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नेपाली कांग्रेस और ओली ने मिलाया हाथ, ख़तरे में प्रचंड की कुर्सी
नेपाल का लोकतंत्र अभी 16 साल का हुआ है और 10 सरकारें बदल चुकी हैं.
नेपाल में 2008 में 239 साल पुरानी राजशाही व्यवस्था ख़त्म कर लोकतंत्र आया था.
नेपाली कांग्रेस और पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली की पार्टी कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (एकीकृत मार्क्सवादी-लेनिनवादी) यानी सीपीएनयूएमएल के हाथ मिलाने के बाद एक बार फिर नेपाल में सरकार बदलती दिख रही है.
नए राजनीतिक समीकरण बनने के बाद से नेपाल के मौजूदा प्रधानमंत्री पुष्प कमल दाहाल प्रचंड की कुर्सी ख़तरे में पड़ गई है.
प्रचंड इस नए राजनीतिक समीकरण से पूरी तरह बाहर हो गए हैं. हालांकि प्रचंड ने पीएम पद से इस्तीफ़ा देने से साफ़ इनकार कर दिया है.
ऐसा तब है, जब उनके पास बहुमत नहीं है. ऐसे में एक बार फिर से नेपाल में राजनीति टकराव बढ़ सकता है.
नया राजनीतिक समीकरण क्यों बना?
नेपाली कांग्रेस और ओली के बीच समझौते को लेकर नेपाल के मीडिया में चर्चा गर्म है.
प्रचंड ने इस्तीफ़े से इनकार कर वहां की राजनीतिक स्थिति को और जटिल कर दिया है. ऐसे में नई सरकार बनने में देरी हो सकती है.
मंगलवार को केपी शर्मा ओली की पार्टी की बैठक हुई थी और इस बैठक के बाद छोटे दलों से नए राजनीतिक समीकरण में शामिल होने की अपील की थी.
सीपीएनयूएमएल के उप महासचिव और नेपाल के पूर्व विदेश मंत्री प्रदीप ज्ञवाली ने पार्टी की बैठक के बाद कहा कि कांग्रेस और उनकी पार्टी के बीच समझौते पर मुहर लग गई है.
अभी ओली की पार्टी प्रचंड सरकार में शामिल है.
नेपाल के अंग्रेज़ी अख़बार काठमांडू पोस्ट के अनुसार, प्रदीप ज्ञवाली ने बैठक के बाद कहा, ''अभी हमने प्रचंड सरकार से अपने मंत्रियों को इस्तीफ़ा देने के लिए नहीं कहा है. हम नहीं चाहते हैं कि प्रचंड की पार्टी माओवादी सेंटर से दुश्मनी बढ़े. लेकिन प्रधानमंत्री अगर नई सरकार बनाने में बाधा बनेंगे तो हम अपने मंत्रियों से इस्तीफ़ा ले लेंगे. प्रधानमंत्री हमारे अनुरोध का अनदेखा करेंगे तो समर्थन वापस लेना तय है.''
अभी प्रचंड सरकार में ओली के पार्टी से आठ मंत्री हैं. प्रदीप ज्ञवाली ने कहा कि कांग्रेस से समझौते के कारण हैं.
उन्होंने कारण बताते हुए कहा, ''प्रधानमंत्री नेपाली कांग्रेस से एक महीने से राष्ट्रीय एकजुटता की सरकार बनाने के लिए बात कर रहे थे. इसी वजह से अविश्वास का माहौल बना. ऐसे में हम नेपाल कांग्रेस से गठबंधन करने पर मजबूर हुए. जब नेपाली कांग्रेस ने प्रचंड के प्रस्ताव को ख़ारिज कर दिया, तब हमने बातचीत शुरू की थी.''
राजनीतिक मिलन पर हैरानी
नेपाली कांग्रेस और सीपीएनयूएमएल के बीच हुई इस साझेदारी पर राजनीतिक गलियारों में लोगों की राय बँटी हुई है.
इसकी वजह है कि ये दोनों राजनीतिक दल एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी हुआ करते थे. मगर अब दोनों एक साथ आ गए हैं.
नेपाल की संसद में नेपाली कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी है और सीपीएनयूएमएल दूसरे नंबर की पार्टी है.
नेपाली कांग्रेस के प्रवक्ता डॉ प्रकाश शरण महत ने कहा कि शुरुआती दौर में सीपीएनयूएमएल के अध्यक्ष केपी शर्मा ओली सरकार का नेतृत्व करेंगे.
महत ने जानकारी दी है कि दूसरे चरण में चुनाव से पहले की सरकार शेर बहादुर देऊबा के नेतृत्व में बनाई जाएगी.
उन्होंने कहा, ''दो बड़े राजनीतिक दलों ने एक साथ सरकार बनाने का फ़ैसला किया है तो प्रधानमंत्री को कुर्सी से हट जाना चाहिए. यही सही रहेगा. कई दूसरे राजनीतिक दल भी इस नए गठबंधन के प्रति अपना समर्थन जता चुके हैं. हमने भी प्रचंड से इस्तीफ़ा देने के लिए कहा है.''
नए गठंबधन के बारे में क्या पता है?
नेपाली कांग्रेस के उपाध्यक्ष धनराज गुरुंग ने कहा है कि दोनों दलों के बीच हुई बैठक में समझौते को मंज़ूरी मिल गई है.
धनराज ने कहा, ''हम इस समझौते का स्वागत करते हैं और इसे पूरा करने के लिए अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त करते हैं. विकास, संवैधानिक संशोधन, भ्रष्टाचार पर नियंत्रण... ये कुछ ऐसे मुद्दे हैं, जिनके बारे में हमने थोड़ा समझाया भी है.''
उन्होंने कहा, ''संविधान संशोधन के लिए दो तिहाई बहुमत ज़रूरी होता है. ऐसे में दूसरे राजनीतिक दलों के साथ भी इस पर चर्चा की जाएगी.
जिस समझौते के तहत ये दोनों राजनीतिक दल साथ आए हैं, उसके बारे में जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई है. गुरुंग ने कहा है कि इस समझौते के बारे में चार जुलाई तक बताया जाएगा ताकि इस समझौते का आधार सबको पता चल सके.
अभी इन दोनों दलों के बीच हुए समझौते में मंत्रालयों का बँटवारे भी शामिल हैं.
प्रचंड की पार्टी क्या बोली
प्रचंड की पार्टी माओइस्ट सेंटर का कहना है कि प्रधानमंत्री इस्तीफ़ा नहीं देंगे लेकिन वो संसद में विश्वासमत का सामना करेंगे.
जब इस बारे में सीपीएनयूएमएल के नेता प्रदीप ज्ञवाली से पूछा गया तो उन्होंने कहा, ''जब दो मुख्य राजनीतिक दलों के बीच बात हो गई है तो प्रधानमंत्री को चाहिए वो रास्ते से हट जाएं. अगर वो ऐसा नहीं करेंगे तो फिर हम तय करेंगे कि आगे क्या करना है.''
ऐसी रिपोर्ट्स हैं कि अगर प्रधानमंत्री ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी तो सीपीएनयूएमएल अपने मंत्रियों को वापस बुला सकती है.
उपेंद्र यादव की जनता समाजवादी पार्टी (जसपा) और महंत ठाकुर की डेमोक्रेटिक समाजवादी पार्टी (लोसपा) ने इस नए गठबंधन के प्रति सकारात्मक रवैया दिखाया है.
नेपाली संसद में जसपा के पास सात और लोसपा के पास चार सीटें हैं.
नेपाली संसद की पांचवीं सबसे बड़ी पार्टी राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी है. इस दल ने भी नए गठबंधन का समर्थन किया है. इस दल के चार सांसद हैं.
ऐसी रिपोर्ट्स हैं कि कांग्रेस और सीपीएनयूएमएल राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी को भी अपने साथ ला सकते हैं.
किसके पास कितने सांसद
नेपाल की 275 सदस्यों वाली प्रतिनिधि सभा में प्रचंड की कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (माओवादी सेंटर) के महज़ 32 सदस्य हैं.
प्रचंड को केपी शर्मा ओली की पार्टी कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (एकीकृत मार्क्सवादी-लेनिनवादी) का समर्थन मिला है. ओली की पार्टी के पास 78 सीटें हैं.
प्रचंड ने 2022 के नवंबर महीने में हुए आम चुनाव नेपाली कांग्रेस के साथ मिलकर लड़ा था. नेपाली कांग्रेस चुनाव में 89 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी.
ऐसा माना जा रहा था कि नेपाली कांग्रेस के नेता शेर बहादुर देउबा ही प्रधानमंत्री रहेंगे लेकिन प्रचंड ने ऐन मौक़े पर पाला बदल लिया. प्रचंड चाहते थे कि नेपाली कांग्रेस उन्हें प्रधानमंत्री बनाए लेकिन उनकी मांग नहीं मानी गई थी. जून 2021 में प्रचंड के समर्थन से ही देउबा प्रधानमंत्री बने थे.
नवंबर 2017 के आम चुनाव में प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली की पार्टी सीपीएन-यूएमएल यानी कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल-यूनाइटेड मार्क्सवादी लेनिनवादी और प्रचंड की पार्टी कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) मिलकर चुनाव लड़ी थी.
फ़रवरी 2018 में ओली पीएम बने और सत्ता में आने के कुछ महीने बाद प्रचंड और ओली की पार्टी ने आपस में विलय कर लिया था. विलय के बाद नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी बनी. संसद में इनका दो तिहाई बहुमत था. लेकिन ओली और प्रचंड के बीच की यह एकता लंबे समय तक नहीं रही थी.
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