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मुर्शिदाबाद में हिंसा के बाद अब शांति, लेकिन ख़ौफ़ के साये में हैं लोग- ग्राउंड रिपोर्ट
- Author, सलमान रावी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, मुर्शिदाबाद से
मुर्शिदाबाद का धुलियान पिछले कुछ दिनों से चर्चा में है. इसी के आसपास के इलाक़े में हिंसा हुई थी.
धुलियान में ही एक जगह है, जाफ़राबाद. यहाँ के लोगों को याद नहीं है कि उन्होंने इससे पहले कब किसी भी तरह का सांप्रदायिक तनाव देखा है. लोग कहते हैं, कि चुनाव के समय थोड़ी-बहुत हलचल ज़रूर रहती है. हालाँकि, इतनी हिंसा उन्होंने पहले नहीं देखी.
बीबीसी ने ज़िले के हिंसा से प्रभावित इलाक़ों का जायज़ा लिया. अब यहाँ आने पर ऐसा लगता है, जैसे यह कोई लड़ाई का मैदान रहा हो. जगह-जगह पर जली हुई गाड़ियों के ढेर, सड़कों पर पत्थर और जले हुए, टूटे घर दिखते हैं.
यह हिंसा वक़्फ़ संशोधन क़ानून के ख़िलाफ़ हुए प्रदर्शन के दौरान हुई. इसमें तीन लोग मारे गए हैं.
"अब हमारा संसार कौन चलाएगा"
पारुल दास के घर के पास हलचल है. ये हलचल आस-पड़ोस वालों और मीडियाकर्मियों की है. मगर पारुल किसी से बात नहीं करना चाहती हैं. वो सदमे में हैं.
सदमा, अपने पति 72 वर्षीय हरगोविंद दास और बेटे चंदन दास को खोने का है. वो सुबक रही हैं लेकिन कुछ कहती नहीं हैं.
पारुल दास अपने कच्चे मकान के दालान में एक कुर्सी पर बैठी अपनी पोती को दिलासा देती बार-बार रो पड़ती हैं. हमारे काफ़ी देर तक इंतज़ार करने के बाद, वो धीरे से कुछ कहती हैं.
पारुल ने कहा, "क्या बोलूँ? क्या बताऊँ? बेटा और पति, दोनों ही मार दिए गए. अब हमारे संसार को कौन चलाएगा. मेरे बेटे के तीन बच्चे हैं. दो लड़के, एक लड़की. सब छोटे-छोटे हैं. दस-बारह साल के उसके बेटे हैं. लड़की छोटी है. सरकार ने क्या दिया हमको ? कुछ भी नहीं."
मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के सचिव मोहम्मद सलीम अपने कार्यकर्ताओं के साथ परिवार से मिलने आए थे. उन्होंने दावा किया था कि 72 वर्षीय मृतक हरगोविंद दास उनकी पार्टी के पोलिंग एजेंट रह चुके हैं.
लेकिन पारुल इस बात से इनकार करती हैं कि उनके पति और बेटा कभी किसी भी राजनीतिक दल के कार्यकर्ता रहे हैं.
हरगोविंद की बेटी ज्योतिका भी यही बात कहती हैं. वो हमसे बताने लगीं कि उनके पिता और भाई चंदन बकरी पालन का काम करते थे.
ज्योतिका, घटना की चश्मदीद भी हैं. पास में ही उनका घर है. घटना के दिन का ज़िक्र करते हुए वो सहम जाती हैं. वह बताती हैं कि भीड़ चारों तरफ़ से इनके घरों पर टूट पड़ी थी.
वो कहती हैं, "वे लोग मेरे पिता और भाई को खींच कर बाहर निकालकर ले गए. हम क्या करते? उनका सामना हम लोग कैसे करते? किसी के हाथ में तलवार थी तो किसी के हाथ में भुजाली, बम, पिस्तौल. उनसे कैसे सामना करते. डर के मारे आप लोग भी तो उनका सामना नहीं कर सकते थे. वे बम पटक रहे थे."
उनका कहना है कि हमलावर दोनों को घसीटकर बाहर ले गए और धारदार हथियारों से मार डाला.
उनके मुताबिक़, हमलावरों ने घर में घुसकर सब कुछ तहस-नहस कर डाला.
जब हम वहाँ पहुँचे तो टूटे हुए सामान जस के तस पड़े मिले. इस बीच, लोगों का वहाँ आना-जाना लगा हुआ था.
पुलिस का क्या कहना है?
शमशेरगंज पुलिस स्टेशन के एक अधिकारी ने नाम नहीं बताने की शर्त पर कहा कि पिता-पुत्र की हत्या के सिलसिले में 50 के आसपास लोगों को गिरफ़्तार किया गया है. उस वक़्त मौक़े पर मौजूद आसपास के रहने वालों ने वीडियो बनाए थे. उस आधार पर हमलावरों की शिनाख़्त की गई. उसी आधार पर गिरफ़्तारियाँ की गई हैं.
पुलिस ने यह भी बताया कि गिरफ़्तार होने वाले दो लोग हरगोविंद दास के पडोसी थे. इनमें से एक दिलदार नादाब को सुती से लगे बांग्लादेश के बॉर्डर के पास से गिरफ़्तार किया गया.
दूसरे अभियुक्त कालू को बीरभूम से गिरफ़्तार किया गया है. कई और लोगों की गिरफ़्तारियाँ भी की गई हैं लेकिन पुलिस ने उनकी शिनाख्त ज़ाहिर करने से इनकार कर दिया.
पश्चिम बंगाल के अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (लॉ एंड ऑर्डर) जावेद शमीम ने शमशेरगंज में पत्रकारों से बात करते हुए दावा किया है कि बहुत संभावना है कि घटना को अंजाम देने के बाद कई उपद्रवी झारखंड की तरफ़ भागने में कामयाब हो गए हों.
वह यह भी दावा करते हैं कि दिलदार नादाब बांग्लादेश की तरफ़ भागना चाहता था. उन्होंने यह भी स्वीकार किया है कि दास परिवार ने जो प्राथमिकी दायर की है, उसमें कुल पाँच लोग ऐसे हैं जो उनके पड़ोसी हैं.
हिंसा किस इलाक़े में कब हुई?
मुर्शिदाबाद के जिस इलाके में हिंसा हुई है, वह बांग्लादेश की सीमा से 40 किलोमीटर की दूरी पर है. मुर्शिदाबाद में यह सब कुछ 11 अप्रैल को हुआ था. उस दिन वक़्फ़ क़ानून के ख़िलाफ़ धुलियान मोड़ पर लोगों से जमा होने और विरोध करने का आह्वान किया गया था. लोग जमा भी हुए. विरोध शुरू भी हुआ. इसी दौरान इस मजमे में कब उपद्रवी घुस गए, किसी को पता नहीं चल पाया.
हिंसा धुलियान मोड़ से ही शुरू हो गई थी. यह राष्ट्रीय राजमार्ग पर है. यहाँ क्षतिग्रस्त पुलिस की चौकी साफ़ देखी जा सकती है. इसके ठीक पीछे रेलवे ट्रैक है.
प्रदर्शनकारियों ने इसे भी जाम कर दिया था. यहाँ भी केबिन के कमरे और रेलवे की दूसरी संपत्तियों को बुरी तरह नुक़सान पहुँचाया गया. कई और स्थानों पर ट्रेनें रोकी गई थीं.
धुलियान मोड़ से शुरू हुई हिंसा देखते-देखते आसपास के दूसरे इलाक़ों में भी फैल गई. अनियंत्रित जुलूस तोड़फोड़ और आगज़नी करता हुआ शहर में दाख़िल हो गया.
हिंसा ज़्यादतर मुर्शिदाबाद के धुलियान बाज़ार, रानीपुर, जाफ़राबाद, सुती इलाक़े में हुई.
सुती बांग्लादेश सीमा के एकदम पास है. हिंसा में कितना नुक़सान हुआ, अब तक पूरा अंदाज़ा नहीं लगा है. प्रशासन नुक़सान के आकलन में लगा है.
'लोगों पर किसी का नियंत्रण नहीं था'
अनीसुर रहमान (बदला हुआ नाम) यहाँ के रहने वाले हैं. उन्हें प्रदर्शन के आयोजकों से 'बेहद नाराज़गी' है. वो कहते हैं, "आपने लोगों को इकट्ठा कर लिया. इतना बड़ा मजमा लगा. मगर ये मजमा किसके कंट्रोल में था, यह बड़ा सवाल है. जब लोगों को कंट्रोल करने की क्षमता नहीं है तो फिर इस तरह का आयोजन नहीं करना चाहिए था."
हमारी उनसे मुलाक़ात शमशेरगंज थाने से कुछ आगे मौजूद मस्जिद के पास हुई. अब इस पूरी सड़क पर अर्धसैनिक बलों की तैनाती है.
कुछ और दूरी पर स्थानीय पार्षद का भी घर है. मगर वह हमें घर पर नहीं मिले.
मुजीबुर रहमान यहीं के निवासी हैं. वह भी हालात से काफ़ी परेशान दिखे.
वे कहते हैं, "यही सोचते हैं कि यहाँ जो कुछ हुआ है, वह फिर कभी न हो. बाहर के कुछ लोगों ने आकर ऐसा किया है. यहाँ के लोग हैं, सभी अच्छे हैं. हम लोग सब हिन्दू-मुस्लिम एक साथ ही रहते हैं. हम लोगों को कोई एक-दूसरे से तकलीफ़ भी नहीं थी. उसके बाद वक्फ़ बिल पर प्रोटेस्ट हो गया. वहीं से दिक़्क़त शुरू हो गई है. लोग शक की निगाहों से देखते हैं. हिन्दू दोस्त भी और पुलिसवाले भी.''
इलाक़े के एक और मुस्लिम नागरिक मेहेलदार कहते हैं कि हालात बेशक सामान्य होने की तरफ़ बढ़ रहे हों, मगर इस घटना ने लोगों के दिलों में गहरे घाव छोड़े हैं.
वे दावा करते हैं कि नुक़सान समाज के सभी वर्गों के लोगों का हुआ है. उनके मुताबिक, घटना के अगले दिन कुछ मुसलमानों की दुकानों को निशाना बनाया गया. वह कहते हैं, "दोनों तरफ़ से हुआ. दोनों तरफ़ से लोग इसके शिकार हुए. अब ज़िंदगी पटरी पर कैसे आए, हम यही सोच रहे हैं."
शमशेरगंज में शिवमंदिर के पास मुसलमानों की दुकानों पर हमले के निशान दिखते हैं. हमने कुछ प्रभावित लोगों से बात की. हालाँकि, वे अपना नाम ज़ाहिर करने को तैयार नहीं हुए.
'सालों का भरोसा पल भर में टूट गया'
राज कुमार बर्मन मिठाई की दुकान चलाते हैं. जुलूस निकलने की बात उन्हें पता थी लेकिन वह आश्वस्त थे कि कुछ नहीं होगा. उन्हें यह भरोसा इसलिए था कि यहाँ सभी एक-दूसरे को जानते हैं और उनकी दुकान बहुत पुरानी है.
मगर उनका यह विश्वास अब आँसुओं में बह गया. उनकी दुकान लूट ली गई. उसमें तोड़फोड़ भी की गई. उन्हें अफ़सोस है कि पुलिस आई तो ज़रूर मगर बहुर देर से.
वह बताते हैं, "पुलिस को हम लगातार फ़ोन करते रहे. मगर वह बहुत देर से आई. एक घंटे के बाद आई भी तो वे सिर्फ़ दो-चार लोग ही थे. उधर पाँच हज़ार, दस हज़ार लोग थे. पुलिस भी मजबूर."
मुस्लिम समुदाय भी हुआ हिंसा का शिकार
शमशेरगंज पुलिस स्टेशन के बगल से होते हुए हम रानीपुर के तारा बागान के इलाक़े में पहुँचे.
यहाँ 17 साल के इदरीस का घर है. इदरीस को हिंसा के दौरान पेट में गोली लगी थी. यहाँ के रहने वालों का दावा है कि कई लोग ऐसे हैं जिन्हें घटना के दिन गोली लगी थी.
इसी दौरान सुती के रहने वाले 17 साल के एजाज़ की भी गोली लगने से मौत हो गई थी. हम एजाज़ के परिवार वालों से मिलने के लिए गए. जिस वक़्त हमारी टीम पहुँची तो वहाँ कोई नहीं मिला. घर बंद था. पड़ोसियों के घर भी बंद मिले.
इदरीस का इलाज बेहरामपुर में चल रहा है. उनकी दादी को भी इस घटना के बाद दिल का दौरा पड़ा. घर में कोहराम है. इदरीस की रिश्तेदार शिखा बीबी बीबीसी से कहती हैं कि वह बीड़ी के पत्ते बेच कर वापस घर लौट रहा था.
उन्होंने कहा, "जब उसको गोली लगी तो उसके बदन से सारा ख़ून बह गया. ख़ून निकल जाने की वजह से ही डॉक्टरों ने हाथ नहीं लगाया था. बोले कि पहले ख़ून चढ़ाना पड़ेगा."
इदरीस के घर पर ही मौजूद रुकसाना बीबी को भी ताज्जुब है कि उनके इलाक़े में हिंसा कैसे हुई. वे बातों-बातों में कहती हैं, "कभी भी हमारे इलाक़े में इस तरह का दंगा नहीं हुआ था. पहली बार ऐसा हुआ. यहीं पर, हमारे मोहल्ले में ही तो इतने सारे हिंदू रहते हैं. हम उन पर हमला क्यों करें ? हम सब आपस में मिल-जुल कर रहते हैं."
पुलिस कह रही है, कड़ी सज़ा दिलाएँगे
पुलिस का दावा है कि हिंसा भड़काने में जिन लोगों का हाथ हो सकता है, उनकी निशानदेही की जा चुकी है. अब तक 250 से ज़्यादा लोगों को गिरफ़्तार किया जा चुका है.
अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (लॉ एंड ऑर्डर) जावेद शमीम पत्रकारों से बात करते हुए कहते हैं, "जो-जो संलिप्त हैं इस दंगे और हिंसा में, वे कोई भी हों, राजनीतिक दल से जुड़े हुए ही क्यों न हों, कट्टरपंथी तत्व हों, किसी सामाजिक संगठन से जुड़े लोग हों, एनजीओ से जुड़े लोग हों, हमें इसकी कोई परवाह नहीं है. हमारा सिर्फ़ और सिर्फ़ यही प्रयास है कि जो भी इस पूरी हिंसा के घटनाचक्र में शामिल रहा हो, उसे कड़ी सज़ा दिला पाएँ."
बड़ी संख्या में केंद्रीय अर्धसैनिक बलों की तैनाती जारी है. केंद्रीय रिज़र्व पुलिस फ़ोर्स (सीआरपीएफ़) से लेकर सशस्त्र सीमा बल (एसएसबी) तक की टुकड़ियों को तैनात किया जा रहा है. पश्चिम बंगाल सरकार के एक प्रशासनिक अधिकारी कहते हैं कि इतनी भारी संख्या में अर्धसैनिक बलों की तैनाती इसलिए की जा रही है ताकि लोगों के बीच आत्मविश्वास लौटे. सामान्य जीवन एक बार फिर बहाल हो जाए.
मुख्यमंत्री ने किया मुआवज़े का एलान
इस बीच, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने मुर्शिदाबाद हिंसा में मरने वाले तीन लोगों के परिवार के लिए बुधवार को मुआवज़े की घोषणा की.
ममता बनर्जी बुधवार को कोलकाता के नेताजी इंडोर स्टेडियम में इमामों के साथ एक बैठक कर रही थीं. इसी दौरान उन्होंने कहा, "हिंसा में दो परिवारों के तीन लोगों की मौत हुई है. उनके परिवार वालों को 10-10 लाख रुपये का मुआवज़ा दिया जाएगा."
साथ ही मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि हिंसा के दौरान जिनके मकानों और दुकानों को नुक़सान पहुँचा है, उनको भी मुआवज़ा दिया जाएगा. पश्चिम बंगाल सरकार के मुख्य सचिव मनोज पंत घटनास्थल का दौरा करेंगे. उसके बाद मुआवज़े की रक़म तय की जाएगी.
इस बीच, राज्य पुलिस ने मुर्शिदाबाद की घटना की जाँच के लिए नौ सदस्यों के विशेष जांच दल (एसआईटी) का गठन भी कर दिया है. ख़बरों के मुताबिक, मुर्शिदाबाद रेंज के उप महानिरीक्षक (डीआईजी) इस एसआईटी का नेतृत्व करेंगे.
आपसी संबंधों पर पड़ा असर
11 अप्रैल की हिंसा ने सब कुछ बदल कर रख दिया है. इस हिंसा ने लोगों के बरसों पुराने आपसी संबंधों को ठेस पहुँचाई है. यहाँ लोग हमेशा एक-दूसरे के त्योहार और सुख-दुख में शामिल रहा करते थे. लेकिन बांग्ला नव वर्ष पोइला बैसाख की शुरुआत ही डर, नफ़रत और शक की बुनियाद पर हुई है.
जाफ़राबाद के विश्वजीत दास के मन में भी कई तरह के सवाल उठ रहे हैं. वह अब डरे हुए हैं और कहते हैं, "मेरा सरकार से सिर्फ़ एक ही निवेदन है कि हम यहाँ शांति से रह पाएँ. अभी जो यहाँ के हालात हैं– अगर यहाँ से फ़ोर्स चली जाती है तो हमें पता नहीं फिर हम कैसे बच पाएँगे."
इनकी पड़ोसी कावेरी और उनका परिवार सहमा हुआ है. वे बीबीसी से बोलीं, "हमें अब डर लग रहा है. अगर वे फिर से हमला करने आ गए तो हम लोग क्या करेंगे ? वही सबसे बड़ा डर है मेरा और मेरे परिवार के लोगों का. हमारे घर पर भी हमला हुआ. दुकान में आगज़नी की गई. अब फ़ोर्स आई है. कल चली जाएगी. तब क्या करेंगे. यहाँ से जाने पर मजबूर होना पड़ेगा."
लोगों के बीच एक-दूसरे पर कम होते भरोसे की बहाली के प्रयास तो ज़रूर चल रहे हैं और इसके दावे भी किए जा रहे हैं. हालाँकि, हिंसा के बाद बढती हुई खाई को पाट पाना मुश्किल काम ज़रूर है. इसे सामान्य होने में लम्बा वक़्त लग सकता है. अगले साल प्रदेश में विधानसभा के चुनाव हैं. ऐसे में लोगों को आशंका है कि कहीं फिर से माहौल ख़राब करने के प्रयास न किए जाएँ.
(बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित)