असरानी: हहा... शोले के जेलर का आइडिया कहां से आया- कहानी ज़िंदगी की

असरानी: हहा... शोले के जेलर का आइडिया कहां से आया- कहानी ज़िंदगी की
    • Author, इरफ़ान

असरानी यानी गोवर्धन कुमार असरानी, हिंदी सिनेमा के उन कलाकारों में से हैं, जिन्होंने वैसे तो कई तरह के कैरेक्टर्स प्ले किए लेकिन एक कॉमेडियन के रूप में ही उन्हें याद किया जाता है.

हाल के महीनों में सोशल मीडिया पर उनके मरने की ख़बरें भी उड़ाई जाती रहीं, लेकिन उनके अनुसार "इससे इंसान की उम्र बढ़ती ही है."

असरानी एक जनवरी 1941 को जयपुर में एक सिंधी परिवार में जन्मे. पढ़ाई सेंट ज़ेवियर्स स्कूल, जयपुर और फिर राजस्थान कॉलेज से हुई.

उनके पिता कालीन की एक फ़ैक्ट्री में मैनेजर थे. 8 भाई बहनों में दूसरे नंबर के असरानी ऑल इंडिया रेडियो, जयपुर में कई तरह के प्रोग्रामों में हिस्सा लेते रहे, यानी आवाज़ की दुनिया से उनका रिश्ता शुरू से ही रहा.

एफटीआईआई में सीखीं एक्टिंग की बारीकियां

हालांकि मैट्रिक की पढ़ाई के दौरान उनको हीरो बनने का दिल हुआ तो बंबई चले आए लेकिन दो साल दिशाहीन रहने के बाद वापस जयपुर लौट गए.

कॉलेज की पढ़ाई के बाद उन्होंने पुणे फिल्म इंस्टीट्यूट- आज का एफटीआईआई जॉइन किया और एक्टिंग कोर्स पूरा किया.

हफ़्ते के हर शुक्रवार को वो पुणे से मुंबई जाते, निर्माताओं से मिलते और उम्मीद लेकर लौटते. लगातार कोशिश करने की उनकी यह आदत ही बाद में उनकी पहचान बनी.

शुरुआत में तो उन्हें छोटे-छोटे रोल मिले लेकिन सत्तर का दशक आया तो असरानी का जलवा दिखने लगा- 'गुड्डी', 'बावर्ची', 'नमक हराम', 'चुपके चुपके', 'अभिमान' जैसी फ़िल्मों में उनकी मौजूदगी कहानी को हल्का-फुल्का, मानवीय और यादगार बना देती थी.

शोले के जेलर से जीता सबका दिल

'आज की ताज़ा खबर' में उनके कमाल के काम के लिए उन्हें फ़िल्मफेयर का बेस्ट कॉमेडियन अवॉर्ड भी मिला. 'रफ़ूचक्कर', 'बालिका वधू', 'पति पत्नी और वो' में उनकी बहुरंगी कॉमिक टाइमिंग देखते ही बनती है.

और फिर आता है वो किरदार जिसे भूलना मुश्किल है- 'शोले' का अंग्रेज़ों के ज़माने का जेलर! छोटी-सी भूमिका, लेकिन अंदाज़ ऐसा कि आज भी डायलॉग ज़ुबान पर आ जाता है- "हम अंग्रेज़ों के ज़माने के जेलर हैं…" इस किरदार की बॉडी लैंग्वेज में हिटलर की झलक भी रची-बसी थी.

असरानी ने इस जेलर को सिर्फ़ मज़ाक नहीं, बल्कि एक तरह की सत्ता की अजीबोगरीब हास्यास्पदता के रूप में खेला और यही वजह है कि वह कैरेक्टर आज पचास साल बाद भी दर्शकों की यादों में ताज़ा है.

असरानी की जीवन-दृष्टि सीधी और सधी हुई है- काम करते रहो, मौके खुद बनते हैं. वो अक्सर बताते हैं कि डिप्लोमा कोई पासपोर्ट नहीं होता. मेहनत, धैर्य और पेशे के प्रति लगन ही कलाकार को टिकाती है.

'कॉमेडी का मतलब सिर्फ़ हंसाना नहीं'

एफटीआईआई से निकलकर संघर्ष, फिर शिक्षण और साथ-साथ लगातार ऑडिशन देना, यह पूरा सफ़र उनकी सोच को आकार देता है.

शायद इसलिए वे किरदार चाहे छोटे हों या बड़े, उन्हें पूरे सम्मान और तैयारी के साथ निभाते रहे.

उनकी नज़र में कॉमेडी सिर्फ़ हँसाना नहीं, सच्चाई तक पहुँचने का रास्ता है. हँसी के ज़रिए आदमी अपने डर, ढोंग और ढर्रे से बाहर आ जाता है.

असरानी एक ऐसे अभिनेता हैं, जिनकी कला ने हिंदी सिनेमा को हल्के-फुल्के विनोद की गरिमा तो सिखाई ही, साथ ही बतौर चरित्र अभिनेता अपनी विशिष्ट उपस्थिति कैसे दर्ज की जाए, इसकी भी सीख दी.

85 की उम्र तक पहुंच रहे असरानी आज भी फ़िल्मों में बतौर एक्टर सक्रिय हैं, जो बहुत प्रेरणास्पद हैं.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित

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