मीदवार का चुनाव लड़ने का फ़ैसला करना एक बड़ी बग़ावत समझी जाती है.
वह कहती हैं, “हम बलूचों में यह रिवाज नहीं कि औरत चुनाव में हिस्सा ले लेकिन मजबूरी है. मजबूरी मुझे चुनाव मैदान तक ले आई है. लोग कहते हैं कि आपने ऐसा क़दम क्यों उठाया? अगर मैं अपने अंदर डर रखूंगी तो क्षेत्र में बदलाव कैसे लाऊंगी?”
रेहाना मगसी कहती हैं कि उन्हें जानकारी है कि वह अपनी आर्थिक परेशानियों की वजह से शायद चुनाव जीत न सकें, मगर वह भविष्य के बारे में सोचती हैं जब महिलाओं का इलेक्शन लड़ना आम बात हो जाएगी.
उनके अनुसार, “मैं इस डर को ख़त्म करना चाहती हूं. इसलिए आज मैं इलेक्शन में खड़ी हुई हूं ताकि कल और औरतें इलेक्शन लड़ सकें.”
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