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डोनाल्ड ट्रंप के इस फ़ैसले से भारत से ज़्यादा अमेरिका को हो सकता है नुकसान, यह है वजह
- Author, सौतिक बिस्वास और निखिल इनामदार
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़
पहले घबराहट, अफरा-तफरी और फिर व्हाइट हाउस की सफ़ाई. एच-1बी वीज़ा पर अमेरिका में काम करने वाले लाखों भारतीयों के लिए यह हफ़्ता परेशान करने वाला रहा.
शुक्रवार को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने स्किल्ड वर्कर्स के परमिट की लागत 50 गुना बढ़ाकर 1 लाख डॉलर (करीब 88 लाख रुपये) करने का एलान किया.
इसके बाद सिलिकॉन वैली की कंपनियों ने अपने कर्मचारियों से कहा कि वे देश से बाहर न जाएं. विदेशों में काम करने वाले लोग तुरंत फ़्लाइट्स खोजने लगे और इमीग्रेशन वकील आदेश को समझने में जुट गए.
शनिवार तक आते-आते व्हाइट हाउस ने माहौल शांत करने की कोशिश की और साफ़ किया कि यह फ़ीस सिर्फ़ नए आवेदकों पर लागू होगी और एक बार ही देनी होगी.
इसके बावजूद, लंबे समय से चल रहा एच-1बी प्रोग्राम अब भी अनिश्चित भविष्य का सामना कर रहा है. यह वही प्रोग्राम है जिसकी आलोचना कभी अमेरिकी कर्मचारियों को 'नुकसान पहुंचाने' के लिए हुई, तो कभी इसे 'दुनिया से टैलेंट लाने के लिए' सराहा गया.
इस वीज़ा ने दोनों देशों को बदलकर रख दिया था.
भारत के लिए एच-1बी उम्मीदों का जरिया बन गया. छोटे शहरों के कोडर डॉलर कमाने लगे, परिवार मिडिल क्लास में पहुंच गए और एयरलाइंस से लेकर रियल एस्टेट तक की इंडस्ट्री ने विदेश जाने वाले भारतीयों की नई पीढ़ी को सर्विसेज़ देना शुरू किया.
वहीं अमेरिका के लिए इसका मतलब था टैलेंट का अंबार, जिसने लैब्स, क्लासरूम, अस्पताल और स्टार्टअप्स को भर दिया.
आज गूगल, माइक्रोसॉफ़्ट आईबीएम जैसी कंपनियों को भारतीय मूल के सीईओ चला रहे हैं और अमेरिकी डॉक्टरों की वर्कफ़ोर्स में करीब 6% भारतीय डॉक्टर हैं.
एच1 बी वीज़ा में भारतीय रहे हैं आगे
एच-1बी प्रोग्राम में भारतीयों का दबदबा रहा है. हाल के वर्षों में 70% से ज़्यादा लाभार्थी भारतीय रहे हैं. चीन करीब 12% हिस्सेदारी के साथ दूसरे स्थान पर है.
टेक सेक्टर में यह और भी साफ़ है. 2015 में फ़्रीडम ऑफ़ इंफ़ॉर्मेशन एक्ट के तहत हुई एक जांच में पाया गया कि "कंप्यूटर" कैटेगरी की 80% से ज़्यादा नौकरियां भारतीय नागरिकों को मिली थीं. इंडस्ट्री के जानकारों का कहना है कि यह अनुपात तब से ज़्यादा बदला नहीं है.
मेडिकल सेक्टर भी दांव पर है. 2023 में 8,200 से ज़्यादा एच-1बी वीज़ा जनरल मेडिसिन और सर्जिकल अस्पतालों में काम करने के लिए मंजूर किए गए.
भारत अंतरराष्ट्रीय मेडिकल ग्रेजुएट्स का सबसे बड़ा सोर्स है. ये डॉक्टर अक्सर अमेरिका में एच-1बी वीज़ा पर होते हैं और सभी विदेशी डॉक्टरों का लगभग 22% हिस्सा हैं. क्योंकि विदेशी डॉक्टर अमेरिका के कुल डॉक्टरों का करीब एक चौथाई हैं, इसलिए भारतीय एच-1बी धारक अमेरिकी डॉक्टरों का लगभग 5-6% हिस्सा बनाते हैं.
एक्सपर्ट्स का कहना है कि सैलरी के आँकड़े दिखाते हैं कि ट्रंप का नया एक लाख डॉलर फ़ीस वाला नियम व्यावहारिक नहीं है.
2023 में नए एच-1बी कर्मचारियों की औसत सैलरी 94,000 डॉलर थी, जबकि पहले से सिस्टम में मौजूद लोगों की औसत सैलरी 129,000 डॉलर थी.
चूंकि यह फ़ीस सिर्फ नए कर्मचारियों पर लगेगी, ज्यादातर लोग अपनी कमाई से इसे पूरा कर ही नहीं पाएंगे.
निस्केनन सेंटर के इमीग्रेशन पॉलिसी एनालिस्ट गिल गुरेरा ने बीबीसी से कहा, "क्योंकि व्हाइट हाउस की ताज़ा गाइडलाइन कहती है कि फ़ीस सिर्फ नए एच-1बी आवेदकों पर लगेगी, इसलिए यह तुरंत नहीं बल्कि मध्यम और लंबे समय में कर्मचारियों की कमी पैदा करेगी."
भारत पर कैसे होगा असर?
भारत पर इसका असर पहले दिखेगा, लेकिन असली झटका अमेरिका को लग सकता है.
भारतीय आईटी कंपनियां जैसे टीसीएस और इन्फ़ोसिस पहले ही इस स्थिति से निपटने के लिए स्थानीय वर्कफोर्स तैयार कर रही हैं और काम को ऑफ़शोर शिफ़्ट कर रही हैं.
प्यू रिसर्च के आँकड़े बताते हैं कि आज भी एच-1बी पाने वालों में 70% भारतीय हैं. लेकिन 2023 में टॉप 10 एच-1बी एंप्लॉयर्स में सिर्फ तीन का भारत से संबंध था, जबकि 2016 में यह संख्या छह थी.
फिर भी, भारत का 283 अरब डॉलर का आईटी सेक्टर अपने अमेरिकी मॉडल पर निर्भरता के कारण कठिनाई का सामना करेगा. इसका आधे से ज़्यादा राजस्व अमेरिका से आता है.
आईटी इंडस्ट्री बॉडी नैसकॉम का कहना है कि वीज़ा फ़ीस बढ़ने से "कुछ ऑनशोर प्रोजेक्ट्स की निरंतरता पर असर पड़ सकता है."
क्लाइंट्स नए दाम मांग सकते हैं या प्रोजेक्ट रोक सकते हैं, जब तक कि कानूनी अनिश्चितता दूर न हो. कंपनियां अपने स्टाफ़िंग मॉडल पर दोबारा विचार कर सकती हैं, जैसे काम को ऑफ़शोर भेजना, अमेरिका में कम भर्ती करना और स्पॉन्सरशिप में ज़्यादा चुनिंदा होना.
सीआईईएल एचआर के आदित्य नारायण मिश्रा का कहना है कि भारतीय कंपनियां भी बढ़ी हुई वीज़ा लागत अमेरिकी क्लाइंट्स पर डालेंगी.
उन्होंने कहा, "जब एंप्लॉयर्स स्पॉन्सरशिप के भारी खर्च उठाने से हिचकेंगे, तब हम रिमोट कॉन्ट्रैक्टिंग, ऑफ़शोर डिलीवरी और गिग वर्कर्स पर ज़्यादा निर्भरता देख सकते हैं."
अमेरिका पर कैसे होगा असर?
अमेरिका पर इसका असर गंभीर हो सकता है. अस्पतालों में डॉक्टरों की कमी बढ़ सकती है, यूनिवर्सिटीज़ के लिए एसटीईएम छात्रों को आकर्षित करना मुश्किल हो जाएगा और छोटे स्टार्टअप्स, जिनके पास गूगल-अमेज़न जैसी लॉबिंग ताकत नहीं है, सबसे ज़्यादा प्रभावित होंगे.
केटो इंस्टीट्यूट के इमीग्रेशन स्टडीज़ डायरेक्टर डेविड बियर ने बीबीसी से कहा, "यह वीज़ा फ़ीस अमेरिकी कंपनियों को मजबूर कर देगी कि वे अपनी हायरिंग पॉलिसी पूरी तरह बदलें और काफ़ी काम ऑफ़शोर भेजें. यह उन फ़ाउंडर्स और सीईओ को भी रोक देगा, जो अमेरिका में अपने बिज़नेस को संभालने आते हैं. यह अमेरिकी इनोवेशन और कंपीटिशन को बड़ा झटका देगा."
गिल गुरेरा ने भी इस पर चिंता जताई. उनका कहना है, "टेक और मेडिकल जैसे सेक्टरों में नए कर्मचारियों की मांग बढ़ रही है. ये सेक्टर इतने अहम और स्पेशलाइज्ड हैं कि अगर कुछ साल भी कमी रही तो अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर गंभीर असर पड़ेगा."
उन्होंने कहा कि यह कदम भारतीय स्किल्ड वर्कर्स को दूसरे देशों की तरफ़ देखने के लिए प्रेरित करेगा और इसका असर अमेरिकी यूनिवर्सिटी सिस्टम पर भी पड़ेगा.
असल में सबसे बड़ा झटका भारतीय छात्रों को लगेगा. अमेरिकी यूनिवर्सिटीज़ में हर चार विदेशी छात्रों में से एक भारतीय है.
नॉर्थ अमेरिकन एसोसिएशन ऑफ़ इंडियन स्टूडेंट्स के फ़ाउंडर सुधांशु कौशिक, जो 120 यूनिवर्सिटीज़ में 25,000 छात्रों का प्रतिनिधित्व करते हैं, बीबीसी से कहते हैं, "यह एक सीधा हमला है. फ़ीस पहले ही दी जा चुकी है, यानी हर छात्र का 50,000 से 100,000 डॉलर तक का खर्च डूब गया और अमेरिकी वर्कफ़ोर्स में दाख़िल होने का सबसे बेहतर रास्ता अब ख़त्म हो गया."
उन्होंने अनुमान जताया कि अगले साल अमेरिकी यूनिवर्सिटीज़ में दाख़िले पर असर पड़ेगा, क्योंकि ज़्यादातर भारतीय छात्र ऐसे देशों का रुख़ करेंगे जहां वे "स्थायी रूप से बसने" की उम्मीद कर सकते हैं.
फिलहाल, टैक्स बढ़ोतरी का पूरा असर साफ़ नहीं है.
इमीग्रेशन वकीलों का मानना है कि ट्रंप का यह कदम जल्द ही कानूनी चुनौती का सामना करेगा.
गुरेरा का कहना है कि इसके नतीजे असमान होंगे. उन्होंने कहा, "मुझे आशंका है कि नई एच-1बी पॉलिसी अमेरिका के लिए कई नकारात्मक नतीजे लाएगी, हालांकि यह देखने में वक्त लगेगा कि वे क्या होंगे."
उन्होंने उदाहरण दिया, "क्योंकि कार्यकारी आदेश कुछ कंपनियों को छूट देता है, यह संभव है कि अमेज़न, एप्पल, गूगल और मेटा जैसी बड़ी कंपनियां एच-1बी फ़ीस नीति से बाहर निकलने का रास्ता खोज लें. लेकिन अगर सबको छूट मिल गई, तो इस फ़ीस को लगाने का मकसद ही ख़त्म हो जाएगा."
जैसे-जैसे हालात साफ़ होंगे, यह एच-1बी बदलाव विदेशी कर्मचारियों पर टैक्स कम और अमेरिकी कंपनियों और अर्थव्यवस्था के लिए एक तरह का स्ट्रेस टेस्ट ज़्यादा लगेगा.
एच-1बी वीज़ा धारक और उनके परिवार हर साल अमेरिकी अर्थव्यवस्था में लगभग 86 अरब डॉलर का योगदान देते हैं जिसमें 24 अरब डॉलर फ़ेडरल टैक्स और 11 अरब डॉलर स्टेट और स्थानीय टैक्स शामिल हैं.
अब यह इस पर निर्भर करेगा कि कंपनियां कैसे प्रतिक्रिया देती हैं. क्या अमेरिका इनोवेशन और टैलेंट में लीडर बना रहेगा या फिर ज़्यादा स्वागत करने वाली अर्थव्यवस्थाओं के सामने पिछड़ जाएगा.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित