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क्या मध्य प्रदेश कांग्रेस में बड़े बदलाव करने का मन बना रहे हैं राहुल गांधी?
- Author, विष्णुकांत तिवारी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
मध्य प्रदेश में बीते दो दशकों में ज़्यादातर समय विपक्ष में रही कांग्रेस पार्टी में राहुल गांधी ने बड़े बदलाव की ओर इशारा किया है.
मध्य प्रदेश में राहुल गांधी के "रेस का घोड़ा, बारात का घोड़ा और लंगड़ा घोड़ा" वाले बयान ने कांग्रेस में सियासी सरगर्मी को बढ़ा दिया है. यह बयान राज्य में पार्टी नेतृत्व में बड़े बदलाव का संकेत है.
राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो राज्य में बीते दो दशकों में लगभग 18 साल विपक्ष में रही कांग्रेस के लिए संगठन को मज़बूत करना अब मजबूरी भी है और ज़रूरी भी.
इसी बात पर ज़ोर देते हुए लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने मंगलवार को भोपाल में कहा, "कांग्रेस पार्टी कभी-कभी रेस के घोड़े को बारात में भेज देती है… और कभी-कभी बारात के घोड़े को रेस में भेज देती है… ये कमलनाथ ने भी कहा है… हमें ये छांटना है कि बारात का घोड़ा बारात में जाए, रेस का घोड़ा रेस में और लंगड़ा घोड़ा आराम करे."
मध्य प्रदेश में साल 2018 में कांग्रेस की सरकार बनी, लेकिन 2020 में तत्कालीन कांग्रेस नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया समेत दो दर्जन से अधिक कांग्रेस विधायकों ने पार्टी छोड़ दी और राज्य में कांग्रेस की सरकार गिर गई. फिर 2023 विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को करारी हार मिली, इन सबके बीच कांग्रेस का संगठन ज़मीनी स्तर पर निराश होता चला गया.
ऐसे में राहुल गांधी के नए प्रयोग को लेकर कई सवाल खड़े हो रहे हैं.
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कांग्रेस संगठन को क्षेत्रीय क्षत्रपों की पकड़ से निकाल पाएगी?
मध्य प्रदेश कांग्रेस को लेकर हमेशा से कहा जाता रहा है कि ये क्षेत्रीय नेताओं की पार्टी है. फिर चाहे वो छिंदवाड़ा से कमलनाथ हों, या ग्वालियर से पूर्व कांग्रेसी नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया और विंध्य से अर्जुन सिंह.
राजनीतिक विश्लेषकों और पत्रकारों का कहना है कि कांग्रेस के लिए क्षेत्रीय क्षत्रपों की मौजूदगी बीते दो दशकों से सबसे बड़ी चिंता बनकर उभरी है.
वरिष्ठ पत्रकार नितेंद्र शर्मा कहते हैं, "कांग्रेस के लिए क्षेत्रीय क्षत्रपों से निपटना आसान नहीं है. राहुल गांधी के एक बार के मध्य प्रदेश दौरे से बदलाव नहीं होगा. दूसरी बात यह कि नए लोगों को आप लेकर आएंगे ये सही है, लेकिन इसकी क्या गारंटी है कि नए लोग इन्हीं क्षत्रपों के प्रभाव में नहीं आएंगे ? इससे बचाने के लिए पार्टी क्या कदम उठाएगी?"
क्षेत्रीय क्षत्रपों को लेकर पार्टी के युवा विधायकों और नए नेताओं में भी द्वंद की स्थिति है.
एक युवा विधायक ने नाम न छपने की शर्त पर कहा, "हम लोगों के पास विकल्प बहुत सीमित हैं. पैसा, राजनीतिक पहुंच, प्रभाव और जो पूरा इकोसिस्टम है, वो अभी भी वरिष्ठ नेताओं के अनुसार चलता है. ऐसे में उनसे अलग होकर काम कर पाना मुश्किल है."
युवा विधायक ने कहा, "पार्टी में नीचे से लेकर ऊपर तक बदलाव हो और फिर उस बदलाव को मज़बूत करने और स्थापित किए रहने के प्रबन्ध किए जाएं तब जाकर संगठन मज़बूत हो पाएगा."
राजनीतिक विश्लेषक और माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के पूर्व वाइस चांसलर दीपक तिवारी कहते हैं, "कांग्रेस में क्षेत्रीय क्षत्रपों के आपसी संघर्ष ने पार्टी को बहुत नुकसान पहुंचाया है. राहुल गांधी का प्रयास है कि 'नेता पहले' की सोच से पार्टी को 'संगठन पहले' की सोच तक पहुंचाया जाए."
लीडरशिप चेंज का पहला क़दम कितना सफल रहा?
कांग्रेस में पीढ़ीगत नेतृत्व परिवर्तन, संगठन में बदलाव और पुनरुत्थान की दिशा में पहला कदम उठाते हुए 2023 के विधानसभा चुनावों में हार के बाद तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ की जगह जीतू पटवारी को कमान सौंपी गई. हालांकि जीतू पटवारी खुद भी 2023 विधानसभा चुनाव में अपनी सीट हार चुके थे.
इसके कुछ समय बाद नेता प्रतिपक्ष पद के लिए उमंग सिंगार को चुना गया.
पार्टी के आला नेताओं ने कहा कि यह नई पीढ़ी को कमान सौंपने की दिशा में बड़ा कदम है.
लेकिन बीते लगभग 15 महीनों से अधिक समय में पटवारी और सिंगार के बीच नेतृत्व की लड़ाई कई बार जगजाहिर हुई है.
दीपक तिवारी कहते हैं, "छोटी-छोटी चीजों को लेकर दोनों नए नेताओं में संघर्ष साफ़ दिखता है. संगठन की मज़बूती के बजाय अपना वर्चस्व स्थापित करने के प्रयासों के चलते दोनों नेताओं की सड़कों पर मौजूदगी नहीं दिखती. अभी आपसी कलह से ही पार पाने में दोनों ही नेता सफल नहीं हुए हैं."
राज्य के एक अन्य वरिष्ठ पत्रकार देशदीप सक्सेना कहते हैं कि जिला स्तर पर नए और मज़बूत लोगों को नेतृत्व सौंपने की पहल अच्छी है, लेकिन अधूरी है.
उन्होंने कहा, "राहुल गांधी नए लोगों को जगह देना चाहते हैं, लेकिन जिन्हें आपने बीते लगभग 15 महीनों से नेतृत्व दिया है, उनके काम का आंकलन भी करना पड़ेगा. प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी और नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंगार के साथ मध्य प्रदेश में संगठन सड़कों से नदारद है, लोगों के मुद्दों पर सरकार से सवाल नहीं किए जाते. मंत्री विजय शाह का बयान हो या फिर 52 किलो सोना पकड़े जाने का मुद्दा, कांग्रेस कहां थी? किस मुद्दे पर इन्होंने सड़क का रुख किया?"
कांग्रेस के एक अन्य विधायक ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, "नए नेता बनाए गए थे लगभग 18 महीने पहले, कोई उनसे हिसाब भी तो ले कि आख़िर अब तक उन्होंने क्या प्रयास किए?"
कांग्रेस की नई लीडरशिप के उठाए गए कदमों और नियुक्त किए गए पदाधिकारियों पर भी लगातार सवाल खड़े होते रहे हैं.
जीतू पटवारी की नेतृत्व क्षमता पर लगातार सवाल खड़े होते रहे हैं. 2024 लोकसभा चुनाव में पटवारी के करीबी अक्षय कांति बम को इंदौर से प्रत्याशी बनाया गया था, लेकिन वोटिंग से ठीक पहले वो भाजपा में शामिल हो गए.
मध्य प्रदेश में कांग्रेस के सामने और क्या चुनौतियां हैं?
इसके अलावा कई अन्य प्रकोष्ठों के अध्यक्ष और प्रवक्ताओं की नियुक्ति सवालों के घेरे में रही है.
किसान कांग्रेस के नेता केदार सिरोही ने बीबीसी से कहा, "ज़मीनी कार्यकर्ताओं को दरकिनार करके अपने लोगों को नियुक्त करने की प्रथा को नई लीडरशिप ने भी जारी रखा है. अगर ऐसे ही नियुक्तियों में पारदर्शिता नहीं बरती जाएगी तो बदलाव मुश्किल है."
देशदीप सक्सेना कहते हैं, "बारात के घोड़ों और लंगड़े घोड़ों को उनकी सही जगह दिखाने के राहुल गांधी के बयान के पीछे कितनी मेहनत वो करेंगे, यह भी बड़ा सवाल है क्योंकि ये बदलाव उनके एक बार के दौरे से सार्थक नहीं हो पाएगा."
उन्होंने आगे कहा, "नई लीडरशिप जगह न मिलने, काम न कर पाने की शिकायत तो कर रही है लेकिन उनकी काम करने की कोशिश, लोगों के बीच पहुंचने की कोशिश दिखाई नहीं देती, ऐसे में पार्टी का एकजुट चेहरा कैसे और कितने समय में जनता तक पहुंचता है ये देखने वाली बात है."
कांग्रेस पार्टी मध्य प्रदेश में बदलाव और संगठन को मज़बूत करने के लिए कई एक्सपेरिमेंट कर रही है, इनसे कोई नया रास्ता निकलता है या एक्सपेरिमेंट लैब को और नुकसान पहुंचता है, यह आने वाले दिनों में देखने वाली बात होगी.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित
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