'शांति': भारत में परमाणु ऊर्जा से जुड़े प्रस्तावित क़ानून पर इतना 'शोर' क्यों?

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- Author, सुरभि कॉल
- पदनाम, बीबीसी मॉनिटरिंग
भारतीय संसद के दोनों सदनों ने 17 और 18 दिसंबर को एक नए विधेयक को मंज़ूरी दी. इसका मक़सद है अब तक सख़्ती से नियंत्रित देश के नागरिक परमाणु क्षेत्र को प्राइवेट सेक्टर के लिए खोलना.
सस्टेनेबल हार्नेसिंग एंड एडवांसमेंट ऑफ़ न्यूक्लिटर एनर्जी फ़ॉर ट्रांस्फ़ॉर्मिंग इंडिया (SHANTI) विधेयक को 17 दिसंबर को लोकसभा में जब पास किया गया, तब विपक्ष ने वॉकआउट कर दिया था.
इसके बाद 18 दिसंबर को राज्यसभा ने भी विधेयक को पास कर दिया. राष्ट्रपति की मंज़ूरी मिलने के बाद यह विधेयक क़ानून बन जाएगा.
सरकार का कहना है कि यह नया क़ानून भारत को 2047 तक 100 गीगावॉट परमाणु ऊर्जा उत्पादन का लक्ष्य हासिल करने में मदद करेगा.
फ़िलहाल, भारत में कुल बिजली उत्पादन में परमाणु ऊर्जा की हिस्सेदारी सिर्फ़ 3% है.
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यह विधेयक है क्या?

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भारत के परमाणु ऊर्जा राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह ने कहा, "नया क़ानून मौजूदा परमाणु ऊर्जा अधिनियम, 1962 और परमाणु क्षति के लिए नागरिक दायित्व अधिनियम, 2010 (CLNDA), को हटाकर उनकी जगह एक "एकीकृत, व्यापक क़ानून लाएगा, जो भारत की मौजूदा और भविष्य की ऊर्जा ज़रूरतों के हिसाब से बनाया गया है."
सिंह ने इस विधेयक को "मील का पत्थर" बताया, जो देश की विकास यात्रा को नई दिशा देगा.
उन्होंने कहा, "भारत की भूमिका भू-राजनीति में बढ़ रही है. अगर हमें वैश्विक खिलाड़ी बनना है तो हमें वैश्विक मानकों और रणनीतियों का पालन करना होगा. दुनिया स्वच्छ ऊर्जा की ओर बढ़ रही है. हमने भी 2047 तक 100 गीगावॉट परमाणु ऊर्जा क्षमता का लक्ष्य रखा है."
नए क़ानून के तहत कुछ परमाणु गतिविधियों में 49% तक प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) की अनुमति होगी.
18 दिसंबर को प्रतिष्ठित अंग्रेज़ी अख़बार The Indian Express के संपादकीय में टिप्पणी की गई कि विवादास्पद रूप से, इसमें CLNDA की वह धारा हटा दी गई है जिसके अनुसार आपूर्तिकर्ताओं को दुर्घटनाओं के लिए ज़िम्मेदार ठहराया जाता था, विदेशी कंपनियों के लिए यह एक बड़ी रुकावट थी.
18 दिसंबर को अंग्रेज़ी अख़बार Hindustan Times की वेबसाइट में छपी एक रिपोर्ट में कहा गया कि इसके अलावा, सरकार ने यह भी तय किया है कि केंद्र सरकार द्वारा 'प्रतिबंधित' घोषित की गई कोई भी जानकारी अब देश के सूचना का अधिकार (RTI) क़ानून के तहत साझा नहीं की जाएगी.
विपक्ष विरोध क्यों कर रहा है?

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भारत की विपक्षी पार्टी कांग्रेस ने संसद में विधेयक पास होने पर कड़ा विरोध जताया और परमाणु ज़िम्मेदारी को लेकर ख़तरों की बात कही.
कांग्रेस के कई नेताओं ने CLNDA की धारा हटाने, परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में निजी भागीदारी की अनुमति देने और कॉर्पोरेट ज़िम्मेदारी को हल्का करने पर आपत्ति जताई.
कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने 17 दिसंबर को कहा, "विधेयक पहले की उस व्यवस्था को भी हटा देता है जिसमें ऑपरेटर को उपकरण सप्लायर से मुआवज़ा वसूलने का अधिकार था. इसका मतलब यह है कि अगर कोई दुर्घटना होती है - चाहे वह ख़राब डिज़ाइन, घटिया पुर्ज़ों या लापरवाही भरे निर्माण की वजह से हो- तब भी सप्लायर बच निकलेगा और पूरा खर्च भारतीय टैक्सपेयर्स को उठाना पड़ेगा."
अख़बार The Hindu की 18 दिसंबर की रिपोर्ट के अनुसार कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने यह भी सवाल उठाया कि क्या यह 'महज़ संयोग' है कि परमाणु ऊर्जा से जुड़ा यह विधेयक ठीक उसी समय आया जब अदाणी समूह ने परमाणु क्षेत्र में दिलचस्पी दिखाई.
तिवारी ने कहा, "अब मैं देख रहा हूं कि सप्लायर का कहीं ज़िक्र ही नहीं है… भगवान न करे अगर कोई दुर्घटना हो जाए… तो क्या विदेशी सप्लायर को ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जाना चाहिए?"
कांग्रेस पार्टी अक्सर आरोप लगाती है कि नरेंद्र मोदी सरकार से अदाणी समूह को अनुचित फ़ायदे मिलते हैं.
मीडिया क्या कह रहा है?

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मुख्यधारा के मीडिया ने इस विधेयक को लेकर विपक्ष की आलोचना को प्रमुखता से कवर किया और इस विधेयक के फ़ायदे-नुक़सान पर चर्चा की है, जो जल्दी ही क़ानून बनने वाला है.
कई रिपोर्टों ने थरूर की तीखी आलोचना का उल्लेख किया, जिसमें उन्होंने कहा कि यह कदम पूरे परमाणु ऊर्जा क्षेत्र को बिना रोक-टोक खोल देने जैसा है.
17 दिसंबर को हिंदी अख़बार दैनिक जागरण की रिपोर्ट में चिंता जताई गई कि SHANTI विधेयक "परमाणु दुर्घटना की स्थिति में सप्लायर की ज़िम्मेदारी को सीमित कर देगा और निजी क्षेत्र को परमाणु ऊर्जा उत्पादन में शामिल होने की अनुमति देगा."
रिपोर्ट में कहा गया कि इस विधेयक के साथ अब अमेरिकी परमाणु रिएक्टरों और उनसे जुड़ी निवेश योजनाओं के आयात का रास्ता भी खुल सकता है.
हालाँकि, The Indian Express के 18 दिसंबर के संपादकीय में लिखा गया कि 2011 की फुकुशिमा त्रासदी के बाद पिछले दशक में परमाणु संयंत्रों की सुरक्षा में बड़े सुधार किए गए हैं.
अख़बार ने यह भी कहा कि परमाणु वैल्यू चेन को खोले जाने से ऐसे विमर्शों में भारत की बात का वज़न अधिक होगा.
वेबसाइट ThePrint की एक वीडियो रिपोर्ट ने ध्यान दिलाया कि ऊर्जा की बढ़ती मांग के बीच भारत की परमाणु क्षमता का उपयोग धीमी गति से हो रहा है. इसके अनुसार SHANTI विधेयक अलग-अलग श्रेणियों की परमाणु इकाइयों के लिए ज़िम्मेदारी की सीमाएं तय करता है.
भारत के परमाणु क्षेत्र का आगे क्या होगा

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आम तौर पर मोदी सरकार की आलोचना करने वाली वेबसाइट The Wire की 16 दिसंबर की रिपोर्ट में कहा गया कि यह नया क़ानून ऐसे समय आया है जब अमेरिका के ट्रंप प्रशासन के साथ व्यापार वार्ताएं चल रही हैं.
रिपोर्ट ने आलोचनात्मक दृष्टिकोण कायम रखते हुए कहा कि नया क़ानून "अमेरिकी कंपनियों को अरबों डॉलर के रिएक्टर बेचने में मदद करेगा" और ख़राब उपकरणों से होने वाली दुर्घटनाओं के लिए उन्हें "पूरी छूट" देगा.
निजी कंपनियों को लाइसेंस मिलेगा कि वे परमाणु बिजलीघर या रिएक्टर बना सकें, उसका मालिकाना हक़ रख सकें, उसे चला सकें या बंद कर सकें. उन्हें परमाणु ईंधन बनाने की अनुमति भी होगी - जिसमें यूरेनियम-235 का रूपांतरण, शोधन और निर्धारित सीमा तक संवर्धन शामिल है. इसके अलावा, केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित अन्य पदार्थों का उत्पादन, उपयोग, प्रसंस्करण या निपटान भी वे कर सकेंगी.
द हिंदू की 15 दिसंबर की रिपोर्ट के अनुसार, SHANTI क़ानून एक नया परमाणु ऊर्जा नियामक ढांचा तैयार करता है जो संसद के प्रति जवाबदेह होगा और भारत के न्यूक्लियर पावर कॉर्पोरेश के परमाणु संयंत्र चलाने के एकाधिकार को समाप्त करेगा.
अख़बार ने भारत के परमाणु क़ानून विशेषज्ञ प्रोफेसर एमपी राम मोहन से बात की, जिन्होंने कहा कि यह क़ानून " ऐसा सुधार है जिसकी बहुत समय से प्रतीक्षा थी".
प्रोफेसर मोहन ने यह भी कहा कि SHANTI विधेयक पेटेंट क़ानूनों में बदलाव लाकर बड़े पैमाने पर परमाणु तकनीक में नवाचार को बढ़ावा दे सकता है, वैश्विक ज़िम्मेदारी संधियों के अनुरूप है और निजी क्षेत्र की भागीदारी से परमाणु ऊर्जा परियोजनाओं के विस्तार का प्रस्ताव रखता है.
पाकिस्तान ने चिंता जताई

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भारतीय संसद के दोनों सदनों के 'शांति' विधेयक को पास करने पर पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ताहिर अंद्राबी ने कहा, "भारत में परमाणु सुरक्षा से जुड़ी चिंताजनक घटनाओं के इतिहास को देखते हुए हम इन घटनाक्रमों पर क़रीबी नज़र रख रहे हैं."
गुरुवार को साप्ताहिक प्रेस ब्रीफ़िंग के दौरान उन्होंने कहा, "1990 के दशक से अब तक रेडियोएक्टिव सामग्री की चोरी और अवैध बिक्री की कई घटनाएं सामने आ चुकी हैं."
हालांकि प्रवक्ता ताहिर अंद्राबी ने यह नहीं बताया कि ये घटनाएं कहां हुई हैं.
उन्होंने कहा कि संवेदनशील परमाणु सामग्री और उससे जुड़ी जानकारी के प्रबंधन में निजी क्षेत्र की भागीदारी चिंता का विषय हो सकती है.
उन्होंने कहा, "इससे निजी व्यक्तियों की संवेदनशील परमाणु सामग्री तक पहुंच रोकने के लिए किए जा रहे वैश्विक प्रयासों को चुनौती मिल सकती है."
अंद्राबी ने कहा कि उम्मीद है कि ऐसी किसी भी स्थिति से बचने के लिए पर्याप्त सुरक्षा उपाय किए जाएंगे.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.














