मज़दूर की बेटी उमा छेत्री को महबूब आलम ने यूं निखारा

दिलीप कुमार शर्मा

गुवाहाटी से बीबीसी हिंदी के लिए

असम के गोलाघाट ज़िले का एक बेहद छोटा सा गाँव कानदुलीमारी रविवार के बाद अचानक सुर्खियों में आ गया है.

बोकाखात शहर से क़रीब छह किलोमीटर दूरी पर बसे इस गाँव में सोमवार सुबह से अचानक लोगों की आवाजाही शुरू हो गई.

यहाँ आ रहे लोगों में असम सरकार के वरिष्ठ मंत्री अतुल बोरा से लेकर कई वीआईपी लोग शामिल हैं. इससे पहले गाँव वालों ने इतनी भीड़ और वीआईपी लोगों को यहाँ आते कभी नहीं देखा था.

दरअसल, बीसीसीआई ने रविवार को बांग्लादेश के ख़िलाफ़ मीरपुर के शेर-ए-बांग्ला राष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम में होने वाली आगामी तीन मैचों की टी-20 और एकदिवसीय श्रृंखला के लिए जिस भारतीय टीम की घोषणा की है, उसमें इस गांव की उमा छेत्री भी शामिल हैं.

भारत की सीनियर महिला टीम में जगह बनाने वाली उमा असम की पहली महिला क्रिकेटर बन गई हैं.

उमा का संघर्ष

उमा के संघर्ष से भरे सफ़र की कहानी उनके गाँव को जाने वाली कच्ची सड़क ही बयां कर देती है.

दोनों तरफ़ खेतों के बीच से गुजरी क़रीब 500 मीटर लंबी इस कच्ची सड़क पर मंत्री अतुल बोरा को उमा के घर तक पहुंचने के लिए पैदल ही चलना पड़ा. वे अपनी गाड़ियों का काफिला साथ नहीं ले जा सके.

बाढ़ के समय यह पूरी सड़क पानी में डूब जाती है और फिर यहाँ कोई आना-जाना नहीं कर सकता.

21 साल की उमा ने इन्हीं असुविधाओं का सामना कर राष्ट्रीय क्रिकेट टीम में जगह बनाई है.

उमा ने सीनियर महिला टीम में जगह बनाकर पूर्वोत्तर राज्यों से पहली महिला क्रिकेटर होने का इतिहास भी रच दिया है.

पिछले महीने हॉन्ग कॉन्ग में खेले गए एसीसी विमेंस इमर्जिंग टीम एशिया कप 2023 में उमा ने एक बेहतरीन विकेट कीपर-बल्लेबाज के तौर पर काफ़ी सुर्खियां बटोरी थी.

इस महिला इमर्जिंग एशिया कप में बांग्लादेश के ख़िलाफ़ फ़ाइनल में 31 रन से जीत हासिल करने वाली टीम में उमा ने बल्ले और विकेट के पीछे से शानदार प्रदर्शन किया, जिसकी बदौलत चयनकर्ताओं की नज़र उन पर पड़ी.

कैसे हुई क्रिकेट में शुरुआत

उमा ने स्कूल में पढ़ाई के दौरान क्रिकेट खेलना शुरू किया था.

उनके क्रिकेट कोच महबूब आलम बताते है, "उमा ने बोकाखात हिंदी हाई स्कूल में पढ़ाई के दौरान लड़कों के साथ क्रिकेट खेलना शुरू किया था. कुछ दिन बाद स्कूल का एक छात्र मंटू कुमार यादव उमा के खेल से प्रभावित होकर उन्हें सहीदुर रहमान उर्फ़ राजा की कोचिंग में ले आया. फिर उन्होंने हमारे कोचिंग सेंटर बोकाखात टाउन क्रिकेट क्लब में ट्रेनिंग लेनी शुरू की."

महबूब बताते है कि उमा की घर की आर्थिक हालात ठीक नहीं थी और उनके खेल को देखते हुए कोचिंग में कोई फीस नहीं ली जाती थी.

वह कहते है, "उमा शुरू से एक बेहतरीन खिलाड़ी रही हैं. मुझे पता था कि अगर में उनसे कोचिंग के लिए फीस मांगा तो वो क्रिकेट खेलने नहीं आएगी.वह बहुत कम समय में पहले ज़िला और बाद में स्टेट लेवल पर खेलने लगी थीं."

बेटी के हाफ पैंट पहनने पर लोगों ने दिया था ताना

उमा की इस कामयाबी में उनकी मां दीपा छेत्री को बड़ा संघर्ष करना पड़ा है.

वह अपनी बेटी को इस खेल में आगे बढ़ाने के लिए घर पर मुर्गी पालन करती थीं. कई ऐसे मौक़े आए जब गुवाहाटी कैंप में भेजने के लिए उनकी मां ने मुर्गियां बेचकर उमा को पैसे दिए थे.

अपनी बेटी की इस कामयाबी पर दीपा कहती है,"उमा तीन साल की उम्र से कुछ न कुछ खेलती थी. जब थोड़ी बड़ी हुई तो मैंने उसको एक प्लास्टिक का बल्ला और एक गेंद ख़रीद कर दी. फिर वो स्कूल जाने लगी और वहां लड़कों के साथ क्रिकेट खेलने लगी.’’

‘’मुझे उसका खेलना अच्छा लगता था. लेकिन गाँव के कई लोग उसके हाफ़ पैंट पहनने और शाम को ग्राउंड से देर से आने को लेकर ताना दिया करते थे. लेकिन मैंने उसे खेलने से कभी नहीं रोका. आज वे सारे लोग हमें बधाई दे रहे हैं."

दीपा बताती हैं, "हमारे लिए उमा को क्रिकेट में आगे बढ़ाना आसान नहीं था. क्रिकेट खेलने का सामान बहुत महंगा होता है. बैट, पैड, जूते, कपड़े हमारे पास इतना पैसा नहीं था. फिर खिलाड़ी को अच्छा खाना खाने की ज़रूरत होती है लेकिन इन सबके बावजूद उमा ने कभी हार नहीं मानी. क्रिकेट को लेकर उसका जुनून ऐसा था कि बाढ़ के समय वह बोकाखात में अपनी सहेली के घर रहकर प्रैक्टिस किया करती थी."

पक्का मकान बनाने में उमा ने की मदद

चार भाइयों के बाद उमा सबसे छोटी और परिवार में एकमात्र लड़की है. उमा के पिता लोक बहादुर छेत्री दूसरों के खेत में काम करते हैं और वहाँ से जो भी धान मिलता है, उससे उनके परिवार का गुज़ारा होता है. उमा की इस सफलता के बारे में पूछते ही उनके चेहरे पर चमक आ जाती है.

वह कहते हैं, "मेरी बेटी ने जीवन की सबसे बड़ी ख़ुशी दी है. मैंने जीवन भर मेहनत मज़दूरी की. रहने के लिए एक अच्छा मकान तक नहीं बना सका. लेकिन मेरी बेटी ने उन सारे दुखों को ख़ुशी में बदल दिया. मैंने कभी नहीं सोचा कि हमारे परिवार से एक लड़की भारत की महिला टीम में खेलेगी. आज न जाने कहाँ कहाँ से लोग हमारे घर बधाई देने आ रहे हैं."

जिस गाँव में उमा का घर है, वहाँ बाढ़ के दिनों में रहना दुश्वार हो जाता है.

उमा के पिता बताते हैं,"बाढ़ के समय हमारे घर तक आने वाली कच्ची सड़क पूरी तरह पानी में डूब जाती है. उस दैरान नाव के सहारे आना-जाना करना पड़ता है. पहले बाढ़ का पानी हमारे घर के अंदर घूस जाता था लेकिन उमा ने जब से स्टेट क्रिकेट खेलना शुरू किया तो उसकी मदद से मैंने घर के आंगन को ऊंचा किया है और अब चार कमरे का यह पक्का मकान भी बना रहा हूँ ."

भारतीय महिला क्रिकेट टीम में उमा छेत्री के चयन की ख़बर के बाद असम सरकार ने उनके घर तक जाने वाली कच्ची सड़क को पक्की बनाने का ऐलान किया है.

हरमनप्रीत कौर से मिली प्रेरणा

उमा फ़िलहाल गुवाहाटी क्रिकेट अकादमी में ट्रेनिंग कर रही हैं और वह छह जुलाई को बांग्लादेश के लिए रवाना होंगी.

आर्थिक तंगी और इस खेल में कई असुविधाओं का सामना करने के बावजूद टीम इंडिया की जर्सी पहनने जा रही उमा के मेहनत और प्रेरणा के बारे में उनके कोच महबूब कहते हैं, "दो साल पहले पंजाब में स्टेट खेलने गई उमा की मुलाक़ात भारतीय महिला टीम की कप्तान हरमनप्रीत कौर से हुई थी.''

''दरअसल, उमा ने पंजाब के ख़िलाफ़ अच्छे रन बनाए थे. जब वह कोचिंग में लौटी तो हरमनप्रीत से मुलाक़ात का ज़िक्र करते हुए कहा कि मुझे इस खेल में और अच्छा करना है. उसके बाद से वह लगातार भारतीय महिला टीम में जगह बनाने के लिए कड़ी मेहनत कर रही थी. "

वह कहते हैं "हॉन्ग कॉन्ग से जिस रात वह फ़ाइनल जीत कर लौटी थी, उसने मुझे फ़ोन करके कहा कि अगले दिन उसे प्रैक्टिस करना है. इतना लंबा सफ़र करके आने के बाद मैंने उमा को एक दिन आराम करने की सलाह दी थी. लेकिन वह नहीं मानी और अगले दिन सुबह साढ़े पांच बजे मुझसे पहले वह ग्राउंड पर पहुंच गई थी. खेल के प्रति इस तरह का समर्पण आज उमा को मुकाम तक ले गया."

उमा की यात्रा अभी शुरू हुई है और संभावना है कि उमा 9 जुलाई को बांग्लादेश के ख़िलाफ़ अपना पहला इंटरनेशनल मैच खेले और इस अवसर को भुनाने में कोई कसर न छोड़ें.

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