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'मैं सभी धर्मों का सम्मान करता हूं', भगवान विष्णु की प्रतिमा वाले बयान पर विवाद के बाद बोले सीजेआई
यूनेस्को की विश्व धरोहरों में शुमार खजुराहो के एक मंदिर में भगवान विष्णु की मूर्ति के पुनर्निर्माण की याचिका ख़ारिज करते समय दिए अपने बयान से विवाद खड़ा होने के बाद अब सीजेआई बीआर गवई ने कहा कि वह सभी धर्मों का सम्मान करते हैं.
मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई ने यह स्पष्ट किया कि उनकी टिप्पणियां इस संदर्भ में थीं कि वह मंदिर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के अधिकार क्षेत्र में आता है.
सीजेआई बीआर गवई, जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस के विनोद चंद्रण की पीठ कर्नाटक में बड़े पैमाने पर लौह अयस्क के अवैध खनन से जुड़े मामले की सुनवाई कर रही थी.
दरअसल, बीते मंगलवार सीजेआई बीआर गवई और जस्टिस के विनोद चंद्रण की बेंच ने मध्य प्रदेश में स्थित खजुराहो के एक मंदिर में भगवान विष्णु की खंडित मूर्ति की मरम्मत और रखरखाव का आदेश देने से जुड़ी अर्ज़ी खारिज कर दी थी.
बेंच ने कहा था कि यह अदालत नहीं बल्कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अधीन आता है. बेंच ने इसे 'पब्लिसिटी के लिए दायर याचिका' बताते हुए याचिकाकर्ता से ये कहा था कि 'वह भगवान विष्णु के बड़े भक्त हैं तो फिर उन्हीं से प्रार्थना करें और थोड़ा ध्यान लगाएं.'
सीजेआई की इस टिप्पणी के बाद तीखी प्रतिक्रिया सामने आ रही थी. विश्व हिंदू परिषद ने सीजेआई को नसीहत दी थी कि उन्हें अपनी वाणी पर संयम रखना चाहिए.
सीजेआई ने अब क्या कहा?
लाइव लॉ के मुताबिक, गुरुवार को सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने बताया कि मीडिया में ऐसे कुछ आर्टिकल छापे गए, जिनमें पहले की सुनवाइयों के बारे में ये कहा गया है कि केंद्र सरकार के वकील उसमें मौजूद नहीं थे.
इसी पर प्रतिक्रिया देते हुए, मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि सोशल मीडिया पर चीज़ों को गलत तरीके से पेश करना चिंताजनक है.
उन्होंने 7 फीट ऊंची भगवान विष्णु की मूर्ति की मरम्मत की मांग वाली याचिका की सुनवाई में अपनी टिप्पणियों का हवाला देते हुए कहा, "सोशल मीडिया पर तो आजकल कुछ भी चल सकता है. परसों किसी ने मुझे बताया कि आपने कुछ अपमानजनक कहा है."
सीजेआई ने कहा, "मैं सभी धर्मों में विश्वास रखता हूं और सभी धर्मों का सम्मान करता हूं."
इस पर सॉलिसिटर जनरल ने भी कहा, "मैं सीजेआई को पिछले 10 सालों से जानता हूं. वे सभी धर्मों के मंदिरों और धार्मिक स्थलों पर पूरी श्रद्धा के साथ जाते हैं."
इस दौरान मुख्य न्यायाधीश ने यह भी स्पष्ट किया कि उनकी टिप्पणियां केवल इस संदर्भ में थीं कि मंदिर एएसआई के अधिकार क्षेत्र में आता है.
उन्होंने कहा, "हमने यह एएसआई के संदर्भ में कहा था...मैंने यह भी सुझाव दिया था कि खजुराहो में शिव मंदिर भी है, जहां पर सबसे बड़ा शिवलिंग है."
इसी दौरान जस्टिस विनोद चंद्रण ने कहा कि वेदांता समूह में कथित वित्तीय अनियमितताओं के ख़िलाफ़ दायर जनहित याचिका पर सुनवाई से उनके अलग होने को भी गलत संदर्भ में देखा गया.
वहीं, सॉलिसिटर जनरल ने हल्के अंदाज़ में यह कहा कि सोशल मीडिया की वायरलिटी के आगे न्यूटन का नियम भी असफल हो जाता है.
उन्होंने कहा, "ये गंभीर भी है. पहले हम न्यूटन का नियम जानते थे- हर क्रिया की समान प्रतिक्रिया होती है. अब हर क्रिया की सोशल मीडिया पर असमान और अति-प्रतिक्रिया होती है."
वहीं मौजूद वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने कहा, "हम हर दिन इससे जूझते हैं. ये एक बेलगाम घोड़े की तरह है, जिस पर काबू पाने का कोई तरीका नहीं है."
वहीं, सीजेआई ने सोशल मीडिया के नियंत्रण से बाहर होने के खतरों की ओर ध्यान दिलाते हुए हाल ही में नेपाल के हिंसक प्रदर्शनों का ज़िक्र भी किया.
वीएचपी ने क्या कहा?
सीजेआई की टिप्पणी के बाद से वह सोशल मीडिया यूज़र्स के निशाने पर आ गए थे. उनकी टिप्पणी को असंवेदनशील और अपमानजनक बताया जा रहा था.
कुछ यूज़र्स ने मांग की कि सीजेआई को सनातन हिंदू धर्म के लोगों से भगवान विष्णु का अपमान करने और उनका मज़ाक बनाने के लिए माफ़ी मांगनी चाहिए.
सीजेआई की ताज़ा टिप्पणी सामने आने से पहले इस मामले में विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) ने भी प्रतिक्रिया दी.
वीएचपी ने अपने अध्यक्ष आलोक कुमार के हवाले से एक्स पोस्ट में लिखा, "परसों सर्वोच्च न्यायालय में खजुराहो के प्रसिद्ध जावरी मंदिर में स्थित भगवान विष्णु की खंडित मूर्ति की मरम्मत के लिए याचिका की सुनवाई थी. सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने मौखिक टिप्पणी की, मूर्ति की मरम्मत के लिए भगवान से ही प्रार्थना कीजिए. आप कहते हैं कि आप भगवान विष्णु के कट्टर भक्त हैं, तो अब उन्हीं से प्रार्थना कीजिए."
वीएचपी ने लिखा, "न्यायालय न्याय का मंदिर है. भारतीय समाज की न्यायालयों में श्रद्धा और विश्वास है. हम सब का कर्तव्य है कि यह विश्वास न सिर्फ़ बना रहे वरन् और मज़बूत हो. हम सब का यह कर्तव्य है कि अपनी वाणी पर संयम रखें. विशेष तौर पर न्यायालय के अंदर. यह ज़िम्मेदारी मुकदमा लड़ने वालों की है, वकीलों की है और उतनी ही न्यायाधीशों की भी है."
"हमको लगता है कि मुख्य न्यायाधीश की मौखिक टिप्पणी ने हिंदू धर्म की आस्थाओं का उपहास उड़ाया है. अच्छा होगा अगर इस तरह की टिप्पणी करने से बचा जाए."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित