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भारत में पूर्ण सूर्य ग्रहण कब दिखाई देगा और इसे देखने लोग हज़ारों मील दूर क्यों चले जाते हैं?
भारत में जब रात का सन्नाटा पसरा हुआ था तब अमेरिका, कनाडा और मैक्सिको के कुछ हिस्सों में पूर्ण सूर्य ग्रहण देखा गया.
इसे भारत में नहीं देखा जा सका लेकिन कुछ भारतीय लोग इस ग्रहण को देखने के लिए अमेरिका और कनाडा तक चले गए.
साल में सूर्य ग्रहण और चंद्र ग्रहण कुछ ही बार देखने को मिलता है. लेकिन हमारी पृथ्वी का तीन चौथाई हिस्सा महासागरों से भरा है इसलिए भी ज़मीनी हिस्से पर पूर्ण सूर्य ग्रहण देखना बहुत दुर्लभ माना जाता है.
कई लोगों को अपने जीवनकाल में केवल एक बार ही ऐसा ग्रहण देखने का मौका मिलता है. लेकिन कई ऐसे भी होते हैं जो ग्रहण देखने के लिए लंबी दूरी की यात्रा भी करते हैं.
ऐसे लोगों को ग्रहण का पीछा करने वाले या ग्रहण देखने के दीवाने कहा जा सकता है.
खगोलशास्त्री एवं पंचांग लेखक डीके सोमन उनमें से एक हैं.
उन्होंने बीबीसी संवाददाता जान्हवी मुले से बातचीत में अब तक देखे गए कुछ सूर्य ग्रहणों के बारे में इस तरह बताया. आगे पढ़िए डीके सोमन के शब्द.
आज़ाद भारत का पहला सूर्य ग्रहण
पूर्ण सूर्य ग्रहण एक प्राकृतिक घटना है. यह प्रकृति का बहुत ही सुंदर, अलौकिक दृश्य होता है जब सूर्य की रोशनी कुछ देर के लिए थम जाती है, हालांकि उनकी बाहरी छल्लों से रोशनी आती रहती है, लेकिन बीच का पूरा हिस्सा अंधकारमय दिखता है.
मुझे अभी भी 16 फरवरी 1980 का पूर्ण सूर्यग्रहण अच्छी तरह याद है. उस समय लगभग आठ दशकों के बाद भारत में पूर्ण सूर्य ग्रहण दिखाई दिया था. (यह स्वतंत्र भारत का पहला पूर्ण सूर्य ग्रहण था.)
इसलिए उस समय मैंने कई स्थानों की यात्रा की और सैकड़ों व्याख्यान दिए, लोगों को ग्रहण के बारे में बताया. यह ग्रहण दक्षिण भारत में दिखाई दिया था.
तब मैं मराठी विज्ञान परिषद के लिए कारवार के पास एक गाँव अंकोला की यात्रा पर गया था. पूर्ण सूर्यग्रहण हमारी पीढ़ी में पहले कभी नहीं देखा गया था.
इसलिए भारत में उस वक्त उत्सुकता और भय का माहौल था. अंकोला गांव में लोग दरवाज़े-खिड़कियां बंद करके बैठे थे. मैंने एक घर का दरवाज़ा खटखटाया तो उन्होंने कहा, 'सरकार ने हमसे कहा है कि ग्रहण को न देखें, इससे आंखें ख़राब हो जाएंगी.'
बेशक, ग्रहण को इसके लिए बने विशेष चश्मों से ही देखना चाहिए. उस समय हम मराठी विज्ञान परिषद के माध्यम से ऐसा चश्मा अपने साथ ले गए थे.
पूर्ण सूर्य ग्रहण में जैसे ही चंद्रमा सूर्य को पूरी तरह से ढकना शुरू करता है, छाया पट्टियां सबसे पहले दिखाई देने लगती हैं. अंधेरे गोले के चारों तरफ़ रोशनी का छल्ला दिखाई देता है.
हम एक सफ़ेद चादर पर लेटे हुए थे और उस पर वो छायादार रोशनी की लहरें दिखाई दे रही थीं.
आकाश में हमने एक हीरे की अंगूठी देखी - हीरे की अंगूठी जैसा दृश्य. यह कुछ सेकंड के लिए दिखाई दिया और इसके तुरंत बाद चंद्रमा ने सूर्य को पूरी तरह से ग्रहण कर लिया.
पूरी तरह अंधेरा हो गया तो हमने चश्मा उतार दिया. यह भी विस्मय भरा था. क्योंकि आकाश में दूसरे ग्रह भी दिन में दिखाई देने लगे थे. भरी दोपहर को आकाश में बुध और शुक्र ग्रह दिखाई दिए.
लेकिन हर तरफ़ अंधेरा था, इतना अंधेरा था कि कोई घड़ी पर समय तो देख सकता था लेकिन किताब नहीं पढ़ सकता था.
उस समय तापमान दस डिग्री तक गिर गया था. जानवर स्तब्ध रह गए थे. हमने इन सभी प्रभावों को रिकॉर्ड किया था.
हम अपने साथ कुछ पौधे भी ले गये थे. हम सभी जानते हैं कि कुछ पेड़ रात में अपने पत्ते खो देते हैं, ग्रहण के दौरान भी पेड़ के पत्ते झड़ गए थे.
कुछ समय बाद जब चंद्रमा एक ओर हट गया और सूर्य की किरणें प्रकट हुईं. तभी हमारे एक बुजुर्ग सज्जन ने कहा, "यह पश्चिम में सूर्योदय है." (उस समय सूर्य पश्चिम में था.)
फिर हीरे की अंगूठियाँ, छाया तरंगें प्रकट हुईं. तभी मुर्गे ने बांग दी, वह आवाज़ भी हमारे टेप रिकॉर्डर में रिकॉर्ड हुई थी.
भारत में कब दिखेगा अगला सूर्य ग्रहण?
भारत में 1980 के बाद 24 अक्टूबर 1995 को पूर्ण सूर्य ग्रहण हुआ था. इसे देखने के लिए हम मराठी विज्ञान परिषद की यात्रा के साथ फिर से फ़तेहपुर सीकरी गए. लेकिन वह ग्रहण कुछ सेकंड के लिए ही था. मुझे लगता है कि यह लगभग 50-55 सेकंड का रहा होगा.
क़रीब चार साल बाद फिर 11 अगस्त 1999 को भारत में सूर्य ग्रहण देखा गया. उस वक्त हम गुजरात के भुज गये थे. लेकिन अगस्त के बारिश के मौसम में आसमान में बादल छाए हुए थे और हमलोग ग्रहण ठीक से नहीं देख सके.
इसके एक दशक बाद 22 जुलाई 2009 को पूर्ण सूर्य ग्रहण उत्तर भारत में दिखाई दिया. इसे देखने के लिए हमलोग इंदौर गए. वहां भी मानसून के कारण ग्रहण ठीक से नहीं देखा जा सका.
इसके बाद आंशिक सूर्य ग्रहण देखने का योग भी बना. 15 जनवरी 2010 को कन्याकुमारी में लगभग आठ मिनट तक शानदार ग्रहण देखा गया. आंशिक ग्रहण में सूर्य पूरी तरह से ढका नहीं होता है. लेकिन इसे देखना भी एक अलग ही अनुभव है. दक्षिण भारत में 2019 और उत्तर भारत में 2020 में आंशिक ग्रहण देखने को मिला.
इसके अलावा, मैंने यहां अमेरिका में भी अशंकालिक ग्रहण देखा और 2024 में पूर्ण सूर्य ग्रहण देखने के लिए भी अमेरिका आया हूं. इस ग्रहण के दौरान एक धूमकेतू के देखने का मौका मिल सकता है.
भारत में अगला पूर्ण सूर्य ग्रहण वर्ष 2034 में कश्मीर में दिखाई देगा.
लोग सूर्य ग्रहण देखने क्यों जाते हैं?
कई लोग विशेष ग्रहण देखने के लिए लंबी दूरी तय करते हैं. लोगों में ग्रहण को लेकर इतनी जिज्ञासा क्यों होती है. दरअसल जिस तरह लोग ख़ास मौकों पर ख़ास मंदिर-मस्जिद जाते हैं, उसी तरह अंतरिक्ष और सौरमंडल में दिलचस्पी रखने वाले शोधकर्ताओं के लिए ग्रहण अहम होता है.
वे इसे देखते हैं और इसको लेकर अपनी टिप्पणियां दर्ज करते हैं. अमेरिका में एक बार छलनी के माध्यम से ग्रहण का प्रतिबिंब देखने की कोशिश की थी, ऐसे कई प्रयोग किए जा सकते हैं.
ग्रहण जैसी घटनाएं आम लोगों, ख़ासकर बच्चों में विज्ञान के प्रति रुचि पैदा कर सकती हैं. बच्चों को उल्का पिंड और धूमकेतु भी दिखाने चाहिए.
ऐसा कहा जाता है कि विजयदुर्ग किले में ग्रहण के दौरान ली गई तस्वीरों से हीलियम की खोज में मदद मिली थी.
ग्रहण के दौरान सूर्य के प्रभामंडल और सौर धब्बों के बीच संबंध का भी अध्ययन किया जाता है. यही कारण है कि खगोल-उत्साही लोगों को ग्रहण देखने के लिए यात्रा अवश्य करनी चाहिए.
अंशकालिक ग्रहण में भी पूर्ण अंधकार नहीं होता. लेकिन पूर्ण सूर्य ग्रहण अलौकिक लगता है, अंधेरा हो जाता है और तारे दिखाई देने लगते हैं. लोगों को यह आकर्षक लगता है.
ग्रहण से डरो मत
प्राचीन काल से ही लोग ग्रहण से डरते रहे हैं. दिन में अंधेरा होने को लेकर कई तरह की ग़लतफहमियां फैलती गईं. धार्मिक कारणों के चलते भी लोग डर जाते थे. लेकिन इन डरों के पीछे किसी तरह की कोई सच्चाई नहीं है.
ग्रहण से कुछ भी अशुद्ध नहीं होता. ग्रहण के बाद लोग स्नान आदि करते थे. लेकिन किसी झील का पानी वही है, है ना? वह अपवित्र कैसे हो सकता है?
अब लोग इतना डरते नहीं हैं, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और स्कूलों में शिक्षा के चलते अब डर कम हो गया है.
वैसे ग्रहण के दौरान ध्यान रखने की एक ही बात है - पूर्ण सूर्य ग्रहण की स्थिति को छोड़कर सूर्य ग्रहण को कभी भी नंगी आंखों से न देखें.
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