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मज़दूरी कर रहे शुभम को जब टीचर ने फ़ोन पर नीट पास करने की बधाई दी
- Author, सुब्रत कुमार पति
- पदनाम, भुवनेश्वर से बीबीसी हिंदी के लिए
ओडिशा के खोरधा ज़िले के शुभम नीट एग्ज़ाम पास करने के बाद से ही चर्चा में हैं. अब उन्हें एक मेडिकल कॉलेज में दाख़िला भी मिल गया है.
शुभम का कहना है कि उन्हें पिछले कुछ समय में हुई चीज़ों पर यक़ीन ही नहीं हो पा रहा और अब भी यह किसी सपने जैसा लगता है.
वह कहते हैं कि अपने माता-पिता को मज़दूरी करते देख वे हमेशा सोचते थे कि घर की आर्थिक स्थिति बदलने के साथ ही दूसरों के लिए भी कुछ करेंगे.
डॉक्टर बनने का सपना उनके दिल-दिमाग़ पर काफ़ी पहले से छाया हुआ था और इसे पूरा करने के लिए उन्होंने ख़ुद भी मज़दूरी की.
शुभम अब अपने डॉक्टर बनने के ख़्वाब के काफ़ी नज़दीक आ गए हैं.
ओडिशा के खोरधा ज़िले के बाणपुर ब्लॉक के मुदुलिडिहा गांव के एक ग़रीब आदिवासी परिवार से आने वाले शुभम तीन भाई-बहन हैं. उनके माता-पिता खेती के साथ-साथ मज़दूरी करके घर चलाते हैं. पूरा परिवार एक कमरे के मकान में रहता है.
उनके गांव तक कोई पक्की सड़क भी नहीं जाती. बीबीसी हिन्दी की टीम तीन किलोमीटर तक पैदल चलने के बाद उनके घर तक पहुंच पाई.
शुभम के पड़ोसी प्रदीप शबर ने बीबीसी हिन्दी को बताया कि इस गांव में डॉक्टर बनने का सपना देखने वाले शुभम पहले व्यक्ति हैं.
जब नीट का रिजल्ट आया तब मज़दूरी कर रहे थे शुभम
रिज़ल्ट आने से पहले शुभम बेंगलुरु में एक कंस्ट्रक्शन साइट पर मज़दूरी करते थे. शुभम के एक शिक्षक ने उन्हें फ़ोन कर नीट पास करने पर बधाई दी थी.
शुभम उस दिन को याद करते हुए बताते हैं, "शिक्षक ने मुझे खुशी से मिठाई खिलाने को कहा. मैं सोचने लगा कि उन्होंने ऐसा क्यों कहा. फिर उन्होंने मुस्कुराते हुए बताया कि मैंने नीट परीक्षा पास कर ली है."
"मुझे ऐसा लग रहा था जैसे मैं कोई सपना देख रहा हूं. मैं अपने आंसुओं को रोक नहीं पाया और अगले दिन उस ठेकेदार से अनुमति लेकर घर के लिए निकल गया."
मज़दूरी करने बेंगलुरु क्यों गए थे शुभम?
शुभम शबर की सफलता के पीछे एक संघर्ष की कहानी है. 12वीं की पढ़ाई के बाद उनके घर की आर्थिक हालत और बिगड़ गई थी. आगे की पढ़ाई के लिए पैसों की सख़्त ज़रूरत थी.
इसी ज़रूरत की वजह से वे बेंगलुरु गए और वहां मज़दूरी करने लगे. सुबह से शाम तक ईंट, बालू और सीमेंट ढोना, भारी सामान उठाना, धूप और धूल में घंटों काम करना पड़ता था.
तीन महीने तक उन्होंने बेंगलुरु में मज़दूरी की और लगभग 45,000 रुपये कमाए. मज़दूरी का काम शारीरिक रूप से बेहद थकाने वाला था. उन्होंने कमाई में से 25,000 रुपये बचाकर रखे ताकि मेडिकल कॉलेज में दाख़िले के समय फ़ीस जमा करने में मदद मिल सके.
10वीं की कक्षा में शुभम को 84 फ़ीसदी अंक मिले थे. उन्होंने भुवनेश्वर के बीजेबी कॉलेज से 12वीं की पढ़ाई की. इसी दौरान उन्होंने नीट की तैयारी के लिए कोचिंग लेने का फ़ैसला किया.
शुभम कहते हैं, "मुझे अपनी आर्थिक स्थिति का पूरी तरह से ख़्याल था. मेरे मां-बाबा हम लोगों को खाना खिलाने के लिए काफ़ी मेहनत करते हैं. मैं हमेशा से ज़िंदगी में कुछ करना चाहता था."
बेंगलुरु जाने के फ़ैसले के बारे में शुभम बताते हैं, "जब नीट परीक्षा पूरी हो चुकी थी तो मैंने कुछ पैसे कमाने के बारे में सोचा. मैंने एक स्थानीय ठेकेदार से संपर्क किया जिसने मुझे बेंगलुरु भेज दिया. मैंने जो पैसे बचाए, उससे मुझे मेडिकल कॉलेज में दाख़िला मिल गया."
शुभम ने कहा, "मां और बाबा ने मुझे बेंगलुरु जाने से मना किया था. उन्होंने कहा था कि तुम तो अभी स्कूल से आए हो. तुम्हारे हाथ-पैर सख़्त नहीं हैं. ऐसे काम कैसे करोगे? फिर भी मुझे जाना पड़ा."
शुभम ने आगे कहा, "एक आदिवासी किसान के बच्चे के रूप में मैंने सपने देखने की हिम्मत की. अब मैं डॉक्टर बनकर लोगों की सेवा करने के अपने बचपन के सपने को साकार करना चाहता हूं."
सरकार से परिवार को उम्मीदें
शुभम की मां रंगी शबर को उम्मीद है कि शुभम की पढ़ाई का ख़र्चा सरकार उठाएगी.
उन्होंने बीबीसी से कहा, "हम बहुत ग़रीब लोग हैं. सरकार राशन दे रही है तो हम दो वक्त का खाना खा पाते हैं. अच्छा खाना हमारे नसीब में नहीं है. शुभम के पिताजी ने ठेकेदार से एडवांस लेकर उसका एडमिशन करवाया है. हमारा बच्चा अब डॉक्टरी पढ़ने जा रहा है. ऐसे में अगर सरकार मदद करेगी तो मेरा बच्चा आगे डॉक्टर बन पाएगा और दूसरे लोगों की मदद कर पाएगा."
19 साल के शुभम को ओडिशा के महाराजा कृष्ण चंद्र गजपति मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल में दाख़िला मिला है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित
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