कोलकाता रेप-मर्डर केस: ममता बनर्जी की छवि और राजनीति पर संकट कितना गहरा

ममता

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इमेज कैप्शन, ममता बनर्जी पर आरोप लग रहे हैं कि उन्होंने रेप के मामले को संवेदनशीलता और गंभीरता से हैंडल नहीं किया
    • Author, सलमान रावी
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, कोलकाता

कोलकाता के आर.जी. कर मेडिकल कॉलेज में ट्रेनी डॉक्टर की रेप और हत्या के मामले से पश्चिम बंगाल में राजनीतिक सरगर्मियां बढ़ी हुई हैं.

विरोध-प्रदर्शन, बंद और हिंसा की घटनाओं के बीच अब प्रदेश के राज्यपाल सीवी आनंद बोस दिल्ली के लिए रवाना हो गए हैं.

गुरुवार को भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष सुकांता मजूमदार और वरिष्ठ नेताओं ने राज्यपाल से मुलाक़ात कर ज्ञापन सौंपा था. राज्यपाल से 'अनुरोध' किया था कि वह पश्चिम बंगाल में 'संवैधानिक मूल्यों की रक्षा' करें.

इससे पहले 27 अगस्त को राज्यपाल ने भी बयान जारी कर 'पश्चिम बंग छात्र समाज' के बुलाए गए 'नबन्ना मार्च' (सचिवालय पर प्रदर्शन) के दौरान हुई हिंसा को लेकर राज्य सरकार की आलोचना की थी.

अब भारतीय जनता पार्टी ने राज्यपाल को जो ज्ञापन सौंपा है, उसमें मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के उस बयान का उल्लेख किया गया है, जो उन्होंने बुधवार को दिया था.

बनर्जी ने ये बयान तृणमूल कांग्रेस छात्र परिषद के स्थापना दिवस के मौक़े पर आयोजित कार्यक्रम में दिया था.

इस दौरान मुख्यमंत्री ने कहा था, ''पश्चिम बंगाल में आग लगाने की साज़िश हो रही है.अगर पश्चिम बंगाल जलेगा तो असम, पूर्वोत्तर राज्य, उत्तर प्रदेश, ओडिशा और दिल्ली भी जलेंगे.''

दबाव में हैं ममता बनर्जी?

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इमेज कैप्शन, लोगों को संबोधित करतीं ममता बनर्जी

ममता बनर्जी के बयान की बीजेपी शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने आलोचना की, जिनमें असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा और मणिपुर के मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह भी शामिल हैं.

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मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के उस बयान की आलोचना भी हो रही है, जिसमें उन्होंने हड़ताल कर रहे डॉक्टरों को काम पर वापस लौटने की सलाह देते हुए कहा था कि सरकार उनके ख़िलाफ़ कोई क़ानूनी कार्रवाई नहीं करना चाहती है, क्योंकि अगर ऐसा हुआ तो उनका 'भविष्य ख़राब हो जाएगा''.

पश्चिम बंगाल की राजनीति पर नज़र रखने वाले मानते हैं कि मुख्यमंत्री के बयानों से यह झलकने लगा है कि आर.जी. कर मेडिकल कॉलेज में बलात्कार और हत्या की घटना के बाद आम लोगों में पनपे आक्रोश से ममता बनर्जी दबाव में हैं.

कुछ जानकार कहते हैं कि उन्हें इतने दबाव में पहली बार देखा जा रहा है.

वहीं कुछ ऐसे भी हैं, जिन्हें लगता है कि वह इससे जल्द ही उबर जाएंगी.

राजनीतिक विश्लेषक प्रोसेनजीत बोस कहते हैं कि ये सही है कि ये पहली बार नहीं है, जब ममता बनर्जी को आंदोलन का सामना करना पड़ रहा हो, लेकिन वो मानते हैं कि इस बार वो दबाव में इसलिए दिख रही हैं क्योंकि आम लोगों के बीच उनके शासन चलाने के तरीक़े की आलोचना हो रही है.

प्रोसेनजीत बोस कहते हैं, "महिलाओं के ख़िलाफ़ अपराध को लेकर पश्चिम बंगाल सरकार का ये रिकॉर्ड नहीं रहा है कि उसने किसी पीड़िता को इंसाफ़ दिलवाया हो या फिर इस तरह की घटनाओं को अंजाम देने वालों को कभी क़ानूनी शिकंजे में जकड़ा हो.''

बोस कहते हैं कि आर.जी. कर मेडिकल कॉलेज की घटना के बाद आम लोगों और ख़ास तौर पर आम महिलाओं का ग़ुस्सा फूट पड़ा, जिसका तृणमूल कांग्रेस के बड़े नेताओं, राज्य सरकार या ख़ुद ममता बनर्जी को अंदाज़ा नहीं था."

उनका कहना है कि जिस तरह से कोलकाता पुलिस की भूमिका इस मामले को लेकर रही, जैसे एफ़आईआर दर्ज करने में देरी, पीड़िता के माता-पिता को ग़लत जानकारी दिया जाना या फिर घटना में 'सिविल वॉलंटियर' का शामिल होना-ये सब लोगों के ग़ुस्से को बढ़ाता रहा.

बीबीसी से बात करते हुए प्रोसेनजीत बोस ने कहा, "कई चीज़ें एक साथ हुईं. जैसे मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल और अन्य वरिष्ठ प्रशासकों की भूमिका. फिर अभियुक्त संजय राय पुलिस का ही हिस्सा है, बतौर एक सिविल वॉलंटियर. फिर 14 और 15 अगस्त की दरमियानी रात में आर.जी. कर मेडिकल कॉलेज में विरोध कर रहे जूनियर डॉक्टरों पर जो भीड़ का हमला हुआ, उससे कोलकाता पुलिस की छवि तो ख़राब हुई ही साथ ही पश्चिम बंगाल सरकार भी आम लोगों के सवालों के घेरे में आ गई."

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सिर्फ़ एक घटना ही इन प्रदर्शनों की 'असली वजह' नहीं

प्रदर्शन के दौरान कोलकाता पुलिस

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इमेज कैप्शन, कोलकाता में ममता सरकार के ख़िलाफ़ विरोध-प्रदर्शन लगातार जारी है

पीड़िता के परिवार और जूनियर डॉक्टरों के आक्रोश के बावजूद आर.जी. कर मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल संदीप घोष पर प्रशासनिक कार्रवाई ना करते हुए, उनको कोलकाता नेशनल मेडिकल कॉलेज और अस्पताल का प्रिंसिपल बना दिया गया.

वो भी तब जब उनके ख़िलाफ़ 'प्रशासनिक अनियमितताओं' के आरोपों की लिखित शिकायत राज्य सरकार के पास मौजूद थी.

यही वजह है कि पश्चिम बंगाल सरकार के रुख़ को लेकर कोलकाता हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने भी तल्ख टिप्पणियां कीं. इससे लोगों के बीच राज्य सरकार और ममता बनर्जी को लेकर आक्रोश भड़क गया.

ऐसा पहली बार भी हुआ है कि आम लोगों के साथ-साथ, अलग-अलग ही सही, सभी विपक्षी दल, जैसे कांग्रेस और वाम दलों ने भी ममता बनर्जी के ख़िलाफ़ इस घटना के बाद मोर्चा संभाला.

राजनीतिक विश्लेषक दिवाकर रॉय का कहना है कि प्रशासन के ख़िलाफ़ लोगों का जो ग़ुस्सा फूट पड़ा, वह सिर्फ़ एक घटना की वजह से नहीं है बल्कि कई मुद्दे हैं, जिनको लेकर लोगों में आक्रोश पहले से ही पनप रहा था.

वो कहते हैं कि पार्टी के अंदर ही अभिषेक बनर्जी ने कई बार यह मुद्दा उठाया कि राज्य प्रशासन ठीक से काम नहीं कर रहा है.

उनका कहना था, "प्रशासन जिस तरह से चल रहा है, उसको लेकर भी लोगों में पहले से ही ग़ुस्सा था. जैसे जन प्रतिनिधियों की थाना प्रभारियों और स्थानीय प्रशासनिक अधिकारियों के सामने कुछ चलती ही नहीं थी.

वैसे देखा जाए तो पश्चिम बंगाल में लोगों का राजनीतिक दलों पर से ही भरोसा कम होता जा रहा है. क्योंकि किसी भी राजनीतिक दल के नेताओं की भाषा अगर आप सुनें तो एक तरह से उकसाने वाली भाषा बोलते हैं.

पहले ये आरोप वाम दलों पर लगते थे मगर अब तृणमूल कांग्रेस, बीजेपी और कांग्रेस के नेताओं पर भी इसी तरह के आरोप लग रहे हैं. इसलिए वो ग़ुस्सा आम लोगों में पनप तो रहा था, लेकिन आर.जी. कर मेडिकल कॉलेज की घटना के बाद लोगों के सब्र का बांध टूट गया."

ममता बनर्जी की छवि पर असर

ममता बनर्जी

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इमेज कैप्शन, कोलकाता में एक कार्यक्रम के दौरान ममता बनर्जी

वरिष्ठ पत्रकार सुबीर भौमिक मानते हैं कि ऐसा पहली बार हुआ है, जब आम लोगों के बीच ममता बनर्जी की छवि ख़राब हुई है. वह भी इसीलिए कि कोलकाता पुलिस और अस्पताल के प्रशासन पर फौरन कोई कार्रवाई नहीं की गई.

लेकिन वो मानते हैं, "ममता दबाव में ज़रूर दिख रही हैं, मगर इससे उबरने की पूरी कोशिश कर रही हैं. उनके पास अब भी कई दांव मौजूद हैं. उन्होंने बलात्कार के अभियुक्तों को फांसी देने के लिए क़ानून लाने की बात भी कही है और भी बहुत कुछ है, उनके झोले में. तो यह कहना ठीक नहीं होगा कि उनका खेला ख़त्म हो रहा है. खेला ख़त्म नहीं हुआ है, जबकि भाजपा ने लोगों के इस आक्रोश को भुनाने की पूरी कोशिश की है."

जानकार कहते हैं कि जिस तरह का दबाव ममता बनर्जी पर पिछले एक-दो दिनों में बन गया है, उससे बाहर निकलने के लिए वह आक्रामक तेवर भी दिखा रही हैं.

जिस तरह राज्य सरकार ने भारत बंद के दौरान गिरफ्तारियां की हैं या फिर 'पश्चिम बंग छात्र समाज' के 'नबन्ना मार्च' (सचिवालय मार्च) करने वालों पर क़ानूनी कार्रवाई की है, उससे वह फिर से चीज़ों को अपने हाथों में लेने की कोशिश कर रही हैं, ऐसा उनकी पार्टी के वरिष्ठ नेताओं का कहना है.

तृणमूल कांग्रेस के नेता मानते हैं कि 'जिस तरह की राजनीति विपक्ष और ख़ास तौर पर भारतीय जनता पार्टी कर रही है,' उसको लेकर ममता बनर्जी का आक्रामक रवैया ही सही है.

तृणमूल कांग्रेस के नेता जय प्रकाश मजूमदार कहते हैं, "हाल ही में लोकसभा के चुनावों में बीजेपी को मुंह की खानी पड़ी थी. उन्होंने तृणमूल कांग्रेस को हराने के लिए हर हथकंडा अपनाया था, मगर जनता ने उन्हें नकार दिया.

मजूमदार कहते हैं, अब आर.जी. कर की घटना को लेकर बीजेपी अपनी राजनीति फिर से चमकाने की कोशिश कर रही है और राज्य में हिंसा और अराजकता फैलाने की कोशिश कर रही है.

उनका कहना है कि राज्य सरकार ने घटना के फौरन बाद कार्रवाई की और एक अभियुक्त को कुछ ही घंटों में पकड़ लिया.

इसके बाद मामला सीबीआई के पास चला गया है, तो सवाल उन पर उठता है कि उन्होंने इतने दिनों में जांच में क्या प्रगति की है? यह इस घटना को लेकर राज्य को अशांत करने की साज़िश कर रहे हैं, जिसका ममता बनर्जी ने भांडा फोड़ा है."

मजूमदार का आरोप है कि केंद्र सरकार और ख़ास तौर पर बीजेपी पश्चिम बंगाल को 'राज्यपाल के ज़रिए अस्थिर करने की कोशिश' कर रही है. वह कहते हैं कि इससे पहले भी संदेशखाली को लेकर बीजेपी ने पश्चिम बंगाल सरकार के ख़िलाफ़ माहौल बनाने की कोशिश की थी.

पश्चिम बंगाल बीजेपी के महासचिव जगन्नाथ चटर्जी इन आरोपों का खंडन करते हुए कहते हैं कि राज्यपाल अपना संवैधानिक धर्म निभा रहे हैं लेकिन उनके ख़िलाफ़ भी साज़िश रची गई है.

वो कहते हैं कि पश्चिम बंगाल में अराजकता का माहौल तृणमूल कांग्रेस की सरकार ने ही पैदा किया है. उनका कहना था, "जैसे सामंतवादी व्यवस्था हुआ करती थी, ठीक उसी तरह से सरकार चलाई जा रही है. सभी क़ानून ताक पर रख दिए गए हैं.''

जगन्नाथ चटर्जी कहते हैं कि अब सिविल वॉलंटियर की भूमिका को ही ले लीजिए. ये कौन हैं. ये कैसे नियुक्त हुए? ये पुलिस के साथ बिना किसी प्रशिक्षण के कैसे काम कर रहे हैं. इन्हीं में से एक सिविल वॉलंटियर आर. जी, कर मेडिकल कॉलेज की घटना का अभियुक्त है. ये सब तृणमूल कांग्रेस के कैडर के हैं जो आम लोगों का दोहन करते हैं. हम सवाल उठा रहे हैं तो हम अराजक कैसे हुए ?"

वो कहते हैं कि सरकार 'अपनी नाकामियों की वजह से घिर गई है'.

अब भी चल रहा है डॉक्टरों का प्रदर्शन

कोलकाता में जारी है डॉक्टरों का प्रदर्शन

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इमेज कैप्शन, कोलकाता में प्रदर्शन करते जूनियर डॉक्टर

बुधवार की दोपहर का समय और कोलकाता के सबसे व्यस्ततम इलाक़े में डॉक्टरों और चिकित्सा कर्मियों का जुलूस ख़ामोशी से आगे बढ़ता जा रहा है. ये सभी जूनियर डॉक्टर और नर्सिंग स्टूडेंट हैं. इनमें से कुछ आर. जी. कर मेडिकल कॉलेज से हैं तो कुछ दूसरी मेडिकल संस्थाओं से.

'वी वांट जस्टिस' या 'हमें इंसाफ़ चाहिए लिखे' हुए पोस्टर इनके हाथों में हैं और ये सब नौ अगस्त को हुई मेडिकल की छात्रा के बलात्कार और हत्या की घटना के 'अभियुक्तों पर कार्रवाई की मांग' कर रहे हैं.

नुक्कड़ नाटक के ज़रिए ये छात्र अपनी भावनाओं को व्यक्त करने की कोशिश कर रहे हैं.

आंदोलन डॉक्टरों का था जो अपनी सहकर्मी की हत्या और बलात्कार के दोषियों के लिए सज़ा की मांग कर रहे थे. मगर अब इन आंदोलनरत डॉक्टरों की आवाज़ राजनीतिक हिंसा और बयानबाज़ी के शोर में दबती जा रही है.

कोलकाता के श्याम बाज़ार के इलाक़े से विरोध मार्च निकाल रहे जूनियर डाक्टरों में से एक अनुपम कांति बाला कहते हैं कि अब मुख्य मुद्दा ही गौण होता जा रहा है.

बीबीसी से बात करते हुए उनका कहना था, "हमारी सहपाठी के साथ बलात्कार हुआ फिर हत्या कर दी गई. कोलकाता पुलिस ने जांच की और अब सीबीआई जांच कर रही है. लेकिन नतीजा क्या आया. नौ अगस्त की घटना है और अभी तक सिर्फ़ एक ही गिरफ़्तारी हो पाई है.

अनुपम कांति कहते हैं कि कोलकाता पुलिस ने जिस तरह से मामले को लेकर रुख़ अपनाया था, उसको लेकर सुप्रीम कोर्ट तक से उसे फटकार मिल चुकी है. मगर अब सीबीआई क्या कर रही है? पता नहीं हमारी सहकर्मी को इंसाफ़ भी मिल पाएगा या नहीं. हमें आक्रोश से ज़्यादा दुख सता रहा है."

प्रदर्शन में शामिल एक अन्य डॉक्टर, अनुपम रॉय कहते हैं, "अब हमारी मांगों की तरफ़ कोई नहीं देख रहा है. राजनीतिक दल आपस में कुश्ती कर रहे हैं. हमारा भविष्य, हमारी मांगें, पीड़िता को इंसाफ़ या हमारी सुरक्षा - ये मुद्दे राजनीतिक दलों ने दबा दिए हैं."

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित

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