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'मैंने अमिताभ बच्चन से भी काम नहीं मांगा', अंजन श्रीवास्तव ने ऐसा क्यों कहा?
"कमल में रहो, बूंद की तरह और अलग भी रहो." ये शब्द थिएटर, टेलीविज़न और फ़िल्मी दुनिया की अहम शख़्सियत अंजन श्रीवास्तव के हैं. उन्होंने अपनी विधा की एक अलग ही छाप छोड़ी है.
अंजन श्रीवास्तव का परिवार यूं तो उत्तर प्रदेश के ज़िला गाज़ीपुर में स्थित गहमर गांव से संबंध रखता है लेकिन उनका जन्म 2 जून 1948 को कोलकाता में हुआ.
वहीं वह पले बढ़े और इलाहाबाद बैंक में नौकरी करने लगे. इस दौरान वह स्टेज आर्टिस्ट के रूप में भी कार्य करते रहे.
घर के बड़े बेटे अंजन श्रीवास्तव का रुझान शुरू से ही थियेटर की तरफ था और फिर यही अभिनय का प्यार उन्हें मुंबई खींच लाया. अंजन के एक छोटे भाई रंजन हैं जो कोलकाता में ही डॉक्टर हैं.
उन्होंने ऋषिकेश मुखर्जी की कॉमेडी क्लासिक 'गोलमाल' (1979), जेपी दत्ता की 'गुलामी' (1985), मीरा नायर की 'सलाम बॉम्बे' (1988), राजकुमार संतोषी की 'पुकार' (2000) और मेघना गुलज़ार की 'सैम बहादुर' (2023) सहित 180 फ़िल्मों में कैरेक्टर एक्टर की भूमिकाएं निभाई हैं.
अंजन टेलीविजन में 'ये जो है ज़िंदगी' सीरियल में दिखे. फिर गोविंद निहलानी की 'तमस', 'नुक्कड़' और 'कथा सागर' जैसे उल्लेखनीय टीवी धारावाहिकों में अभिनय किया.
अंततः 1987 में उन्हें आरके लक्ष्मण की आम आदमी पर आधारित हास्य धारावाहिक 'वागले की दुनिया' में मुख्य भूमिका मिली, जिसने उन्हें सुर्ख़ियों में ला दिया.
उन्होंने श्याम बेनेगल की महाकाव्य श्रृंखला, 'डिस्कवरी ऑफ इंडिया' में भी अभिनय किया और कई भूमिकाएं निभाईं.
अंजन श्रीवास्तव ने बीबीसी हिंदी की ख़ास पेशकश 'कहानी ज़िंदगी की' में अपनी ज़िंदगी के पहलुओं पर हमारे सहयोगी इरफ़ान से बात की.
कैसे बदल गया नाम?
अंजन श्रीवास्तव को घर में सभी प्यार से "बुला" बुलाते थे. उनके पिता इलाहाबाद बैंकर थे और उनकी मां गृहिणी थीं.
अंजन कहते हैं,"मां-बाप ने तो नाम अंजन रखा लेकिन बंबई आते-आते इसकी स्पेलिंग बदल गई."
उन्होंने बताया, "बैंक में एक न्यूमेरोलॉजिस्ट मेरे पीछे पड़ गए. मेरी तबीयत उन दिनों खराब चल रही थी और काम भी ढीला था.''
वह बताते हैं, "फिर मैंने एक साल बाद नाम बदला. इसके बाद मुझे ये समझ में नहीं आया कि क्या हुआ लेकिन मुझे अलग-अलग चीजें मिलने लगीं. ये चेंज किस वज़ह से आया था, मैं नहीं कह सकता."
अंजन श्रीवास्तव ने कलकत्ता विश्वविद्यालय से बीकॉम और एलएलबी किया और यहीं पर उन्होंने 1968 में हिंदी और बंगाली थिएटर समूहों में भाग लेना शुरू किया और ऑल इंडिया रेडियो के लिए नाटक किए. इसके साथ ही उनके अभिनय का सफ़र शुरू हो गया.
'किरदार में ऐसा डूबा कि कॉस्ट्यूम वाले की नौकरी चली गई'
अंजन श्रीवास्तव ने यूं तो थियेटर से फ़िल्मों तक बहुत काम किया लेकिन उनको असली पहचान 'वागले की दुनिया' से मिली.
इस सीरियल में वह एक साधारण, मध्यमवर्गीय क्लर्क श्रीनिवास वागले के किरदार में थे, जो रोज़मर्रा की ज़िंदगी की चुनौतियों से जूझता है, फिर भी अपने परिवार के लिए हमेशा मुस्कुराता रहता है.
यह किरदार इतना जीवंत था कि लोग अंजन को असल ज़िंदगी में 'वागले जी' कहकर बुलाने लगे.
आर.के. लक्ष्मण के कार्टून 'कॉमन मैन' की भावना को उन्होंने अपने अभिनय से जीवंत कर दिया.
अंजन श्रीवास्तव बताते हैं, "आर.के. लक्ष्मण का पूरे किरदार पर कंट्रोल था. न ज़्यादा हंसना था और न ज़्यादा दुखी होना था. एकदम आम आदमी की तरह सबकुछ करना था. उस समय यह नहीं पता था कि यह किरदार इतना बड़ा हिट होगा."
हालांकि, यह उनके अभिनय सफ़र के लिए एक ऐतिहासिक मोड़ साबित हुआ.
अंजन श्रीवास्तव बताते हैं, "वागले में मैं बेहोश हो चुका था. उस किरदार में ऐसा डूबा कि काम के घंटों का पता ही नहीं चलता था."
उन्होंने आगे कहा, "गंजी और लुंगी में शॉट चल रहा है. बारिश होती तो मैं पूरी तरह से भीग जाता था लेकिन उन्हें पता तब चलता था जब कैमरामैन उन्हें कहता था."
"ऐसे में मैंने कॉस्ट्यूम वाले को कहा कि हमें पता नहीं चलता है तो तुम ही कपड़े बदल दिया करो."
वो याद करते हैं, "ये कहकर मैं फिर से काम करने लगता. एक बार जब बारिश में भीगने के बाद वो कपड़े बदलने आया तो मैंने उसे झटक दिया और कहा-क्यों डिस्टर्ब कर रहे हो प्लीज़ जाओ."
वह बताते हैं, "इसके बाद जब पैकअप हुआ तो पता चला कि मुझे उसकी नौकरी चली गई. मुझे डिस्टर्ब करने के आरोप में उसे हटा दिया गया था. जबकि मुझे उस दौरान पता ही नहीं चला था कि आखिर क्या हुआ था? मुझे जब तक इसका पता चला तब तक वो जा चुका था.''
अंजन श्रीवास्तव कहते हैं कि काम में इतना डूबना भी ठीक नहीं है. आजकल जो युवा आ रहे हैं. वह इस मामले में बहुत बेहतर हैं और वह काफ़ी अच्छे किरदार भी निभा रहे हैं.
'मैंने अमिताभ बच्चन से भी काम नहीं मांगा'
अंजन श्रीवास्तव कहते हैं, "अमिताभ बच्चन जी के बारे में मैं ज़्यादा बोलना नहीं चाहूंगा. वास्तव में उन्होंने मेरी बहुत मदद की. मैं उनका ऋणी हूं."
वह कहते हैं, "जब आप स्ट्रगल कर रहे हों, ऐसे में कोई ऐसी मदद कर दे कि नौकरी आपकी कभी नहीं जाएगी. तो कितनी बड़ी बात होती है."
उन्होंने बताया, "बैंक क्या चाहते हैं? कस्टमर चाहते हैं. वह हमारे कस्टमर हो गए. फिर हमने होम टू होम सर्विस देना शुरू किया. इससे वह हमारे बैंक के साथ ज़्यादा जुड़ते चले गए. बैंक को बहुत फ़ायदा हुआ."
"एक इंटरव्यू उनका हमारे चेयरमैन के साथ भी हुआ था. उस इंटरव्यू में बच्चन साहब ने कहा, व्हेर इज अंजन, वो तो अभी तक आए नहीं."
उन्होंने आगे बताया, "सब आकर जब मुझे बोले और मैं गया और तब उन्होंने चेयरमैन को एक चीज़ कही, 'मैं भी नौकरी करता था और नौकरी करके ये लाइन चलाना बड़ा मुश्किल होता है'. तो मैं समझ गया कि उनका इंटेशन क्या है."
अंजन श्रीवास्तव याद करते हैं, "मैं उनका आभारी हूं, ये अलग बात है कि एक ऐसा टाइम आया जब बोफोर्स कांड हुआ. मैं और उत्पल दा ये मानते हैं कि वो बलि का बकरा थे. उस समय लोग सांत्वना देते. लेकिन इलाहाबाद के लोग गालियां देते थे. कलकत्ते में उनके पोस्टर फाड़ रहे थे. उनके भी ख़राब दिन आए थे."
वह बताते हैं, "उस समय भी मैं जाता था जानने के लिए कैसे हैं आप? एक ऐसा भी टाइम था कि उनकी मैडम कहती थी कि अपने बच्चों को लेकर होली के दिन आइए और हम गए भी थे."
वह कहते हैं, "कौन बनेगा करोड़पति से पहले उन्होंने सैद्धांतिक और वैचारिक स्तर पर बहुत सारी चीजें बदल डालीं. इसके बाद हम लोगों का आना -जाना भी कम हो गया."
उन्होंने बताया कि बहुत दिनों बाद एक फ़िल्म 'तीन पत्ती' में उनके साथ काम किया लेकिन मैंने ये रिक्वेस्ट नहीं किया कि मुझे आपकी फ़िल्मों में काम करना है. मुझे काम दिलवाइए. मैंने किसी से भी रिक्वेस्ट नहीं किया.
वह कहते हैं, "आजकल कुछ युवा पैर छूते हैं, मैं साफ़ कहता हूं कि पैर छूने से कुछ नहीं होगा."
फिर कहते हैं कि कुछ बता दीजिए, "तो मैं कहता हूं कि मैं करके दिखा सकता हूं, बता नहीं सकता." लेकिन मेहनत और ईमानदारी से सबकुछ हासिल किया जा सकता है.''
'मुझे देखकर खड़े हो गए सलमान'
अंजन श्रीवास्तव ने विनोद मेहरा, विनोद खन्ना, अमिताभ बच्चन, अजय देवगन से लेकर विक्की कौशल तक के साथ काम किया है.
अंजन श्रीवास्तव कहते हैं, "बहुत से निर्देशकों ने मुझसे अच्छा काम कराया और उसे देखकर काफ़ी लोग प्रभावित हुए लेकिन मैं मार्केटिंग नहीं कर पाया था. जो कि यहां बहुत जरूरी है."
वह कहते हैं,"मुझे जो मिला है, मैं उससे खुश हूं. 180 फ़िल्म मज़ाक नहीं है. हम करते चले गए और पीछे मुड़कर नहीं देखा."
वह कहते हैं कि मैं बहुत बड़ा आदमी नहीं हूं लेकिन मुझे सम्मान मिलता है.
वह एक वाक़ये का जिक्र करते हैं, "मैं कहीं से आ रहा था और मुझे देख कर सलमान खड़े हो गए, सलमान खड़े हो गए तो सुभाष जी को भी खड़ा होना पड़ा और फिर नाडियाडवाला भी खड़े हो गए."
वह कहते हैं, "सबसे अच्छी बात यह है कि मुझे हर विधा के लिए याद किया गया. अभिनय मेरे लिए सिर्फ़ पेशा नहीं, बल्कि ज़िंदगी को समझने का तरीका है."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित
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