बांग्लादेश में आरक्षण के ख़िलाफ़ हिंसक प्रदर्शन के बाद शिक्षण संस्थान बंद

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- Author, अक़बर हुसैन, अनबरासन एथिराजन
- पदनाम, ढाका और लंदन में मौजूद बीबीसी संवाददाता
बीते दिनों बांग्लादेश में सरकारी नौकरियों में आरक्षण को लेकर भड़की हिंसा में छह लोगों की मौत के बाद, वहां के शिक्षण संस्थानों को अनिश्चित काल के लिए बंद कर दिया गया है.
यूनिवर्सिटी के छात्र बीते कुछ दिनों से 1971 के मुक्ति युद्ध में लड़ने वाले सैनिकों के बच्चों के लिए सरकारी नौकरियों में आरक्षण का विरोध कर रहे थे.
1971 में पाकिस्तान से आज़ादी की जंग लड़ने वालों को यहां वॉर हीरो कहा जाता है. देश में एक तिहाई सरकारी नौकरियां इन वॉर हीरो के बच्चों के लिए आरक्षित हैं.
इसी के ख़िलाफ़ छात्र बीते कुछ दिनों से रैलियां निकाल रहे थे. छात्रों का कहना है कि आरक्षण की ये व्यवस्था भेदभावपूर्ण है, जिसकी जगह पर मैरिट के आधार पर नौकरी दी जानी चाहिए.
बांग्लादेश में कुछ नौकरियां महिलाओं, नस्लीय अल्पसंख्यकों और विकलांगों के लिए भी आरक्षित हैं.

क्या है पूरा मामला?
इस सप्ताह राजधानी ढाका समेत देश के कई शहरों में आरक्षण का समर्थन करने वाले छात्र और विरोध करने वाले छात्रों के बीच हिंसक झड़पें हुईं.
इनमें बांग्लादेश की सत्ता पर काबिज़ अवामी लीग का छात्र संगठन बांग्लादेश छात्र लीग (बीसीएल) भी शामिल है.
छात्रों के दोनों गुटों ने पत्थरों और लाठियों से एक-दूसरे पर हमले किए. उन्हें तितर बितर करने के लिए पुलिस ने आंसू गैस के गोले दाग़े और रबर की गोलियां चलाईं.
छात्र एक्टिविस्टों का कहना है कि इन हमलों में सैकड़ों लोग घायल हुए हैं.
बांग्लादेश में सरकारी नौकरी करने वालों की काफ़ी इज़्ज़त होती है क्योंकि उनकी तनख़्वाह अच्छी होती है. देखा जाए तो कुल नौकरियों में आधी से अधिक किसी न किसी कैटगरी के तहत आरक्षित होती है. इन आरक्षित नौकरियों की संख्या लाखों में है.
आलोचकों का कहना है कि इस आरक्षण व्यवस्था का लाभ उन लोगों को मिलता है, जो सरकार समर्थक गुटों से हैं और जो इस साल जनवरी में लगातार चौथी बार देश की प्रधानमंत्री बनी शेख़ हसीना के समर्थक हैं.
साल 2018 में विरोध प्रदर्शनों के बाद शेख़ हसीना सरकार ने आरक्षण व्यवस्था को ख़त्म कर दिया था.
लेकिन इस साल जून की शुरुआत में ढाका हाई कोर्ट ने अधिकारियों को आरक्षण व्यवस्था फिर से लागू करने का आदेश दिया, जिसके बाद एक बार फिर देश में इसे लेकर विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए हैं.
बांग्लादेश से जुड़ी और रिपोर्ट्स पढ़ें-

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आरोप-प्रत्यारोप
आरक्षण का विरोध करने वाले आरक्षण विरोधी आंदोलन के संयोजकों में से एक अब्दुल्लाह सालेही आयुन ने बीबीसी से कहा, "इस हिंसा के लिए बीसीएल के सदस्य ज़िम्मेदार हैं. उन्होंने प्रदर्शनकारियों की हत्या की है. पुलिस ने आम छात्रों के बचाने के लिए हस्तक्षेप नहीं किया."
अधिकारियों का कहना है कि ताज़ा हिंसा में दक्षिण के तटीय शहर चटगांव में तीन लोगों की और ढाका में दो लोगों की मौत हुई है. वहीं उत्तरी शहर रंगपुर में गोली लगने से एक छात्र की मौत हुई है.
मीडिया में आ रही रिपोर्टों के अनुसार मारे गए लोगों में से तीन छात्र हैं, हालांकि अधिकारियों ने अभी इसकी पुष्टि नहीं की है.
सरकार ने विपक्षी पार्टियों पर हिंसा का आरोप लगाया है.
बांग्लादेश के क़ानून मंत्री अनिसुल हक़ ने बीबीसी को बताया, "विपक्षी जमात-ए-इस्लामी और बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) के छात्र संगठन के सदस्य, आरक्षण विरोधी आंदोलन में आ गए हैं. यही लोग हैं जिन्होंने हिंसा की शुरुआत की है."
विरोध प्रदर्शनों के बाद 10 जुलाई को देश के सुप्रीम कोर्ट ने अस्थायी तौर पर सरकारी नौकरियों में आरक्षण व्यवस्था को निलंबित कर दिया था. लेकिन ये आशंका जताई जा रही है कि इसके बावजूद विरोध प्रदर्शन तब तक नहीं रुकेंगे जब तक इस व्यवस्था को पूरी तरह नहीं हटा दिया जाता.
अनीस-उल हक़ कहते हैं, "कोर्ट में इस मामले की अगली सुनवाई सात अगस्त को होनी है. छात्रों को भी मौक़ा दिया गया है कि वो कोर्ट के सामने अपनी दलील रख सकें."
मंगलवार को हिंसक दंगों के बाद, देर रात किए गए अभियान में पुलिस ने ढाका में मौजूद देश की मुख्य विपक्षी पार्टी बीएनपी के मुख्यालय पर छापे मारे.
बीएनपी के वरिष्ठ नेता रुहुल कबीर रिजवी ने पुलिस की छापेमारी को एक ड्रामा बताया और कहा कि छात्रों को ये संदेश देने के लिए की गई है कि उन्हें अपना विरोध ख़त्म करना है.

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पीएम के बयान से छात्र नेता नाराज़
नाराज़ छात्रों ने ढाका समेत देश के कई शहरों में मुख्य सड़कों और राजमार्गों को बंद कर दिया है.
छात्र नेताओं का कहना है कि वो पीएम शेख़ हसीना के हाल की टिप्पणी से नाराज़ हैं. उनका कहना है कि शेख़ हसीना ने आरक्षण का विरोध करने वालों के लिए रज़ाकार शब्द का इस्तेमाल किया था.
उनका कहना है कि इस शब्द का इस्तेमाल कथित तौर पर उन लोगों के लिए क्या जाता है, जिन्होंने 1971 के युद्ध में पाकिस्तानी सेना का साथ दिया था.
कई छात्र नेताओं का कहना है कि शेख़ हसीना ने रजाकार से तुलना कर उनका अपमान किया है. उनका कहना है कि इस तुलना के कारण बीसीएल के सदस्यों को भी उन पर हमले करने की हिम्मत मिली.
ढाका यूनिवर्सिटी की एक छात्र रुपैया श्रेष्ठ ने बीबीसी से कहा, "देश के भीतर डर का माहौल बनाकर वो हमारी आवाज़ दबा देना चाहते हैं. अगर मैंने आज इसका विरोध नहीं किया तो कल को वो लोग मुझे मार देंगे. इसी कारण मैं विरोध प्रदर्शनों में हिस्सा लेने के लिए सड़कों पर उतरी हूँ."
हालांकि सरकार के मंत्रियों का कहना है कि शेख़ हसीना के बयान को तोड़मरोड़ कर देखा जा रहा है, उन्होंने छात्रों को रजाकार नहीं कहा था.

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सूचना प्रसारण मंत्री मोहम्मद अली अराफ़ात इस आरोप से इनकार करते हैं कि हिंसा की शुरुआत अवामी लीग के छात्रों ने की थी.
उन्होंने कहा कि हिंसा उस वक़्त शुरू हुई, जब आरक्षण का विरोध कर रहे छात्रों ने ढाका में एक यूनिवर्सिटी के एक हॉल (होस्टल) में रह रहे छात्रों को डराया.
उन्होंने बीबीसी को बताया, "अगर यूनिवर्सिटी कैंपस में हिंसा और अफ़रातफ़री का माहौल रहा तो इससे सरकार को कोई फ़ायदा नहीं होगा. हमें चाहिए कि हम शांति बनाए रखें."
संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेश के प्रवक्ता स्टीफ़न दुजारिक के अनुसार, उन्होंने बांग्लादेश सरकार से अपील की है कि वो "हिंसा और धमकियों के ख़िलाफ़ प्रदर्शनकारी छात्रों की सुरक्षा करें."
लेकिन बांग्लादेश में छात्रों का कहना है कि जब तक सरकार उनकी सभी मांगे नहीं मान लेती, वो पीछे नहीं हटेंगे.
इधर हिंसा के बीच सरकार ने ढाका और चटगांव समेत देश के पांच मुख्य शहरों में अर्धसैनिक बलों और बॉर्डर गार्ड्स बांग्लादेश को तैनात कर दिया है.
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