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यूपी उपचुनाव के दौरान मुस्लिम महिलाओं को मतदान से रोकने का आरोप, क्या है पूरा मामला- ग्राउंड रिपोर्ट
- Author, अभिनव गोयल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
हाथ में मतदान पर्ची, पोलिंग बूथ की तरफ बढ़ती महिलाएं और उन्हें रोकने के लिए हथियार लहराता पुलिसकर्मी.
पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मीरापुर विधानसभा क्षेत्र के ककरौली गांव की इस एक तस्वीर ने मतदान की प्रक्रिया और प्रशासन की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं.
इस घटनाक्रम पर एक तरफ जहां विपक्ष पुलिस प्रशासन पर सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के समर्थन में मतदान को प्रभावित करने का आरोप लगा रहा है, वहीं पुलिस इस वीडियो को बड़े घटनाक्रम का छोटा हिस्सा बता रही है.
पुलिस ने इस मामले में 28 नामजद और 100 से 120 अज्ञात लोगों के ख़िलाफ़ हत्या का प्रयास, दंगा फैलाने और सरकारी काम में बाधा डालने समेत भारतीय न्याय संहिता की दर्जन से ज़्यादा धाराओं में एफ़आईआर दर्ज की है.
हथियार लहराता पुलिसकर्मी
बुधवार, 20 नवंबर को दो राज्यों की विधानसभा के लिए चुनाव हुए. साथ ही इस दिन उत्तर प्रदेश की भी नौ विधानसभाओं पर उपचुनाव के लिए मतदान हुआ.
मुजफ़्फ़रनगर जिले की मीरापुर विधानसभा के ककरौली गांव में इस दौरान खूब हंगामा हुआ और यहां से आई तस्वीरें सोशल मीडिया पर खूब वायरल हुईं.
इस घटना के मुख्यत: दो वीडियो सोशल मीडिया पर दिखाई दे रहे हैं. एक क़रीब 20 सेकंड का है और दूसरा क़रीब दो मिनट का है.
तस्वीरों में गली के सामने खड़ा एक पुलिसकर्मी मतदान के लिए जाती महिलाओं पर पिस्तौल तानते हुए दिखाई दे रहा है.
दरअसल ये वीडियो ककरौली गांव के बस स्टॉप के पास एक गली का है. वीडियो में देखा जा सकता है कि कि पुलिसकर्मी ककरौली थाने के एसएचओ राजीव शर्मा हैं.
वहीं राजीव शर्मा जिन महिलाओं पर पिस्तौल तान रहे हैं, उनमें से एक महिला का नाम तौहिदा और दूसरी महिला का नाम तंजिला है.
‘पिस्तौल के सामने डटी रही’
वीडियो में दिखाई दे रही तौहिदा ने बीबीसी से बातचीत में बताया कि वो सुबह अपने घर से मतदान करने के लिए निकली थीं, लेकिन जैसे ही गली के मुहाने पर पहुंचीं तो एक पुलिसकर्मी ने उन पर पिस्तौल तान दी.
तौहिदा कहती हैं, "सुबह क़रीब दस बजे की बात है. कुछ लोग सड़क पर जमा हो गए थे, पुलिस ने वहां आकर लाठीचार्ज किया. उस वक्त हम घर से निकल रहे थे. हमें नहीं पता था कि सड़क पर क्या हो रहा है. पुलिसवाले ने हमसे पूछा कि कहां जा रही हो. मैंने कहा कि वोट डालने जा रही हूं."
तौहिदा ने कहा, "उन्होंने (पुलिसकर्मी) मुझसे कहा कि वोट नहीं डलेगी, चलो भागो. हमने कहा कि हम वोट डालकर ही जाएंगे. उन्होंने एक हाथ में ईंट उठा ली और जेब से पिस्तौल निकाल ली. पुलिसवाले ने कहा- मैं गोली मार दूंगा. मैंने कहा- तुम्हें गोली चलाने का आदेश नहीं है."
वो आरोप लगाती हैं, "पुलिसवाले ने कहा- मैं गोली मार दूंगा. मैंने कहा- लो, मुझे गोली मार लो. मैं आज देखूंगी कि तुम कितनी गोलियां चलाते हो. जब वो मुझे गोली मारने को हो रहे थे तो मैं उनके आगे अड़ गई. फिर दो-चार लोग वहां जमा हो गए और हम घर वापस आ गए."
तौहिदा कहती हैं कि उस वक्त उन्हें बिल्कुल भी डर नहीं लग रहा था.
वो कहती हैं, "वोट हमारा हक़ है, हम वोट डालने जा रहे थे. इसमें किस बात का डर है? लेकिन ये अच्छा नहीं किया. वोट यहां फिर से पड़ने चाहिए."
तौहिदा पुलिस प्रशासन पर आरोप लगाते हुए कहती हैं कि मुसलमान होने की वजह से हमें वोट नहीं डालने दिया गया. वो कहती हैं कि अगर वो हिंदू होतीं तो आराम से मतदान कर पातीं.
इलाक़े में हुए पथराव के सवाल पर तौहिदा कहती हैं, "लोग थे लेकिन कहीं कोई पथराव नहीं हुआ. पुलिस वाले खुद को बचाने के लिए इस तरह के आरोप लगा रहे हैं."
वीडियो में तौहिदा के साथ तंजिला भी दिखाई दे रही हैं. वो भी उसी समय उनके साथ मतदान के लिए जा रही थीं.
तंजिला कहती हैं, "हमारे मन में उस वक्त सिर्फ़ यही चल रहा था कि हमें वोट डालना है. जब उन्होंने ऐसा करने से हमें रोका तो फिर लगा कि मरना ही ठीक है. वोट के लिए अगर मर भी जाएंगे तो कोई बात नहीं. एक बार तो मरना ही है."
वे आरोप लगाती हैं, "मैं तौहिदा के पीछे थी. हमें डर नहीं लगा. पुलिस वाले हमें गालियां दे रहे थे. उन्होंने कहा कि हम तुम्हें वोट नहीं डालने देंगे. मैंने भी कहा कि वोट तो मैं डालकर ही रहूंगी, चाहे कुछ भी हो जाए. इसके बाद मैं शाम में दूसरे रास्ते से वोट डालने गई."
पुलिस का दावा
पुलिस का दावा है कि इस घटनाक्रम की शुरुआत ककरौली गांव में समाजवादी पार्टी और एआईएमआईएम पार्टी के लोगों के बीच हुए झगड़े से हुई थी.
मुजफ़्फ़रनगर के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक अभिषेक सिंह का कहना है, "ककरौली गांव से जो वीडियो वायरल की जा रही है. उसमें ककरौली थाना अध्यक्ष दिखाई दे रहे हैं. उनके द्वारा दंगा नियंत्रण किया जा रहा है.”
वे दावा करते हैं, "ये वीडियो आधा है और इसे एक साजिश के तहत वायरल किया जा रहा है. पूर्ण सत्य ये है कि पुलिस को दो पक्षों के बीच झड़प की सूचना मिली थी. पुलिस जब वहां पहुंची तो लोगों ने सड़क जाम की हुई थी."
अभिषेक सिंह बताते हैं, "पुलिस ने जब लोगों को हटाया तो यहां पथराव किया गया. पुलिस ने मामूली ताकत का इस्तेमाल कर, स्थिति को नियंत्रण में किया. जब वीडियो बनाया गया तब वहां से उपद्रवी भाग गए थे."
"नियमों का पालन करते हुए चुनाव के दिन क़ानून- व्यवस्था को सामान्य रखते हुए कार्रवाई की गई है और जिन्होंने पथराव और उपद्रव किया है उन पर भी कार्रवाई की जाएगी."
वहीं थाना ककरौली के सर्कल ऑफ़िसर डॉ. रविशंकर ने बयान जारी कर बताया कि पथराव में ककरौली थाना प्रभारी समेत अन्य तीन पुलिसकर्मी घायल हो गए हैं.
बीबीसी से बातचीत में रविशंकर कहते हैं कि स्थिति को देखकर ही ककरौली थाने के एसएचओ ने पिस्तौल निकाली थी, क्योंकि कुछ लोग घरों के ऊपर भी चढ़े हुए थे और वहां पत्थरबाज़ी हो रही थी.
क्या पिस्तौल तानने वाले एसएचओ राजीव शर्मा के ख़िलाफ़ भी पुलिस जांच कर रही है.
इस सवाल के जवाब में रविशंकर कहते हैं, "वो शांति बनाए रखने की कोशिश में खुद घायल हुए हैं. उनके ख़िलाफ़ कोई जांच नहीं की जा रही है."
एफ़आईआर पर उठे सवाल
ककरौली पुलिस ने हत्या का प्रयास, दंगा फैलाने और सरकारी काम में बाधा डालने के आरोप समेत कई धाराओं में 28 नामजद और 100 से 120 अज्ञात लोगों के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज की है.
एफ़आईआर में अभियुक्तों के ख़िलाफ़ भारतीय न्याय संहिता की धारा 109. 115(2), 121(1), 121(2), 125, 131, 132, 190, 191(2), 191(3), 223, 351(2), 351(3), 352 और आपराधिक क़ानून अधिनियम की धारा 7 लगाई गई है.
28 नामजद लोगों में पुलिस ने तौहिदा और उनके बेटे अव्वलीन का नाम भी शामिल किया है. एफ़आईआर में दोनों को समाजवादी पार्टी से संबंधित बताया गया है.
पुलिस की एफ़आईआर के मुताबिक़ सड़क पर समाजवादी पार्टी और एआईएमआईएम पार्टी के लोग आपस में अपने-अपने प्रत्याशी को वोट डालने की बात को लेकर लड़ रहे थे और जब पुलिस ने दोनों पक्षों को समझाने की कोशिश की तो पुलिस पर पथराव किया गया.
तौहिदा के पति अब्दुल समद कहते हैं, "पुलिस ने मेरी पत्नी और बेटे को भी अभियुक्त बना दिया, जबकि मेरा बेटा तीन-चार दिन से शहर में नहीं है."
अब्दुल समद के आरोप पर ककरौली थाना के सर्किल ऑफि़सर रविशंकर ने बीबीसी से बातचीत में कहा, "शुरुआती जांच में कुछ नाम सामने आए हैं. जांच के वक्त अगर कोई व्यक्ति घटना में संलिप्त नहीं पाया जाता है तो उनका नाम हटा दिया जाएगा."
मतदान को प्रभावित करने का आरोप
मीरापुर विधानसभा के लिए हुए उपचुनाव में राष्ट्रीय लोकदल और बीजेपी की साझा उम्मीदवार मिथिलेश पाल चुनाव लड़ रही हैं. वो आरएलडी के चुनाव चिन्ह पर अपनी किस्मत आज़मा रही हैं.
जबकि समाजवादी पार्टी और कांग्रेस गठबंधन की ओर से सुम्बुल राणा चुनावी मैदान में हैं. वहीं बहुजन समाज पार्टी की ओर से शाहनज़र और आज़ाद समाज पार्टी से ज़ाहिद हुसैन चुनाव लड़ रहे हैं.
असल मुक़ाबला यहां सपा-कांग्रेस गठबंधन प्रत्याशी और बीजेपी-आरएलडी गठबंधन प्रत्याशी के बीच माना जा रहा है.
इस सीट से चंदन चौहान विधायक थे लेकिन उनके लोकदल से संसद पहुंच जाने के बाद यह सीट खाली हो गई थी.
मतदान के दिन मीरापुर के ककरौली गांव में तीन जगहों पर नौ पोलिंग बूथ बनाए गए थे. घटनास्थल से क़रीब एक किलोमीटर दूर किसान इंटर कॉलेज में सबसे ज़्यादा पांच पोलिंग बूथ थे.
साल 2015 से लेकर 2020 तक प्रकाश वीर, ककरौली गांव के प्रधान रहे हैं. उनके मुताबिक़ ककरौली गांव की आबादी क़रीब बीस हज़ार है और यहां वोटरों की संख्या क़रीब दस हज़ार है.
प्रकाश वीर कहते हैं, "प्रधानी के चुनाव के समय तो गांव में हिंदू-मुसलमानों के बीच तनाव रहता है लेकिन विधानसभा और लोकसभा चुनाव के समय ऐसा नहीं दिखाई देता. ऐसा माहौल बनाया गया कि मुस्लिमों को वोट नहीं देने दिया जा रहा है, लेकिन इसमें कोई सच्चाई नहीं है."
ककरौली के स्थानीय निवासी मोहम्मद अजमल कहते हैं, "मुस्लिम समाज को वोट नहीं डालने दिए गए. हमारे घर में 12 वोट हैं लेकिन दो लोग ही वोट डाल पाए. हालात ये थे कि मैं डरकर गांव में नहीं आया."
वे कहते हैं, "वोट देना हमारा अधिकार है, लेकिन अगर इससे भी हमें वंचित कर दिया जाएगा तो हमारे पास क्या बचेगा."
वहीं अपनी टांग पर चोट का निशान दिखाते हुए स्थानीय निवासी मोहम्मद समीम अहमद कहते हैं, "मैं सुबह जब वोट देने गया तो पुलिस ने डंडे मारे और मुझे वोट नहीं करने दिया. सड़क पर हर तरफ पुलिस नज़र आ रही थी."
वो कहते हैं, "हालात ऐसे थे कि मुसलमानों में आधे लोग भी वोट नहीं डाल पाए. लोगों की दाढ़ी देखकर ही उन्हें भगा दिया जा रहा था."
इन आरोपों पर सर्किल ऑफिसर रविशंकर कहते हैं, "मतदान के दिन हमें जहां कहीं से भी कोई शिकायत मिली, हमारी टीम ने वहां पहुंचकर उसे निपटाने का काम किया है ताकि लोग अच्छे से मतदान कर सकें. बाकि जो कुछ शिकायतें मिली हैं, उन पर जांच की जा रही है."
गांव की ही एक और स्थानीय निवासी नूरनिशा कहती हैं, "ऐसा पहली बार हुआ है जब मैं वोट नहीं कर पाई."
वहीं गांव के हिंदू बहुल मोहल्ले में लोगों का कहना है कि उन्हें मतदान के दिन किसी तरह की दिक्कत का सामना नहीं करना पड़ा.
हिंदू बहुल मोहल्ले से वोटिंग सेंटर क़रीब एक किलोमीटर दूर था. क्या वोटिंग सेंटर तक पहुंचने के लिए बीच रास्ते में पुलिस ने किसी तरह की बैरिकेडिंग की थी?
इस सवाल के जवाब में स्थानीय निवासी विपिन कहते हैं, "हमारे यहां किसी को दिक्कत नहीं हुई और न ही बीच रास्ते में कोई बैरिकेडिंग थी."
वो कहते हैं, "वोटिंग सेंटर पर कुछ ऐसे लोग भी आ रहे थे जिनकी असल में दाढ़ी थी, लेकिन आधार कार्ड पर लगी फोटो में दाढ़ी नहीं थी. इस स्थिति में पुलिस ने उन्हें वापस भेज दिया, जिसके बाद कहीं कहीं मामला गर्म हो गया."
गांव में वोटिंग के बारे में समझाते हुए बीजेपी के पोलिंग एजेंट संजीव काकरान कहते हैं कि कुल 10,256 वोटों में से गांव में 4,324 वोट पड़े हैं.
उनके मुताबिक़ गांव में इस बार 43 फ़ीसद मतदान ही हो पाया है, जबकि मीरापुर विधानसभा उपचुनाव में मतदान 57 प्रतिशत रहा है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित