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वर्ल्ड कप फ़ाइनल में क्या इन सात वजहों से हारे रोहित शर्मा के धुरंधर
- Author, संजय किशोर
- पदनाम, वरिष्ठ खेल पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
अहमदाबाद के नरेंद्र मोदी स्टेडियम में रविवार को वो नहीं हो पाया, जिसकी उम्मीद 140 करोड़ के मुल्क को थी. करोड़ों दिल टूट गए और आँखें नम हो गईं.
कई लोग मानते हैं कि भारत की सांस्कृतिक और धार्मिक विविधता को क्रिकेट जोड़ता है. ऐसे में भारत तीसरी बार विश्व कप जीत जाता तो बड़ी उपलब्धि होती.
कप्तान रोहित शर्मा, विराट कोहली, मोहम्मद शमी और रविचंद्रन अश्विन जैसे खिलाड़ियों के लिए शायद ये आख़िरी विश्व कप था. उनके लिए यह कसक कभी नहीं भूलने वाली है. इतने निकट फिर भी दूर.
बीस साल पहले की तरह ये फ़ाइनल भी लगभग एकतरफ़ा साबित हुआ. ऑस्ट्रेलिया ने 42 गेंद रहते भारत को छह विकेट से हरा कर छठी बार विश्व कप ख़िताब जीत लिया.
मैच के बाद पूर्व भारतीय कप्तान सुनील गावस्कर ने कहा, “मज़बूत टीम से हारने में कोई शर्म नहीं. आज ऑस्ट्रेलिया भारत से बेहतर खेली.”
कहते हैं कि इतिहास अपने आप को दोहराता है. 20 साल पहले साल 2003 में जोहानिसबर्ग में रिकी पॉन्टिंग की टीम ने सौरव गांगुली की टीम को हराकर तीसरी बार विश्व कप जीता था.
रोहित शर्मा की टीम के लिए उस हार का बदला लेकर इतिहास पलटने की मौक़ा था. 1983 और 2011 के बाद तीसरी बार वर्ल्ड चैंपियन बनने का अवसर था. 2003 की ऑस्ट्रेलियाई टीम की तरह, फ़ाइनल तक इस बार टीम इंडिया अपराजेय भी रही थी.
तो आख़िर क्या कारण रहे जिनके चलते पूरे टूर्नामेंट में दमदार प्रदर्शन के बाद भी भारत ख़िताब नहीं जीत पाया. यही नहीं भारतीय क्रिकेट टीम पिछले 10 साल से आईसीसी का कोई ख़िताब नहीं जीत पाई है.
पिच की परख नहीं कर पाई टीम इंडिया
अहमदाबाद में फ़ाइनल की पिच थोड़ी धीमी थी और सूखी भी. टॉस जीतकर ऑस्ट्रेलियाई गेंदबाज़ों ने पिच का पूरा फ़ायदा उठाया. कप्तान पैट कमिंस ने एक के बाद एक कटर डाल कर भारतीय बल्लेबाज़ों के ख़ासा परेशान किया.
डेथ ओवर्स में जॉस हेज़लवुड और कमिंस ने स्लोअर बॉल और कटर डालकर टीम इंडिया को रन रेट बढ़ाने ही नहीं दिया और लगातार विकेट्स निकालते रहे.
जब ऑस्ट्रेलियाई टीम बल्लेबाज़ी करने उतरी तो पिच सपाट हो चुकी थी. ओस के कारण भारतीय गेंदबाज़ों के हाथों से गेंद फिसल रही थी. आउटफ़ील्ड भी पहली पारी की बनिस्बत तेज़ हो गया था.
हालाँकि कप्तान रोहित शर्मा ने टॉस के बाद कहा था कि टॉस जीतकर भी वे पहले बल्लेबाज़ी ही करते. ज़ाहिर है भारतीय टीम मैनेजमेंट पिच को पढ़ नहीं पाया और उसके अनुसार, योजना नहीं बना पाए.
मानसिक मज़बूती में कंगारू आगे
बड़े मैच के लिए युवा जोश से ज़्यादा अनुभवी खिलाड़ी की ज़रूरत होती है. शुभमन गिल और श्रेयस अय्यर फ़ाइनल के दबाव में एकदम से बिखर गए.
रोहित शर्मा ने स्वभाविक खेल खेलने की कोशिश की लेकिन बड़ा स्कोर नहीं बना पाए. 81 रन पर तीन विकेट गँवा देने के बाद विराट कोहली और केएल राहुल भी अपना नैसर्गिक खेल नहीं खेल पाए.
भारतीय टीम पर दबाव हावी होता चला गया. ध्यान कर्म से भटक कर फल पर चला जाए तो मुश्किलें बढ़ जाती हैं.
ऑस्ट्रेलिया की बेहतर फ़ील्डिंग
दोनों टीमों के बीच सबसे बड़ा अंतर फ़ील्डिंग रहा. ऑस्ट्रेलिया की चुस्त फ़ील्डिंग से असर भारत की बेलगाम बल्लेबाज़ी पर अंकुश लग गई. ग्लेन मैक्सवेल की गेंद पर ट्राविस हेड ने रोहित शर्मा का जो कैच पकड़ा वह चमत्कारी था. इस वर्ल्ड कप का शायद ये पहला मैच था जिसमें 24 ओवर में सिर्फ़ एक चौका लगा.
सोशल मीडिया पर चर्चा हो रही थी कि ऑस्ट्रेलियाई टीम ने कहीं 15 फ़ील्डर तो नहीं उतार दिये हैं. एकाध मौक़ों को छोड़कर पूरे टूर्नामेंट में भारतीय बल्लेबाज़ों की कोई भी टीम कठिन परीक्षा नहीं ले पायी थी.
ऑस्ट्रेलिया की रणनीति बेहतर
ये तो मानना पड़ेगा कि ऑस्ट्रेलिया हमेशा बेहतर तैयारी और योजना के साथ खेलते हैं. रोहित शर्मा के तेज़ शुरुआत के बावजूद ऑस्ट्रेलियाई गेंदबाज़ लाइन और लेंथ बनाए रखे.
पैट कमिंस बीच के ओवरों में अपने सबसे सफल गेंदबाज़ एडम जंपा को लेकर आए जो बेहद चतुर फ़ैसला रहा. जब कोहली और राहुल पारी को ठोस रूप देने की कोशिश कर रहे थे तो पार्ट टाइम गेंदबाज़ों को आज़माना भी सही निर्णय रहा.
दूसरी ओर अहमदाबाद की पिच देखने के बाद कई जानकार रविचंद्रन अश्विन को खेलाए जाने की बात कर रहे थे मगर टीम ने विनिंग कॉम्बिनेशन में छेड़छाड़ करने का जोखिम नहीं लिया.
अब तक बीच के ओवरों में रविंद्र जडेजा और कुलदीप यादव कामयाब रहे थे. फ़ाइनल में दोनों गेंदबाज़ फीके साबित हुए. जडेजा बाएँ हाथ के बल्लेबाज़ ट्रैविस हेड को राउंड द विकेट बॉलिंग कर रहे थे.
जानकार इसे रक्षात्मक अप्रोच कहते हैं. कुलदीप और जडेजा ने मिलकर अपने 20 ओवर में 99 रन लुटाए और एक भी विकेट नहीं चटका सके.
ऑस्ट्रेलिया की आक्रामक शुरुआत
भारत ने ऑस्ट्रेलिया को सिर्फ़ 241 रनों का लक्ष्य दिया था. छोटे टार्गेट के बावजूद ऑस्ट्रेलियाई सलामी बल्लेबाज़ों ने बेहद तेज़ शुरुआत की और पहले ही दो ओवर में 28 रन बना डाले.
इससे भारतीय गेंदबाज़ों को हावी होने का मौक़ा नहीं मिल पाया. वैसे भी ऑस्ट्रेलियाई बल्लेबाज़ी कभी भी ताश के पत्तों की तरह भड़भड़ाती नहीं. टीम आख़िरी दम तक हार नहीं मानती.
अफ़ग़ानिस्तान के ख़िलाफ़ 91 रन पर 7 विकेट गँवाने के बाद भी टीम जीत जाए तो यह टीम की इच्छाशक्ति को दर्शाता है. फ़ाइनल में 47 रन पर तीन विकेट गिर जाने के बाद मार्नस लाबुशेन और ट्रैविस हेड ने अपनी योजनाबद्ध बल्लेबाज़ी से बाज़ी पलटने नहीं दी.
कप्तान रोहित शर्मा ने पावरप्ले के बाद छह ओवर जडेजा और कुलदीप से डलवाए. हेड और लाबुशेन को जमने का मौक़ा मिल गया. दोनों ने शतकीय साझेदारी करके मुकाबला ऑस्ट्रेलिया के पक्ष में कर दिया.
घरेलू दर्शकों का दबाव
अपने दर्शकों के बीच खेलना कई बार उल्टा पड़ जाता है. मैदान में प्रधानमंत्री सहित विशिष्ट अतिथियों की मौजूदगी और सवा करोड़ दर्शकों के शोर के बीच खिलाड़ी खेल से ज़्यादा परिणाम के बारे में सोचने लग जाते हैं.
मीडिया उम्मीदों को आसमान तक पहुँचा देती है. चाहे-अनचाहे दबाव तो बनता ही है. वहीं ऑस्ट्रेलिया टीम खेल को खेल की तरह खेलती है. जीत और हार को लेकर उन पर भारत की तरह दबाव नहीं रहता.
व्यक्तिगत प्रदर्शन को तवज्जो
ऑस्ट्रेलिया इस बार भी एक टीम की तरह खेली. कप्तान रोहित शर्मा, विराट कोहली, श्रेयस अय्यर और केएल राहुल ज़बरदस्त फ़ॉर्म में थे.
टूर्नामेंट में सबसे ज़्यादा 765 रन कोहली ने बनाए जबकि रोहित 597 रनों के साथ दूसरे नंबर पर रहे. वहीं टॉप फ़ाइव में ऑस्ट्रेलिया का कोई बल्लेबाज़ नहीं था, डेविड वॉर्नर छठे पायदान पर रहे.
बात करें 2003 वर्ल्ड कप की तो सबसे ज़्यादा 673 रन सचिन तेंदुलकर ने बनाए थे. दूसरे नंबर पर सौरव गांगुली थे, जिन्होंने 465 रन बनाए थे. 415 रनों के साथ रिकी पॉन्टिंग तीसरे नंबर पर थे.
गेंदबाज़ी में भी कमोबेश यही कहानी रही. टॉप पाँच गेंदबाज़ों में मोहम्मद शमी और जसप्रीत बुमराह शामिल थे जबकि ऑस्ट्रेलिया के सिर्फ़ एडम ज़ंपा.
दोनों बार ऑस्ट्रेलिया चैंपियन बना क्योंकि टीम में एक या दो हीरो नहीं थे, कामयाबी में पूरी टीम शामिल थी.
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