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हेल्थ इंश्योरेंस के प्रीमियम हो रहे महंगे, ये तरीक़े बचा सकते हैं पैसे
फ़ाइनेंशियल प्लानिंग में हेल्थ इंश्योरेंस को एक मज़बूत सुरक्षा कवच माना जाता है. लगातार बढ़ते इलाज के ख़र्चों के कारण इसकी अहमियत और भी बढ़ गई है.
लेकिन हाल के समय में एक चिंता यह है कि हेल्थ इंश्योरेंस का प्रीमियम लगातार बढ़ रहा है.
इस वजह से कई लोगों के लिए पॉलिसी को रिन्यू करना मुश्किल हो रहा है.
सीनियर सिटीज़न के मामले में प्रीमियम में बढ़ोतरी और ज़्यादा देखी जा रही है.
तो आख़िर हेल्थ इंश्योरेंस प्रीमियम महंगे क्यों हो गए हैं और किन तरीक़ों से प्रीमियम घटाया जा सकता है?
पिछले साल भर में कई मामलों में हेल्थ इंश्योरेंस प्रीमियम 15 फ़ीसदी से ज़्यादा बढ़े हैं. सीनियर सिटीज़न के मामले में तो यह और भी अधिक है.
प्रीमियम में बढ़ोतरी की ऐसी शिकायतों की वजह से इंश्योरेंस रेगुलेटर आईआरडीएआई को इस साल जनवरी में यह निर्देश देना पड़ा कि स्वास्थ्य बीमा कंपनियां 60 साल या इससे अधिक उम्र के पॉलिसी होल्डर का प्रीमियम सालाना 10 फ़ीसदी से ज़्यादा न बढ़ाएं.
क्यों बढ़ रहे हैं प्रीमियम?
बीमा कंपनियों की ओर से हेल्थ इंश्योरेंस के प्रीमियम में बढ़ोतरी की जो बड़ी दलील दी जाती है, वह है मेडिकल सेक्टर में बढ़ती महंगाई.
उनका कहना है कि पिछले कुछ सालों में अस्पतालों के ख़र्च, दवाइयों की क़ीमतों और डायग्नोस्टिक टेस्ट की लागत में तेज़ी से इज़ाफ़ा हुआ है.
इस वजह से बीमा कंपनियों को क्लेम के लिए ज़्यादा पैसे ख़र्च करने पड़ रहे हैं, जिसका असर प्रीमियम की क़ीमतों पर पड़ता है. इसके अलावा, उम्र बढ़ने के साथ हेल्थ रिस्क भी बढ़ता है और इससे भी प्रीमियम की दरों पर असर होता है.
मतलब यह हुआ कि क्लेम रेश्यो का बिगड़ना प्रीमियम के महंगे होने की सबसे बड़ी वजह में से एक है. बीमा कंपनियों का दावा है कि जितना प्रीमियम वे इकट्ठा कर रही हैं, उससे ज़्यादा क्लेम्स आ रहे हैं.
जब क्लेम्स की रक़म प्रीमियम से ज़्यादा हो जाती है, तो कंपनियों को अपने ख़र्चे पूरे करने के लिए प्रीमियम बढ़ाना पड़ता है.
कैसे घटाएं प्रीमियम?
हालांकि एक्सपर्ट का कहना है कि कुछ ख़ास तरीके़ अपनाकर प्रीमियम को काफ़ी हद तक कम रखा जा सकता है.
कम उम्र में पॉलिसी लें- आप जितने युवा और सेहतमंद होंगे, प्रीमियम भी उतना ही कम होगा, इसलिए कम उम्र में पॉलिसी लेना बेहतर है.
फ़ैमिली फ़्लोटर प्लान चुनने से बढ़ते प्रीमियम का असर कम किया जा सकता है.
कुछ एक्सपर्ट का मानना है कि फ़ैमिली फ़्लोटर में कम उम्र के बच्चों को रखना चाहिए, बुज़ुर्ग पैरेंट्स के लिए इंडिविजुअल पॉलिसी लेना ही बेहतर रहता है.
इसके अलावा, टॉप-अप प्लान भी प्रीमियम कम करने का शानदार तरीक़ा है. अगर आप 1 करोड़ रुपये की बेस पॉलिसी लेने की सोच रहे हैं, तो इसके बजाय 10 लाख रुपये की बेस पॉलिसी और 90 लाख रुपये का टॉप-अप प्लान चुनें.
यह तरीक़ा न सिर्फ़ सस्ता है, बल्कि आपको बड़ा कवर भी देता है. टॉप-अप प्लान उन लोगों के लिए ख़ासतौर पर फ़ायदेमंद है जो कम प्रीमियम में ज़्यादा कवरेज चाहते हैं.
अगर आप लंबी अवधि की पॉलिसी चुनते हैं, तो प्रीमियम में अच्छी ख़ासी बचत हो सकती है. मतलब एक साल के प्रीमियम के बजाय तीन-चार साल के प्रीमियम का एकमुश्त भुगतान करने पर बीमा कंपनियां आकर्षक छूट देती हैं.
इसके अलावा, नेटवर्क हॉस्पिटल्स में इलाज का विकल्प चुनने से इंश्योरेंस प्रीमियम कम हो सकता है. कई बीमा कंपनियां सिबिल स्कोर अच्छा होने पर प्रीमियम में छूट देती हैं.
इसके साथ ही पॉलिसी समय पर रिन्यू कराएं, देरी होने पर जुर्माना लगता है और कवरेज भी लैप्स हो सकती है.
हेल्थ इंश्योरेंस के फ़ायदे
सबसे बड़ा फ़ायदा तो यह है कि किसी बीमारी या मेडिकल इमरजेंसी की स्थिति में आपकी सेविंग्स बच जाती हैं.
दूसरा बड़ा फ़ायदा है- कैशलेस ट्रीटमेंट. मतलब कि हेल्थ कवर होने की स्थिति में आपको अपनी पॉकेट से पैसा नहीं देना पड़ता और ख़र्च इंश्योरेंस कंपनी उठाती है.
ज़्यादातर स्टैंडर्ड पॉलिसी में हॉस्पिटल में एक फ़ीचर होता है- हॉस्पिटल नेटवर्क का, जहाँ आपको कैशलेस ट्रीटमेंट मिल जाता है.
हॉस्पिटलाइज़ेशन के अलावा और भी कई फ़ायदे मिल जाते हैं, जैसे मैटरनिटी बेनिफ़िट. कुछ पॉलिसी में तो डे केयर फ़ैसिलिटी भी मिल जाती हैं.
एक और फ़ायदा टैक्स बेनिफ़िट का भी है. अगर आप ओल्ड टैक्स रिजीम में हैं तो सेक्शन 80डी के तहत आपको टैक्स बेनिफ़िट मिल जाता है.
पॉलिसी लेते वक़्त रखें विशेष ध्यान
अब बात पॉलिसी में उन बातों की जिन पर विशेष ध्यान देना चाहिए.
सबसे पहले आपको देख लेना चाहिए कि आपके नज़दीकी अस्पतालों में किस पॉलिसी में कैशलेस ट्रीटमेंट की सुविधा उपलब्ध है.
दूसरा यह कि पॉलिसी में प्री और पोस्ट हॉस्पिटलाइज़ेशन चार्जेज़ कवर हो रहे हैं कि नहीं.
आमतौर पर स्टैंडर्ड पॉलिसी में प्री हॉस्पिटलाइजे़शन 30 से 60 दिनों का होता है, जबकि पोस्ट हॉस्पिटलाइजे़शन में 60 से 180 दिनों तक के ख़र्चे कवर होते हैं.
आप देख लें कि कवरेज पर किसी तरह की सीमा तो नहीं है. मसलन मैटरनिटी बेनिफ़िट में किसी पॉलिसी में 50 हज़ार रुपये तक की ही लिमिट हो सकती है और जहाँ आप ट्रीटमेंट करा रहे हों वहां ख़र्च ज़्यादा हो, तो इस बात का ख़्याल रखना चाहिए.
कुछ पॉलिसी में को-पे का ऑप्शन भी होता है, यानी कि मेडिकल बिल में आपको भी कुछ पैसा देना होगा.. को-पे क्लॉज़ को ध्यान से चेक कर लें.
पॉलिसी में प्री एक्ज़िस्टिंग डिज़ीज़ और वेटिंग पीरियड की क्या नियम और शर्तें हैं, इन्हें ध्यान से पढ़ लें, क्योंकि ये दो टर्म हैं, जिनका ज़िक्र क्लेम रिजेक्शन में सबसे ज़्यादा सुनने को मिलता है.
बीमा नियामक IRDAI कहता है कि पॉलिसी ख़रीदने के 48 महीने पहले तक जिस भी बीमारी का इलाज हुआ है, उसे प्री एक्ज़िस्टिंग डिज़ीज़ माना जाएगा. तो जब भी पॉलिसी लें, कंपनी से इसका ज़िक्र स्पष्ट रूप से कर दें. यानी बीमारी को छिपाना नहीं है बल्कि बताना है.
और अब बात वेटिंग पीरियड की तो स्टैंडर्ड पॉलिसी में ये आमतौर पर 2 से 4 साल का हो सकता है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित