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नीतीश, तेजस्वी और प्रशांत किशोर: बिहार विधानसभा चुनाव में कौन पड़ेगा भारी- द लेंस
इस साल के अंत तक बिहार में विधानसभा चुनाव होना है. बिहार की राजनीति सीधे केंद्र की राजनीति पर असर डालती है. इसलिए केंद्र की किसी भी सरकार के लिए बिहार का समीकरण काफ़ी अहम होता है.
बिहार की राजनीति कब और किस तरह से करवट लेगी कहना मुश्किल होता है. इस बार बिहार का चुनाव एक बार फिर से नीतीश कुमार के इर्द गिर्द बुना जा रहा है.
बीजेपी ने फ़िलहाल राज्य में नीतीश की जनता दल यूनाइटेड के नेतृत्व में चुनाव लड़ना स्वीकार कर लिया है. वहीं तेजस्वी यादव उनके विरोधी दल के नेता के रूप में मुखर रहेंगे.
उनकी पार्टी राष्ट्रीय जनता दल के सामने एनडीए को टक्कर देने की चुनौती है. एनडीए में साल 2020 के पिछले बिहार विधानसभा चुनाव में चिराग पासवान के तौर पर दरार देखी गई थी और इसका फायदा आरजेडी ने उठाया था.
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बिहार की राजनीति की दिशा चुनावी साल में क्या है? क्या नीतीश कुमार के पास ही अब भी राज्य में जीत की चाबी है?
क्या बीजेपी अकेले दम पर बिहार में निर्णायक बढ़त हासिल करने की ताक़त बना पाई है? क्या तेजस्वी यादव के नेतृत्व में राजद एंटी-इनकंबेंसी को भुना पाएगी?
कांग्रेस के सामने क्या विकल्प हैं और छोटी पार्टियों का समर्थन किसका बेड़ा पार लगाएगा?
बीबीसी हिन्दी के साप्ताहिक कार्यक्रम, 'द लेंस' में कलेक्टिव न्यूज़रूम के डायरेक्टर ऑफ़ जर्नलिज़्म मुकेश शर्मा ने इन्हीं सवालों पर चर्चा की.
इन मुद्दों पर चर्चा के लिए लोकनीति सीएसडीएस के सह-निदेशक संजय कुमार, इकोनॉमिक टाइम्स के डिप्टी पॉलिटिकल एडिटर राकेश चतुर्वेदी और पटना से बीबीसी संवाददाता सीटू तिवारी शामिल हुए.
चुनाव से पहले ही गरमाई राजनीति?
बिहार विधानसभा चुनाव की सरगर्मी अब बढ़ने लगी है. चुनावी समीकरण भी अब आकार ले रहे हैं. ऐसे में एक बार फिर से चुनावी गठबंधन की बात जोर शोर से उठ रही है. बिहार का चुनाव इस बार कई मायनों में बहुत अलग होने जा रहा है.
बीबीसी संवाददाता सीटू तिवारी ने कहा, "बिहार चुनाव में नेताओं के भाषण बहुत ही कसैला और कड़वा होने जा रहे हैं. बजट सत्र में ही इसकी झलक दिखाई देने लगी है. तेजस्वी हों या फिर नीतीश दोनों ही व्यक्तिगत हमला कर रहे हैं. एनडीए हो या फिर इंडिया गठबंधन दोनों तरफ से व्यक्तिगत हमले हो रहे हैं."
उन्होंने बताया, "नीतीश कुमार सदन में तेजस्वी को बच्चा कहकर बात करते हैं. इस तरीके से वह उनके कद को कम करने का प्रयास करते हैं. नीतीश का कहना है कि उन्होंने तेजस्वी के पिता लालू यादव के साथ राजनीति की है. ऐसे में वह उन्हें क्या सिखाएंगे?"
उन्होंने बताया कि आरजेडी नेता तेजस्वी यादव इस समय नीतीश कुमार के साथ ही उप मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी का भी राजनीतिक हमला झेल रहे हैं. इसके साथ ही अन्य नेता भी तेजस्वी पर हमलावर हैं.
क्या बदलेगा गठबंधन का समीकरण?
इकोनॉमिक टाइम्स के डिप्टी पॉलिटिकल एडिटर राकेश चतुर्वेदी कहते हैं, "राजनीति में अनिश्चितता तो रहती है, लेकिन बिहार में बीजेपी ने यह स्पष्ट कर दिया है कि एनडीए विधानसभा का चुनाव नीतीश कुमार के नेतृत्व में ही लड़ेगा. "
बिहार के पिछले विधानसभा चुनाव में 243 सीटों की विधानसभा में बीजेपी 110 सीटों पर और जेडीयू 115 सीटों पर चुनाव लड़ी थी. इस बार सीटों के बंटवारे को लेकर रस्साकशी और सौदेबाजी देखने को मिल सकती है क्योंकि पिछली बार जेडीयू मात्र 43 सीटों जीत पाई थी.
उन्होंने बताया, "उसके आगे क्या होगा? चुनाव के बाद क्या परिणाम आते हैं? कैसी परिस्थितियां होंगी? आरजेडी का प्रदर्शन कैसा होगा? अगर आरजेडी के पास सीटें अच्छी आती हैं तो नीतीश कुमार के पास आरजेडी के साथ जाने का विकल्प बनता है. ऐसे में इस पर कुछ कहा नहीं जा सकता है."
वह कहते हैं कि पिछली बार जेडीयू का प्रदर्शन बेहद कमजोर रहा था. इसके बावजूद नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री इसलिए बनाया गया क्योंकि उनके पास दूसरा विकल्प मौजूद है. इस समय जेडीयू और आरजेडी के रिश्ते खराब हैं. ऐसे में बीजेपी और जेडीयू चुनाव में साथ लड़ने की संभावना है.
कितने असरदार हैं नीतीश कुमार?
लोकनीति सीएसडीएस के सह-निदेशक संजय कुमार कहते हैं, "नीतीश कुमार की साख अब पहले जैसे नहीं रही. उनकी राजनीतिक निष्ठा पासे की तरह पलटती रही. इसका नुक़सान हुआ है. वहीं उनके खराब स्वास्थ्य और सरकार की कार्यशैली के कारण उनके प्रति विश्वास में कमी आई है, लेकिन यह भी स्थिति नहीं आई कि बीजेपी उनसे पल्ला झाड़कर अकेले चुनाव लड़ ले."
उन्होंने बताया, "फिलहाल बीजेपी अभी आश्वस्त नहीं कि वह अकेले चुनाव लड़कर चुनाव जीत सकती है. मुझे लगता है कि बीजेपी अगर अकेले चुनाव लड़ेगी तो शायद बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरेगी लेकिन इतनी हैसियत नहीं है कि अकेले सरकार बना लें. ऐसे में नीतीश कुमार को चुनाव तक साथ रखना लाजमी है."
वह कहते हैं, "नीतीश कुमार को लेकर बीजेपी नेताओं में बेचैनी बहुत है. चुनाव के बाद यह बेचैनी और भी दिखाई देगी. चुनाव में सीट जीतने का अनुपात अगर पिछली बार की तरह ही रहा तो इस बार बिहार में महाराष्ट्र जैसी राजनीति देखने को मिलेगी."
नीतीश के स्वास्थ्य का बिहार की राजनीति पर असर
नीतीश कुमार अब 74 साल के हो गए हैं. उम्र के साथ उनके स्वास्थ्य को लेकर दिक्कतें सामने आई हैं. ऐसे में उनके नेतृत्व को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं?
सीटू तिवारी कहती हैं, "नीतीश कुमार के स्वास्थ्य को लेकर पूरी की पूरी राजनीति तैयार की जा रही है. साल 2005 में जब नीतीश ने सत्ता संभाली थी तो यह कहा जाता था कि बहुत अच्छे शब्द बोलने वाले व्यक्ति के पास सत्ता आई है. इससे इतर पिछले दिनों में उनका भाषण देखें, उनका स्टाइल देखें, वह कैसे गुस्सा हो जा रहे हैं. सभी महसूस कर रहे हैं कि उनका स्वास्थ्य अब अच्छा नहीं है."
नीतीश कुमार ने अपने बाद दूसरी पंक्ति का कोई नेता उभरने नहीं दिया और 23 साल से पूरी जेडीयू उनके ही इर्द गिर्द घूम रही है.
जेडीयू में दूसरी पंक्ति में अब निशांत कुमार को आगे किया जा रहा है. सवाल यह है कि 40 साल की उम्र पार कर रहा व्यक्ति क्या राजनीतिक विरासत को संभाल पाएगा?
सीटू तिवारी कहती हैं कि नीतीश कुमार के पास 14 प्रतिशत वोट है और बीजेपी भी इस बात को मानती है. यह वजह है कि नीतीश कुमार जिस तरफ जाते हैं, जीत उसी की होती है.
नीतीश के बाद जेडीयू का क्या होगा?
राकेश चतुर्वेदी कहते हैं, "नीतीश कुमार के बाद जेडीयू का अस्तित्व मुश्किल में लगता है. उन्होंने अपने बेटे को राजनीति में उस तरह से नहीं बड़ा किया, जिस तरह से बाल ठाकरे ने किया था. वहां यह बात स्पष्ट थी कि उद्धव ठाकरे को बाल ठाकरे अपना उत्तराधिकारी घोषित कर रहे हैं."
उन्होंने बताया, "नीतीश की राजनीति उन्हीं पर केंद्रित है. उनके बेटे निशांत कुमार ने सक्रिय राजनीति में भाग नहीं लिया है. ऐसे में उनके पास ज्यादा अवसर नहीं है. जेडीयू कार्यकर्ताओं की पार्टी नहीं, जातिगत आधार पर खड़ी पार्टी है. ऐसे में नीतीश कुमार के बाद जेडीयू का क्या भविष्य होगा, कुछ भी कहा नहीं जा सकता है."
उन्होंने बताया कि एक समय था जब नीतीश ने जातिगत आधार पर उपेंद्र कुशवाहा को आगे बढ़ाया लेकिन फिर आगे जाने नहीं दिया. प्रशांत किशोर भी एक समय नीतीश के बहुत क़रीबी थे लेकिन उनके क़रीब जो भी रहा है वह ज्यादा समय तक उनके साथ नहीं रहा.
बिहार की राजनीति में यह भी चर्चा होती है कि जो नेता जेडीयू में नीतीश के बहुत क़रीब हैं. वह बीजेपी के भी उतने की क़रीब हैं.
जेडीयू का वोट बैंक कहां जाएगा?
संजय कुमार कहते हैं, "इस चुनाव में नेतृत्व नीतीश कुमार के हाथ में रहेगा, लेकिन अगर मान लें कि न रहे तो क्या होगा? इससे अति पिछड़ा वर्ग का वोट टूटेगा. यह आरजेडी से टूटकर जेडीयू में आया है तो इसका बड़ा हिस्सा बीजेपी में जाएगा और छोटा हिस्सा आरजेडी के पक्ष में जा सकता है. कांग्रेस को इसका कोई फायदा होते हुए मुझे दिखाई नहीं देता है."
बिहार में 15 साल सरकार के बाद भी आरजेडी का वोट प्रतिशत 26 से 27 के बीच बना हुआ है. अति पिछड़ा वर्ग काफी जद्दोजहद के बाद जेडीयू के साथ गया है.
आरजेडी में अति पिछड़ा वर्ग की वापसी के लिए तेजस्वी को अखिलेश यादव की तरह राजनीतिक संकेत देने होंगें.
अखिलेश यादव ने पिछले लोकसभा चुनाव में अपने परिवार के पांच लोगों को छोड़कर गैर यादव पिछड़े वर्ग का टिकट दिया था. लोकसभा में वह 37 सीटों पर चुनाव जीते.
उन्होंने बताया, "तेजस्वी यादव को टिकट बंटवारे में सकारात्मक संकेत देने पड़ेंगे. उन्हें प्रतिनिधित्व देना पड़ेगा और फिर वह लौटकर न आएं इसकी कोई वजह नहीं है, लेकिन यह आसान भी नहीं है."
बिहार चुनाव में बीजेपी की क्या है रणनीति?
सीटू तिवारी कहती हैं, "अभी बीजेपी के प्रदेश परिषद की बैठक हुई थी. इसमें किसी ने भी नहीं कहा कि बीजेपी बिहार में अकेले सरकार बनाने की इच्छा रखती है. पहले की बैठकों में स्थिति अलग थी. देखा जाए तो बीजेपी ने अपना एक कदम पीछे हटा लिया है."
उन्होंने बताया, "मंत्रिपरिषद विस्तार में बीजेपी ने अपने वोट बैंक सवर्ण, वैश्य को साधते हुए कुर्मी, कोइरी सहित अति पिछड़ों को भी साधा है."
बीजेपी रणनीतिक तौर पर कल्याणकारी योजनाओं से अति पिछड़ा वर्ग के क़रीब जा रही है तो जेडीयू की मुख्य वोटर महिलाओं में भी पैठ बढ़ा रही है.
बीजेपी बहुत संभल कर राजनीति कर रही है जिससे नीतीश कुमार दूर भी न जाएं और वह अपने पैरों पर खड़ी भी हो जाए.
बिहार में क्यों अटक गई है बीजेपी की ग्रोथ
राकेश चतुर्वेदी कहते हैं, "बीजेपी में हमेशा महत्वाकांक्षा रही है कि उन्हें अपने दम पर उनकी सरकार बनें. बिहार में नीतीश कुमार बीजेपी की जरूरत हैं. उनके बिना बीजेपी चुनाव नहीं जीत सकती है. इस चुनाव में भी उनकी जरूरत पड़ेगी. दोनों ही इस रिश्ते से खुश नहीं हैं लेकिन इसे निभाया जा रहा है."
साल 2010 में भी बीजेपी की कार्यकारिणी के समय नरेंद्र मोदी को लेकर एक विवाद भी हो गया था. इसके कारण दोनों नेताओं का डिनर भी रद्द हो गया था.
उन्होंने बताया, "बीजेपी का काडर बिहार में उतना मजबूत नहीं है और न ही कोई ऐसा जन नेता उभरा जो पार्टी का संपूर्ण नेतृत्व संभाल सके. यही वजह है कि साल 2013 में जब नीतीश कुमार ने गठबंधन बदल आरजेडी में गए और फिर बीजेपी में आए तो भी बीजेपी ने उनका स्वागत किया."
उन्होंने बताया कि बीजेपी के अभी दो उप मुख्यमंत्री और 21 मंत्री हैं, वहीं जेडीयू के 13 मंत्री हैं.
पिछली बार जेडीयू की 43 सीट आई थी और बीजेपी 74 सीट आई थी. यह अंतर बढ़ता जा रहा है और निश्चित रूप से बीजेपी जेडीयू के स्पेस को कम करने की कोशिश कर रही है.
दिल्ली के चुनाव का बिहार पर क्या होगा असर?
हाल ही में हुई दिल्ली विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने क़रीब तीन दशक बाद राज्य में विधानसभा चुनाव जीता है. अब देश में बिहार में ही एकमात्र विधानसभा चुनाव होने हैं, तो क्या दिल्ली का असर बिहार के चुनावों में दिख सकता है?
संजय कुमार कहते हैं, "दोनो चुनाव अलग हैं. दिल्ली के चुनाव से केंद्र सरकार पर कोई असर नहीं पड़ रहा था क्योंकि बीजेपी का सीधा मुकाबला आम आदमी पार्टी से था. वहीं बिहार चुनाव का संबंध केंद्र सरकार के स्थायित्व से है इसलिए जरूरी है कि नीतीश कुमार को साथ लेकर चलें."
उन्होंने बताया, "बिहार में बीजेपी अन्य राज्यों की तरह सहयोगी दलों को पीछे छोड़कर आगे नहीं बढ़ पा रही है इसका कारण उनके अंदर की राजनीति और समीकरण की दिक्कत है. मंडल कमीशन के बाद यह जरूरी है पिछड़े समुदाय के नेताओं को आगे लेकर आएं. बिहार में सम्राट चौधरी को आगे लाकर इसकी शुरुआत की गई है."
उन्होंने बताया कि बीजेपी उस रास्ते पर चल पड़ी है लेकिन अगर इसके लिए दस कदम चलने हैं तो मुझे लगता है कि बीजेपी तीन या चार कदम आगे बढ़ी है.
"इस चुनाव के अंत तक वह सातवें, आठवें पायदान पर रहेगी. इस चुनाव में बीजेपी उतनी बड़ी पार्टी नहीं बन सकती है लेकिन जनता उनकी तरफ देख रही है.बीजेपी को अभी समय लगेगा."
कांग्रेस के पास क्या विकल्प है?
संजय कुमार कहते हैं, "कांग्रेस जिस राह पर चल पड़ी है उसमें यूपी, बिहार ही नहीं पश्चिम बंगाल, आंध्रप्रदेश, तमिलनाडू और दिल्ली में संकट नहीं महासंकट है. ऐसे राज्यों की संख्या बढ़ती जा रही है. बिहार में इस बार कांग्रेस के अस्तित्व की लड़ाई है."
उन्होंने बताया, "बिहार में वह गठबंधन करते हैं तो सवाल है कि उन्हें सीटें कितनी मिलेंगी. आरजेडी की तरफ से इसका जिक्र बार बार किया जा रहा है 70 सीटों में से कांग्रेस ने सिर्फ 19 सीटें जीती थी. अगर कांग्रेस का स्ट्राइक रेट थोड़ा भी अच्छा होता तो आज सत्ता में हम होते न की वो."
वे कहते हैं कि मुझे लगता है कि इंडिया गठंबंधन के लिए यही अच्छा है कि जितनी जल्दी हो सके चीजों का बंटवारा करके सार्वजनिक घोषणा करें क्योंकि जनमानस में धारणा बहुत मायने रखती है.
कैसा है आरजेडी और कांग्रेस का रिश्ता?
सीटू तिवारी ने बताया, "दिल्ली विधानसभा चुनाव के बाद कांग्रेस ने कृष्ण अल्लावारु को नया प्रभारी बनाया है. कुछ दिनों पहले अल्का लांबा भी आईं थी. यह पहला मौका है जब जनवरी और फरवरी के बीच राहुल गांधी दो बार आए लेकिन बड़ी बात यह है कि उनके आने की ख़बर कांग्रेस पार्टी को ही नहीं थी."
उन्होंने बताया, "हालांकि इस समय कांग्रेस गठबंधन में काफी आक्रामक नज़र आ रही है. कांग्रेस के विधायक अजीत शर्मा ने कुछ दिन पहले बयान दिया था कि कांग्रेस अब "बी" नहीं "ए" पार्टी बनकर रहेगी. प्रभारी कृष्ण अल्लावारु भी बहुत सधे हुए शब्दों में आक्रामक दिखने की कोशिश कर रहे हैं."
आरजेडी ने अभी तक कुछ कहा नहीं है लेकिन कांग्रेस की सीटें कम करने और सीपीआईएमएल की सीट बढ़ाने की चर्चा है. पिछले चुनाव में सीपीआईएमएल को 19 में से 12 सीटों पर जीत मिली थी.ऐसे में कांग्रेस और आरजेडी के बीच चुनाव तक उठापटक बढ़ने की आशंका है.
वो बताती हैं कि एनडीए ने कार्यकर्ता संवाद शुरू कर दिया है. एनडीए के नेता एक मंच पर दिख रहे हैं और इससे जनमानस में यह संदेश जाता है कि वह एक साथ मिलकर लड़ रहे हैं. आरजेडी या फिर महागठबंधन की तरफ से ऐसी कोई कोशिश नहीं दिखती है.
बिहार में छोटे दलों की क्या है भूमिका?
राकेश चतुर्वेदी कहते हैं, "बिहार की राजनीति जातियों पर आधारित है. छोटी पार्टियों के नेताओं की एक विशेष जाति पर पूरी पकड़ है; जैसे चिराग पासवान का एक अपना वोट बैंक है. जीतन राम मांझी का एक अलग वोट बैंक है. इनके जातिगत वोट बैंक को हासिल करने के लिए गठबंधन की जरूरत है."
उन्होंने बताया," तेजस्वी यादव इस चुनाव में अखिलेश यादव से कुछ सीखेंगे. कांग्रेस को ज्यादा सीटें देने के बजाय अगर अपनी सीटों पर प्रत्याशी उतारते हैं तो उन्हें ज्यादा फायदा होगा.
उन्होंने बताया कि बीजेपी अपना फुटप्रिंट बनाने की कोशिश कर रही है. चिराग पासवान को वो जितनी सीटें पहले देते आ रहे हैं उतनी ही देंगे.
जीतन राम मांझी की भी जहां पकड़ है, वहां सीटें देंगे. बाकी छोटी पार्टियों की भूमिका कुछेक क्षेत्रों के ही है जहां उनकी जातियों का वोट बैंक है.
जनसुराज पार्टी और प्रशांत किशोर कितने बड़े कारक?
संजय कुमार कहते हैं, "बिहार चुनाव में इस बार जनसुराज पार्टी भी एक फैक्टर है. यह कितना बड़ा है इसका पता चुनाव के बाद ही पता चलेगा. हमें उप चुनाव और सामान्य चुनाव में अंतर करके देखने की जरूरत है."
उन्होंने बताया," जब अक्तूबर में विधानसभा चुनाव होंगे तो लोग अपने नुमाइंदे नहीं सरकार चुनेंगे और उस वक़्त अगर ये लगने लगता है कि कोई पार्टी एकदम हाशिए पर है या फिर सरकार बनाने की स्थिति में नहीं तो ऐसे में उनकी तरफ रुझान कम हो जाता है."
उन्होंने कहा, "मैं यह नहीं कह रहा हूं कि उनके प्रति लोगों का रुझान बिल्कुल नहीं होगा. प्रशांत किशोर कुछ न कुछ नुक़सान ज़रूर करेंगे. वो जितना भी वोट लाएंगे, आरजेडी और उनके सहयोगी दलों का ही नुक़सान होगा."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़ रूम की ओर से प्रकाशित
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