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‘इंडिया’ गठबंधन में आप और कांग्रेस के बीच एकता क्यों नहीं बन पा रही है?
- Author, चंदन कुमार जजवाड़े
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
दिल्ली में बुधवार को हुई कांग्रेस की बैठक के बाद एक नया राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया. कांग्रेस के बड़े नेता साल 2024 के लोकसभा चुनावों के लिए हर राज्य के नेताओं के साथ बैठक कर रहे हैं.
इसी सिलसिले में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, सांसद राहुल गांधी, पार्टी महासचिव केसी वेणुगोपाल और दिल्ली प्रदेश कांग्रेस के प्रभारी दीपक बाबरिया समेत दिल्ली के कई कांग्रेस नेताओं की बुधवार को बैठक हुई.
बैठक के बाद कांग्रेस नेता अलका लांबा ने मीडिया से बातचीत में कहा कि पार्टी नेताओं को राज्य में संगठन को मज़बूत बनाने को कहा गया है और कांग्रेस को दिल्ली की सातों लोकसभा सीटों पर चुनाव की तैयारी रखनी है.
एक सवाल के जवाब में अलका लांबा ने यह भी कहा कि “इसपर अभी कोई फ़ैसला नहीं हुआ है कि हम दो सीट पर लड़ेंगे या चार सीट पर लड़ेंगे और बाक़ी पर कोई काम नहीं करेंगे.”
अलका लांबा ने यह भी कहा कि कांग्रेस साल 2019 के लोकसभा चुनाव में दिल्ली की सभी सातों सीटों पर दूसरे नंबर पर थी. इस बयान के बाद आम आदमी पार्टी के कई नेता भड़क गए और विपक्षी गठबंधन से हटने तक की बात कह दी.
क्यों भड़की आम आदमी पार्टी
आप नेता दिलीप पांडे ने कहा कि अगर आने वाले लोकसभा चुनावों में कांग्रेस पार्टी की इच्छा दिल्ली में कोई गठबंधन करने की नहीं है तो मुझे लगता है कि जो कथित गठबंधन लोकतंत्र और संविधान को बचाने के नाम पर बनाया गया है, उसका हिस्सा होने का हमारा कोई मतलब नहीं है.
वहीं सौरभ भारद्वाज ने कहा है कि छोटे-छोटे नेताओं के बयान का कोई मतलब नहीं है यह विपक्षी गंठबंधन इंडिया की बैठक में तय होगा.
आप नेताओं की तीख़ी प्रतिक्रिया के बाद कांग्रेस ने अलका लांबा के बयान पर फ़ौरन सफ़ाई दी. दिल्ली प्रदेश के कांग्रेस प्रभारी दीपक बाबरिया ने कहा कि अलका लांबा इस तरह के बयान देने के लिए अधिकृत नहीं हैं.
उनका कहना है, “आम आदमी पार्टी की समझ पर मैं क्या कहूं यह समझ में नहीं आ रहा है. आम आदमी पार्टी को समझ में आना चाहिए मीडिया पूरा का पूरा भारतीय जनता पार्टी की मदद करना चाहता है, आपको उकसाना चाहता है.”
दीपक बाबरिया के मुताबिक़ मीटिंग में गठबंधन के बारे में कोई चर्चा नहीं हुई है, मीडिया बीजेपी की मदद करता है और अगर किसी ने ऐसी ख़बर दी है तो मैं उसका खंडन करता हूं.
ऐसा नहीं है कि आप और कांग्रेस के बीच विपक्षी एकता की मुहिम के बीच यह पहली तक़रार है. इससे पहले जून में बिहार की राजधानी पटना में हुई बैठक में भी आप ने दिल्ली सर्विस बिल के ख़िलाफ़ कांग्रेस से खुला समर्थन न मिलने पर नाराज़गी जताई थी और गठबंधन से अलग होने की धमकी दी थी.
सवाल यह भी है कि इन दोनों दलों के बीच भरोसा क्यों नहीं बन पा रहा है और किसी भी मुद्दे पर बातचीत से पहले बयानबाज़ी क्यों शुरू हो जाती है?
वरिष्ठ पत्रकार रशीद किदवई मानते हैं कि विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ में सीटों का जो तालमेल या हिस्सेदारी होगी यह उसकी क़वायद का एक हिस्सा है.
उनके मुताबिक़, “एक होती है राजनीतिक पैंतरेबाज़ी. साल 2019 के लोकसभा चुनावों में आप और कांग्रेस के बीच गंभीर बातचीत हुई थी. उस वक़्त आम आदमी पार्टी ख़ुद पांच सीटों पर और कांग्रेस के लिए दो सीटों पर तैयार थी.
रशीद किदवई के मुताबिक़ कांग्रेस का आग्रह था कि आप 4 सीटों पर लड़े और कांग्रेस को 3 सीटों पर लड़ने का मौक़ा मिले. लेकिन यह बात टूट गई और सातों सीटों पर बीजेपी की जीत हुई.
ख़ास बात यह है कि साल 2019 में कांग्रेस को क़रीब 23 फ़ीसद वोट मिले थे, जबकि आम आदमी पार्टी को 18 फ़ीसदी वोट ही मिले थे. भले ही राज्य में बड़े बहुमत के साथ आप की सरकार थी.
वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद जोशी मानते हैं, अभी कांग्रेस का कोई भी वरिष्ठ नेता किसी तरह का विवाद नहीं चाहता ताकि कोई खलबली न मचे, लेकिन कांग्रेस को लगता होगा कि आप को एक अनौपचारिक संदेश दिया जाए, क्योंकि राजनीति में जो दिखता है वही नहीं होता है.”
कांग्रेस का डर
अलका लांबा कांग्रेस छोड़कर ही आम आदमी पार्टी में शामिल हुई थीं और बाद में फिर से कांग्रेस में शामिल हो गई. उसके बाद से ही अलका लांबा और आप नेताओं की बीच तल्ख़ी बरक़रार है.
दरअसल दिल्ली में कांग्रेस के कई नेता लगातार केजरीवाल का विरोध करते रहे हैं. भले ही आप विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ का हिस्सा हो पर दिल्ली के कांग्रेस नेता केजरीवाल के ख़िलाफ़ लगातार बयान देते रहे हैं.
इसी महीने कांग्रेस हाई कमान ने राज्यसभा में दिल्ली सर्विस बिल पर आप सरकार का समर्थन किया था. इसके बदले केजरीवाल ने कांग्रेस का धन्यवाद भी किया था, लेकिन पूर्वी दिल्ली से कांग्रेस के सांसद रहे संदीप दीक्षित ने केजरीवाल को बेहतर काम करने की नसीहत दी थी.
बुधवार को भी एक तरफ़ कांग्रेस हाई कमान गठबंधन में दरार बचाने की कोशिश कर रहा था, लेकिन दिल्ली प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अनिल चौधरी ने शराब नीति पर अरविंद केजरीवाल सरकार पर हमला किया.
दरअसल इस तरह के बयानों के पीछे आप की वजह से कांग्रेस को हुआ नुक़सान है. दिल्ली में बीजेपी अपने दम पर कांग्रेस को सत्ता से हटाने में नाकाम हो रही थी, लेकिन आप ने उससे राज्य की सत्ता छीन ली.
कांग्रेस का साल 1998 से साल 2013 तक दिल्ली पर शासन रहा था. लेकिन अब राज्य में कांग्रेस की हालत ऐसी है कि पिछले दो विधानसभा चुनावों में दिल्ली में कांग्रेस अपना खाता भी नहीं खोल पाई है.
लोकसभा चुनावों की बात करें तो साल 2009 में कांग्रेस ने दिल्ली की सभी सात लोकसभा सीटें जीती थीं, लेकिन आप के आने बाद साल 2014 और 2019 में ये सभी सीटें बीजेपी के खाते में चली गईं.
दिल्ली के बाद आप ने पंजाब में कांग्रेस से सत्ता छीन ली. आम आदमी पार्टी ने साल 2022 में पंजाब विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को हराकर अपनी सरकार बनाई थी.
हालांकि साल 2019 के लोकसभा चुनावों में आप को पंजाब में क़रीब आठ फ़ीसद वोट और एक सीट मिली थी. वहीं कांग्रेस ने 40 फ़ीसद से ज़्यादा वोट के साथ पंजाब की 13 में से आठ लोकसभा सीटें अपने कब्ज़े में की थी. ऐसे में आम आदमी पार्टी और कांग्रेस दोनों ही एक दूसरे पर दबाव बनाने की राजनीति का सहारा भी ले सकती हैं, ताकि आने वाले लोकसभा चुनावों में ज़्यादा से ज़्यादा सीटों पर दावा कर सकें.
‘इंडिया’ का भविष्य
आप ने न केवल दिल्ली और पंजाब में बल्कि गुजरात में भी कांग्रेस को बड़ा नुक़सान पहुंचाया है. साल 2017 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को राज्य में क़रीब 43 फ़ीसद वोट और 77 सीटें मिली थीं.
जबकि पिछले साल हुए विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को महज़ 28 फ़ीसद वोट और 17 सीटें ही मिलीं थीं. उन चुनावों में आप को क़रीब 13 फ़ीसद वोट के साथ 5 सीटें मिली थीं.
रशीद किदवई मानते हैं, “सीधा समीकरण है कि दिल्ली, पंजाब और गुजरात की 46 सीटों में अगर आम आदमी पार्टी और कांग्रेस एक होकर न लड़े हो सकता है कि उनको केवल पंजाब की 5-6 सीटों पर जीत मिले.”
उनके मुताबिक़ अगर दोनों पार्टियों के बीच तालमेल हो जाता है तो पंजाब कि 13 सीटें और दिल्ली की 7 सीटों में से कम से कम 10-12 सीटों में उनकी मज़बूत दावेदारी होगी. इसके अलावा उनकी गुजरात में भी एकाध सीट निकलने की संभावना है.
फ़िलहाल गुजरात की सभी 26 लोकसभा सीटों पर बीजेपी का कब्ज़ा है. आप ने इसके अलावा मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों में भी विस्तार का इरादा जताया है. जबकि इन राज्यों में बीजेपी और कांग्रेस के बाद कोई तीसरी बड़ी पार्टी नहीं है.
प्रमोद जोशी कहते हैं, “दिल्ली के ज़्यादा पेंचदार चुनाव गुजरात में होंगे और उससे भी ज़्यादा पंजाब में. आप वाले मध्य प्रदेश में भी कुछ सीटें लेना चाहेंगे. क्योंकि इस समय बीजेपी और कांग्रेस के बाद तीसरी पार्टी के रूप में उभरने की उसकी महत्वाकांक्षा है.
उम्मीद
गुरुवार को बिहार के मुख्यमंत्री और विपक्षी एकता की मुहिम शुरू करने वाले नीतीश कुमार ने दावा किया है कि विपक्ष की ताक़त को देखकर ही बीजेपी ने एनडीए की बैठक शुरू की है. उन्होंने यह भी कहा है कि साल 2024 के चुनावों में ‘इंडिया’ गठबंधन बहुत अच्छा करेगा.
रशीद किदवई मानते हैं, “इस गठबंधन में परस्पर विरोधी राजनीतिक दल एक साथ आए हैं और उनकी एक ही मंशा है कि नरेंद्र मोदी और बीजेपी को हराया जा सके. सब एक तरह की मज़बूरी का शिकार हैं. मुझे ऐसा लगता है कि आने वाले समय में इन बयानबाज़ी से हटकर यथार्थ के धरताल पर फ़ैसला होगा.”
ऐसा नहीं है कि केवल कांग्रेस और आप के नेताओं के बीच ही यह दरार देखने को मिलती है. पश्चिम बंगाल में भी कांग्रेस सांसद अधीर रंजन चौधरी अक्सर राज्य में ममता सरकार के ख़िलाफ़ बयान देते रहे हैं.
प्रमोद जोशी के मुताबिक़ अलका लांबा के बयान के बाद विपक्षी गठबंधन में एक छोटी सी चिंगारी ज़रूर शुरू हो गई है. लेकिन राहुल गांधी आम आदमी पार्टी को पसंद करते हैं क्योंकि आप नेता नरेंद्र मोदी के ख़िलाफ़ खुलकर बोलते हैं.
फ़िलहाल कांग्रेस के बड़े नेता विपक्षी एकता को लेकर काफ़ी सावधानी बरत रहे हैं. लेकिन यह भी सच है कि हाल ही में कर्नाटक विधानसभा चुनावों में मिली बड़ी जीत के बाद कांग्रेस के नेता ज़्यादा आत्मविश्वास में नज़र आते हैं.
इसी साल मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में विधानसभा चुनाव होने हैं. उन चुनावों में विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ की भूमिका और आम आदमी पार्टी का कदम तय करेगा कि एक बार फिर वो कांग्रेस को नुक़सान पहुंचाती है या ‘इंडिया’ गठबंधन विपक्षी एकता की चिंगारी को शांत करने में सफल होता है.
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