बिहार चुनाव: लेफ्ट पार्टियों के लिए 2020 के प्रदर्शन को दोहरा पाना कितनी बड़ी चुनौती?

वाम पार्टियां

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इमेज कैप्शन, इस बार सीपीआई(एमएल)एल ने 20, सीपीआई (एम) ने 4 और सीपीआई ने 9 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे हैं.
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    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

'पॉलिटिकल रिवाइवल यानी राजनीतिक पुनरुत्थान'

साल 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव के परिणामों के बाद वाम दलों के लिए इस शब्द का ख़ूब प्रयोग किया गया. दशकों के सूखे के बाद, वाम दलों ने बिहार में न केवल सीटें जीतीं, बल्कि राज्य की सत्ता-समीकरण में अपनी राजनीतिक उपस्थिति और प्रभाव को एक बार फिर मज़बूती से दर्ज कराया.

तब भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) यानी सीपीएम के तत्कालीन महासचिव सीताराम येचुरी, जो अब इस दुनिया में नहीं रहे, उन्होंने कहा था, ''चुनाव के नतीजों ने साबित कर दिया है कि वामपंथ को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता. जो लोग वाम दलों की प्रासंगिकता पर सवाल उठा रहे थे, उन्हें बिहार में हमारे प्रदर्शन पर नज़र डालनी चाहिए.''

बिहार के बाद वाम के मज़बूत क़िले केरल में भी चुनाव हुए. लेफ़्ट डेमोक्रेटिक फ़्रंट का अच्छा प्रदर्शन रहा और राज्य में उनकी सरकार बनी.

लेकिन इसी साल यानी साल 2021 में पश्चिम बंगाल के चुनाव में कम्युनिस्ट पार्टियों के प्रदर्शन में गिरावट का दौर जारी रहा. वाम दल एक भी सीट जीतने में सफल नहीं रहे.

कुछ और प्रदेश जहां कभी किसी दौर में वाम पार्टियों का प्रभाव दिखता था,जैसे - उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, वहां भी परिणामों में वाम दलों की हिस्सेदारी नगण्य रही.

रही बात 2024 के लोकसभा चुनाव की, तो वाम के जनाधार या सीटों में कोई ख़ास बढ़ोतरी नहीं देखी गई. पर बिहार में प्रदर्शन पहले की तुलना में बेहतर रहे.

ऐसे में एक बार फिर जब बिहार में विधानसभा चुनाव हो रहे हैं और वाम दल महागठबंधन के साथ चुनावी मुक़ाबले में उतरे हैं, तो उनकी उम्मीद भरी निगाहें एक बार फिर बिहार की जनता की ओर टिकी हैं.

इस बार भी लेफ़्ट की तीनों पार्टियां महागठबंधन के साथ मिलकर चुनाव लड़ रही हैं. सीपीआई (एमएल) एल ने 20, सीपीआई (एम) ने 4 और सीपीआई ने 9 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे हैं.

और तीनों ही पार्टियों के नेता पिछले विधानसभा चुनाव की तुलना में बेहतर नतीजों के दावे कर रहे हैं.

पर क्या दावों के अनुकूल नतीजे होंगे? समझने के लिए हमने राजनीतिक विश्लेषक, वरिष्ठ पत्रकार, राजनीतिक विज्ञान के प्रोफ़ेसर, वाम दलों के कुछ कैंडिडेट्स और वोटरों से बात की.

'प्रदर्शन बेहतर होने की उम्मीद'

बिहार में सीपीआई और सीपीएम की तुलना में भाकपा (माले) का जनाधार ज़्यादा मज़बूत है.
इमेज कैप्शन, राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि बिहार में सीपीआई और सीपीएम की तुलना में भाकपा (माले) का जनाधार ज़्यादा मज़बूत है.
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राजनीतिक विशेषज्ञ मनीषा प्रियम कहती हैं कि साल 2020 में वाम दलों का प्रदर्शन आंशिक रूप से कोविड के कारण बेहतर रहा था. बड़ी संख्या में श्रमिक अपने घर लौटे थे, मजदूर वर्ग परेशानी और संकट का सामना कर रहा था इसलिए इन चीज़ों ने लेफ़्ट के मुद्दों को हवा दी और उनका प्रदर्शन बढ़िया रहा.

''लेकिन वाम और आरजेडी का गठजोड़ 2024 के लोकसभा चुनाव में भी मगध-शाहाबाद बेल्ट में अच्छा प्रदर्शन करने में सफल रहा.''

बिहार में मगध क्षेत्र के अंतर्गत गया, औरंगाबाद, नवादा, अरवल और जहानाबाद जैसे ज़िले आते हैं. इन ज़िलों में कुल 20 विधानसभा सीटें हैं.

वहीं शाहाबाद क्षेत्र में भोजपुर, बक्सर, रोहतास, कैमूर जैसे ज़िले शामिल हैं. इनके तहत 16 विधानसभा सीटें हैं.

वरिष्ठ पत्रकार श्रीकांत ने इस तथ्य को रेखांकित करते हुए लेफ़्ट को 2020 की तुलना में अधिक सीट मिलने की उम्मीद जताई है. उनका कहना है कि पिछले चुनाव में कुछ सीटों पर वाम पार्टियों की हार का मार्जिन बहुत कम था.

पर वह इस बात पर भी ज़ोर देते हैं कि पार्टी का विस्तार जनाधार पर निर्भर करता है और वाम के जनाधार में वह कोई ख़ास बढ़ोतरी नहीं देखते.

जिन सीटों पर कम मार्जिन की बात श्रीकांत कर रहे हैं, उनमें भोरे, बछवाड़ा और आरा शामिल हैं.

पिछली बार के चुनाव में भोरे विधानसभा सीट पर जेडीयू के सुनील कुमार और माले के जीतेंद्र पासवान में जीत का अंतर महज़ 462 वोटों का था.

बछवाड़ा सीट पर सीपीआई उम्मीदवार अवधेश कुमार राय और बीजेपी के विजेता उम्मीदवार के बीच 500 से भी कम वोटों का अंतर था.

वहीं आरा में बीजेपी के अमरेंद्र प्रताप सिंह और माले के कमुद्दीन अंसारी के बीच जीत का अंतर 3,000 वोटों का था.

चार सीटों पर आपसी संघर्ष

महागठबंधन के नेता.

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इमेज कैप्शन, ऐसी चार सीटे हैं जहां कांग्रेस और सीपीआई के उम्मीदवार एक-दूसरे को चुनौती दे रहे हैं.

इस बार भोरे विधानसभा सीट से माले ने जेएनयू छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष धनंजय को मौका दिया है. वहीं आरा से एक बार फिर कयामुद्दीन अंसारी चुनावी मैदान में हैं.

पर बेगूसराय की बछवाड़ा समेत तीन ऐसी सीटे हैं, जो क़ायदे से गईं तो सीपीआई के खाते में थीं लेकिन कांग्रेस ने भी यहां अपने उम्मीदवार उतार दिए हैं. यानी इन चार सीटों पर महागठबंधन के प्रत्याशी ही आपस में संघर्ष करते दिखाई देंगे.

ये सीटे हैं - बिहारशरीफ़, राजापाकड़ और करगहर.

वरिष्ठ पत्रकार सुरूर अहमद का मानना है कि आपसी संघर्ष के कारण इस सीटों पर एनडीए को फ़ायदा होगा. उनके मुताबिक़, ''बछवाड़ा छोड़कर बाकी तीन सीटों से सीपीआई को अपने कदम पीछे खींच लेने चाहिए थे क्योंकि सीपीआई का वह काडर नहीं रहा, जो पहले हुआ करता था.''

शहरी क्षेत्रों में चुनौती

माले के राष्ट्रीय महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य के साथ दीघा से महागठबंधन की प्रत्याशी दिव्या गौतम
इमेज कैप्शन, माले के राष्ट्रीय महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य के साथ दीघा से महागठबंधन की प्रत्याशी दिव्या गौतम

लेफ़्ट उम्मीदवारों ने बिहार की जिन 33 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे हैं, उनमें मुख्य तौर पर चार शहरी इलाक़ों की सीट है. जैसे - दीघा, फुलवारी, राजगीर और बिहारशरीफ़.

राजगीर और बिहारशरीफ़ नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू का गढ़ रहा है. वहीं दीघा में पिछले तीन बार से बीजेपी के विधायक जीतते आ रहे हैं.

माले ने अपनी इकलौती महिला उम्मीदवार दिव्या गौतम को यहां उतारा है पर उनके लिए जीत की राह आसान नहीं है.

दूसरी तरफ़ फुलवारी में भले ही मौजूदा विधायक माले के हैं लेकिन इस बार उनके लिए भी मुक़ाबला कठिन माना जा रहा है क्योंकि सामने जेडीयू के प्रत्याशी श्याम रजक हैं.

श्याम रजक की छवि एक सेक्युलर नेता की है. वो यहां से साल 2010 और 2015 में भी विधायक चुने जा चुके हैं.

फ्रीबीज़ का नुक़सान?

कुछ राजनीतिक विश्लेषक इस बार के चुनाव से पहले एनडीए की फ्रीबीज़ घोषणाओं को भी वाम दलों के लिए चुनौती के रूप में देख रहे हैं.

हालांकि पटना यूनिवर्सिटी में राजनीति विज्ञान के प्रोफ़ेसर डॉ राकेश रंजन का मानना है कि फ्रीबीज़ की राजनीति ने पहले ही वाम राजनीति का बहुत नुक़सान कर दिया है. मुफ़्त राशन, लाल कार्ड, मुफ़्त बिजली, ये वैसी स्कीम हैं जो लोगों की बुनियादी ज़रूरतों को पूरा कर देती हैं.

लेकिन मनीषा प्रियम का मानना है कि वाम दल महिलाओं को भी प्रभावी रूप से संगठित करने में सक्षम हैं. यही वजह है कि इनमें नीतीश कुमार की ग़रीबों ख़ासकर अतिपिछड़ों और महिलाओं के लिए बनाई गई कल्याणकारी योजनाओं को चुनौती देने की क्षमता है.

वाम दलों में केवल माले मज़बूत

बिहार की राजधानी पटना में भाकपा(माले) का कार्यालय.
इमेज कैप्शन, बिहार की राजधानी पटना में भाकपा (माले) का कार्यालय.

हालांकि वो कहती हैं कि सीपीआई और सीपीएम की तुलना में भाकपा (माले) का जनाधार ज़्यादा मज़बूत है.

बिहार के दक्षिण-मध्य हिस्सों यानी मगध, शाहाबाद और गया क्षेत्रों में ये दल प्रभावशाली है. ख़ासकर समाज के निचले तबके यानी अत्यंत हाशिए पर मौजूद जातियों के बीच इनकी अच्छी पकड़ है.

और इस पकड़ के पीछे का कारण समझाते हुए पटना यूनिवर्सिटी में राजनीति विज्ञान के प्रोफ़ेसर डॉ राकेश रंजन कहते हैं कि इन क्षेत्रों में अभी भी सामंतवादी शक्तियां मज़बूत हैं. भूमिपतियों की तादाद ज़्यादा है, मज़दूरों का शोषण अधिक है. इसलिए ग्रामीण अंचल में भाकपा (माले) मज़बूत स्थिति में है.

इसके बावजूद वह मानते हैं कि लेफ़्ट पार्टियों के लिए अकेले अच्छा प्रदर्शन कर पाना मुश्किल है.

उनका कहना है,''कम्युनिस्ट, वर्ग यानी क्लास की बात करते हैं. लेकिन पोस्ट मंडल समाजवादी पार्टियों के उभार ने वर्ग की इनकी राजनीति को गहरी चोट पहुंचाई. समाजवादी नेताओं ने जाति की बात करनी शुरू कर दी और फिर वर्ग की अवधारणा लगभग समाप्त होती चली गई क्योंकि आख़िर में ग़रीब कौन थे, जो दलित थे, जो पिछड़े थे. पिछली बार का प्रदर्शन अच्छा था लेकिन वो इन सीटों को गठबंधन में शामिल होकर ही हासिल कर पाए, वो अकेले होते तो शायद ही इतनी सीटें जीतते. पिछले चुनाव में सारे कम्युनिस्ट पार्टियों के वोट शेयर को देखें तो वो 4.6 प्रतिशत रहा.''

गठबंधन में रहना मजबूरी

माले के राष्ट्रीय महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य
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माले के राष्ट्रीय महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य इस विश्लेषण को ख़ारिज करते हैं. उनका कहना है, ''गठबंधन की राजनीति का हिस्सा बनना केवल लेफ़्ट पार्टियों की ही नहीं, बल्कि सभी पार्टियों की मजबूरी है. अगर आरजेडी हमारे साथ चुनाव न लड़े तो उन्हें भी सीटों का नुकसान होगा. इसलिए सामंतवादी शक्तियों के विरुद्ध साथ आना समय की मजबूरी है.''

दरअसल, वाम दलों ने 1990 के दशक में भी क्षेत्रीय और सीमित गठबंधन किए थे लेकिन 2020 के चुनाव में पहली बार उन्होंने औपचारिक रूप से आरजेडी और कांग्रेस के साथ महागठबंधन के हिस्से के रूप में प्रभावी और सफल तरीके से चुनाव लड़ा.

साल 1962 - 2020 तक लेफ़्ट पार्टियों का प्रदर्शन

साल 1962 के बिहार विधानसभा चुनाव में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी यानी सीपीआई को 12 सीटें आई थीं. साल 1964 में सीपीआई से अलग होकर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) यानी सीपी(एम) का गठन हुआ.

जिसके बाद साल 1967 के चुनाव में सीपीआई को जहां 26, तो सीपी(एम) को 4 सीटें मिली.

दो साल बाद 1969 में एक और टूट हुई और सीपीआई(एमएल) एल बना. लेकिन वह संसदीय राजनीति से दूर रहे. साल 1972 में चुनाव हुए और सीपीआई ने सबसे बेहतरीन प्रदर्शन करते हुए 35 सीटों पर जीत दर्ज की. सीपीएम को एक भी सीट नहीं मिली.

1977 के चुनाव में सीपीआई ने 21 और सीपीएम ने 4 सीटें जीतीं. भीतरी खींचतान और गुटबाज़ी के कारण ये विधानसभा समय से पहले ही भंग कर दी गई और साल 1980 में एक बार फिर चुनाव हुए. सीपीआई को 23 और सीपी (एम) को 6 सीटें आईं.

1985 में सीपीआई ने 12 तो सीपी (एम) ने 1 सीट जीती.

1990 - सीपीआई के खाते में 23 और सीपी (एम) को 6 सीटें मिली.

1995 - सीपीआई - 26, सीपी (एम) - 2, सीपी(एमएल) एल - 6

2000 - सीपीआई - 5, सीपी (एम) - 2, सीपी (एमएल)एल - 6

2005 (अक्तूबर) - सीपीआई - 3, सीपी(एम) - 1, सीपी (एमएल)एल - 5

2010 - सीपीआई - 1

2015 - सीपी(एमएल) एल - 3

2020 - सीपी(एमएल) एल - 12, सीपीआई - 2, सीपी (एम) -2

वाम दलों का स्वर्णिम काल

बिहार में वरिष्ठ पत्रकार श्रीकांत
इमेज कैप्शन, बिहार में वरिष्ठ पत्रकार श्रीकांत

वरिष्ठ पत्रकार और लेखक श्रीकांत साल 1952 से लेकर 1973 तक के काल को वाम दलों का स्वर्णिम काल बताते हैं.

वह बताते हैं कि इन दो दशक में ऐसा वक़्त (1972) भी आया जब सीपीआई नेता कॉमरेड सुनील मुखर्जी को विरोधी दल के नेता के रूप में चुना गया.

कम्युनिस्ट पार्टियों के 35 विधायक विधानसभा पहुंचे थे. उनकी आवाज़ की अहमियत थी. और उस वक़्त सीपीआई का मज़बूत आधार भी था. पटना की सड़कों पर जुलूस निकलता था तो देखने लायक होता था. लाल झंडों से पट जाता था.

पर पोस्ट मंडल जब समाजवादी शक्तियों का उदय हुआ, तब वाम पार्टियां हाशिए की ओर जाने लगीं.

लेकिन इसके बावजूद समाज में हमेशा संघर्ष का स्पेस रहता है. वह कहते हैं, ''आप देखिएगा कि जब बोलने की आज़ादी नहीं रहेगी, तो लोग बोलने की मांग करेंगे. नागरिक स्वतंत्रता नहीं मिलेगी तो उसकी मांग करेंगे. छोटे ही सेक्शन में पर समाज में हमेशा ऐसा चलता रहता है और कम्युनिस्ट पार्टियों के साथ कमोबेश वही है.''

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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