तीन देशों ने किया फ़लस्तीन को मान्यता देने का एलान, आग बबूला हुआ इसराइल

नॉर्वे, स्पेन और आयरलैंड ने घोषणा की है कि वो औपचारिक रूप से अगले सप्ताह से फ़लस्तीन को एक राष्ट्र रूप में मान्यता दे देंगे.

नॉर्वे के प्रधानमंत्री जोनस गार स्तोर ने इसकी तारीख़ की भी घोषणा कर दी है. उन्होंने कहा है कि उनका देश फ़लस्तीन को राष्ट्र के तौर 28 मई को मान्यता देगा.

वहीं स्पेन के प्रधानमंत्री पेड्रो सांचेज़ ने कहा है कि इसराइल दो-राष्ट्र समाधान को जोखिम में डाल रहा है. उन्होंने फ़लस्तीन पर इसराइल की नीति को दर्द और तबाही की नीति कहा है.

इसराइल ने इसे लेकर कड़ी प्रतिक्रिया दी है. उसने इन तीन देशों से अपने राजदूत वापिस बुला लिए हैं.

इसराइली सरकार के प्रवक्ता ने बीबीसी से कहा कि मान्यता दिए जाने से न तो फ़लस्तीनी लोगों को मदद मिलेगी और न ही इसराइलियों को.

इसराइल के विदेश मंत्री काट्ज़ ने कहा कि ये 'हमास के हत्यारों को स्वर्ण पदक देने' जैसा है.

वहीं हमास और फ़लस्तीनी अथॉरिटी ने इस फ़ैसले का स्वागत किया है.

नॉर्वे के पीएम ने क्या कहा?

नॉर्वे के प्रधानमंत्री जोनस गार स्तोर ने कहा कि फ़लस्तीन को मान्यता देने का कदम उदारवादी ताकतों का समर्थन करने का एक साधन है जो 'लंबे और क्रूर संघर्ष' में अपनी ज़मीन खो रहे हैं.

ओस्लो में एक संवाददाता सम्मेलन में उन्होंने कहा कि फ़लस्तीनी राष्ट्र के बिना क्षेत्र में शांति नहीं हो सकती.

उन्होंने कहा, "फ़लस्तीनियों को मौलिक रूप से स्वतंत्र राष्ट्र का अधिकार है. इसराइलियों और फ़लस्तीनियों दोनों को अपने-अपने राष्ट्र में शांति से रहने का अधिकार है."

"1947 में संयुक्त राष्ट्र की विभाजन योजना का यही आधार था, 1949 में नॉर्वे और कई अन्य देशों ने इसराइल को मान्यता दी थी. फ़लस्तीनियों और इसराइलियों के अपने खुद के राष्ट्र के बिना मध्य पूर्व में शांति नहीं हो सकती और इसका दो राष्ट्र समाधान होना चाहिए."

"फ़लस्तीन के बिना दो-राष्ट्र समाधान नहीं हो सकता. दूसरे शब्दों में कहें तो मध्य पूर्व में शांति के लिए फ़लस्तीनी राष्ट्र की जरूरत है."

स्पेन के पीएम ने क्या कहा?

स्पेन में संसद को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री पेद्रो सांचेज़ ने कहा कि वो तीन कारणों से फ़लस्तीन को मान्यता देने जा रहे हैं.

उन्होंने कहा, "हम इसे तीन शब्दों में समझ सकते हैं- शांति, न्याय और स्थिरता. हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि दो राष्ट्र समाधान का सम्मान किया जाए. साथ ही सुरक्षा की पारस्परिक गारंटी होनी चाहिए."

"हमारे साथ-साथ कई अन्य देशों के लिए भी यह ज़रूरी है कि दोनों पक्ष शांति के लिए बातचीत करें और यही वजह है कि हम फ़लस्तीन को मान्यता देने जा रहे हैं."

पेद्रो सांचेज़ ने अपने संबोधन में इसराइली पीएम बिन्यामिन नेतन्याहू की कड़ी आलोचना की.

उन्होंने कहा, "अगर कोई एक बात मेरे लिए स्पष्ट है, तो वो ये है कि प्रधानमंत्री नेतन्याहू के पास फ़लस्तीन के लिए कोई शांति योजना नहीं है."

"सात अक्टूबर की घटना के बाद किसी आतंकवादी समूह से लड़ना सही है और ये ज़रूरी भी है. लेकिन नेतन्याहू के कदम से इतना दर्द और विनाश पैदा हो रहा है और ग़ज़ा और बाक़ी फ़लस्तीन में इतना विद्वेष है कि दो-राष्ट्र समाधान की संभावना ही गंभीर खतरे में है."

आयरलैंड के पीएम क्या बोले?

वहीं आयरिश प्रधानमंत्री साइमन हैरिस ने डबलिन में एक संवाददाता सम्मेलन में इस मुद्दे पर बात की. उन्होंने फ़लस्तीन को अलग राष्ट्र की मान्यता देने की बात को शांति के लिए ज़रूरी कदम बताया.

उन्होंने कहा, "नॉर्वे और स्पेन के साथ आज उठाया गया हमारा कदम, राष्ट्र के दर्जे के वैध अधिकार की एक और मान्यता है."

"यह दो-राष्ट्र समाधान के लिए समर्थन है. ये फ़लस्तीन और इसराइल दोनों के लिए शांति और सुरक्षा का एकमात्र भरोसे योग्य रास्ता है. फ़लस्तीन को मान्यता देने के फै़सले के लिए अनिश्चित काल तक इंतजार नहीं करना चाहिए था, ख़ासकर तब जब यह करना सही हो."

इसराइल की प्रतिक्रिया

अब जब तीन देशों ने फ़लस्तीन को अलग राष्ट्र का दर्जा देने की बात की है तो इसराइल ने इसे लेकर कड़ी प्रतिक्रिया दी है. उसने इन तीनों देशों से अपने राजदूत वापिस बुला लिए हैं.

इसराइली विदेश मंत्री, इसराइल काट्ज़ ने कहा है कि ये कदम उनके देश की सुरक्षा को ख़तरे में डालने वाला है इसलिए वो इन तीन देशों के राजदूतों को वापस बुला रहे हैं.

इसराइल काट्ज़ ने कहा कि ये 'हमास के हत्यारों और बलात्कारियों को स्वर्ण पदक देने' जैसा है.

धुर दक्षिणपंथी राष्ट्रीय सुरक्षा मंत्री इतेमार बेन-ग्विर ने भी इसराइल काट्ज़ के बयान को दोहराया है.

अल-अक्सा परिसर में उन्होंने पत्रकारों से कहा, "जिन देशों ने आज फ़लस्तीन को राष्ट्र की मान्यता देने की बात की है, वो नुख़बा फ़ोर्स (हमास की एलीट सेना), हत्यारों और अत्याचार करने वालों को इनाम दे रहे हैं. मैं उनसे कहता हूं कि हम फ़लस्तीनी राष्ट्र की घोषणा की अनुमति नहीं देंगे."

इसराइली सरकार के प्रवक्ता एवी हायमान ने बीबीसी से कहा कि इससे ज़मीनी स्तर पर किसी पक्ष को मदद नहीं मिलेगी.

उन्होंने कहा, "इसराइल एक गणतांत्रिक देश है. अगर इसराइल के लोग ये फ़ैसला लेते हैं, अगर बातचीत होती है और इस नतीजे तक पहुंचा जाता है... ये वो चर्चा है जो होनी चाहिए."

"बीते सौ साल से फ़लस्तीनी लोग एक फ़लस्तीनी राष्ट्र की बात से बार-बार इनकार करते रहे हैं. अगर नॉर्वे, स्पेन और आयरलैंड इस तरह की घोषणा करना चाहते हैं तो आप जानते हैं कि वो इतिहास में ग़लत पक्ष में खड़े हैं.... उन्हें वो करने दीजिए."

"इससे ज़मीनी स्तर पर न तो फ़लस्तीनियों को मदद मिलेगी, न इसराइलियों को मदद मिलेगी और न ही ये रास्ता हमें शांति के आसपास तक लेकर जाएगा."

वहीं बिन्यामिन नेतन्याहू के प्रवक्ता ताल हेनरिच ने कहा है, "ये तीनों देश आज दुनिया को, हमास को और उनके समर्थन करने वालों को ये संदेश दे रहे हैं कि अक्तूबर सात को जो जनसंहार हुआ उसकी क़ीमत मिल गई."

फ़ैसले पर हमास की प्रतिक्रिया

हमास और फ़लस्तीनी प्राधिकरण ने नॉर्वे, स्पेन और आयरलैंड के फ़ैसले का स्वागत किया है.

हमास ने कहा कि यह फै़सला फ़लस्तीनी मुद्दे पर अंतरराष्ट्रीय स्थिति में एक 'महत्वपूर्ण और निर्णायक' मोड़ साबित होगा.

समाचार एजेंसी एएफ़पी को दिए एक बयान में हमास के एक वरिष्ठ नेता बासेम नईम ने कहा कि यह फ़लस्तीनी लोगों के कड़े प्रतिरोध की वजह से संभव हो पाया है.

नईम ने कहा कि लगातार मिल रहीं ये मान्यताएं फ़लस्तीनी लोगों के दृढ़ता और प्रतिरोध का परिणाम है.

वहीं फ़लस्तीनी प्राधिकरण के सदस्य और रामल्लाह में बहुपक्षीय मामलों के सहायक मंत्री अम्मार हिजाज़ी ने इस कदम को शांति के लिए महत्वपूर्ण बताया.

उन्होंने कहा, "हमारी राय में यह कदम एक ऐसे महत्वपूर्ण समय पर आया है जब इसराइल इस संघर्ष को पटरी से उतारने और लोगों के बीच शांति बहाल करने की संभावनाओं को ख़त्म करने की कोशिश में है."

"ऐसे में ये देश यह बताने के लिए एक साथ खड़े हुए हैं कि इस क्षेत्र में शांति का एकमात्र रास्ता फ़लस्तीनी लोगों को उनकी आज़ादी, उनके अधिकार और विशेष रूप से आत्मनिर्णय का अधिकार देकर है."

ओआईसी और मुस्लिम वर्ल्ड ने किया फ़ैसले का स्वागत

इस्लामिक सहयोग संगठन (ओआईसी) ने इसे ऐतिहासिक कदम बताते हुए कहा कि यह अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों के अनुरूप है और इससे फ़लस्तीनी लोगों के अधिकारों को मज़बूती मिलेगी.

संगठन ने एक बयचान जारी कर कहा कि इससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फ़लस्तीन को राष्ट्र के तौर पर बढ़ावा मिलेगा.

ओआईसी का कहना है कि वह इस तरह के प्रयासों की सराहना करता है जो इसराइल के फ़लस्तीन पर कब्ज़े को ख़त्म करने के उद्देश्य को आगे बढ़ाते हैं.

संगठन ने शांति और स्थिरता हासिल करने के उद्देश्य से दुनिया के उन सभी देशों से फ़लस्तीन को मान्यता देने का अनुरोध किया है.

मुस्लिम स्कॉरल्स के संगठन मुस्लिम वर्ल्ड लीग ने भी इस फ़ैसले का स्वागत किया है.

एक बयान में संगठन के सेक्रेटरी जनरल मोहम्मद बिन अब्दुल करीम अल-इस्सा ने कहा है कि "ये फ़ैसला फ़लस्तीनी लोगों की अपनी पहचान और अलग राष्ट्र के मूलभूत अधिकारों को लेकर वैश्विक जागरूकता में बदलाव को दिखाता है."

उन्होंने इसे एक ज़िम्मेदार कदम बताया और अन्य मुल्कों से अपील की कि वो भी फ़लस्तीनी लोगों के मानवाधिकारों और क़ानूनी अधिकारों के लिए इस तरह के कदम उठाएं.

सऊदी अरब ने बताया 'सकारात्मक'

सऊदी अरब ने फ़लस्तीन को राष्ट्र का दर्जा देने के नॉर्वे, स्पेन और आयरलैंड के फ़ैसले का स्वागत किया है.

सऊदी अरब के विदेश मंत्रालय ने इसे एक सकारात्मक कदम बताया है और अन्य मुल्कों से अपील की है कि वो भी इस तरह का कदम उठाएं .

विदेश मंत्रालय ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय ख़ासकर सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्यों से कहा है (जिन्होंने अब तक फ़लस्तीनी राष्ट्र को मान्यता नहीं दी है) कि वो 1967 में तय हुई समा के अनुसार फ़लस्तीनी राष्ट्र को मान्यता दें.

विदेश मंत्रालय ने उम्मीद जताई है कि इससे फ़लस्तीनी लोगों को उनका हक मिलने में मदद मिलेगी और सभी के लिए न्याय और व्यापक शांति की राह खुलेगी.

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