एसआईआर: यूपी में मतदाता सूची से नाम कटवाने वाले फ़ॉर्म 7 पर क्या है विवाद

उत्तर प्रदेश में एसआईआर की प्रक्रिया आखिरी चरण में है

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    • Author, सैय्यद मोज़िज़ इमाम
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
  • पढ़ने का समय: 9 मिनट

देश के 9 राज्यों और 3 केंद्र शासित प्रदेशों में एसआईआर की प्रक्रिया चल रही है. इस प्रक्रिया में 51 करोड़ मतदाता शामिल हैं.

उत्तर प्रदेश में एसआईआर की प्रक्रिया आखिरी चरण में है. अंतिम मतदाता सूची 10 अप्रैल को प्रकाशित की जाएगी.

रिप्रेज़ेंटेशन ऑफ़ द पीपल्स एक्ट (आरपीए), 1950 और रजिस्ट्रेशन ऑफ़ इलेक्टर्स रूल्स, के तहत मतदाता सूची में नाम शामिल करवाने के लिए फ़ॉर्म 6, वोट कटवाने के लिए फ़ॉर्म 7 और नाम-पता सही कराने के लिए फ़ॉर्म 8 का प्रयोग किया जा रहा है.

सबसे ज़्यादा चर्चा फ़ॉर्म 7 की है. लेकिन यह फ़ॉर्म 7 है क्या और इसकी इतनी चर्चा क्यों हो रही है.

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चुनाव आयोग के मुताबिक फ़ॉर्म 7, "मृत्यु, स्थान परिवर्तन के कारण मतदाता सूची में अपना या किसी अन्य व्यक्ति का नाम हटाने का आवेदन फ़ॉर्म है."

चुनाव आयोग के मुताबिक, गलत जानकारी देने पर एक साल तक की जेल और जुर्माने का प्रावधान है.

हालांकि उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने लखनऊ में कहा, "फ़ॉर्म 7 के ज़रिए योजनाबद्ध तरीके से पीडीए और मुसलमानों के वोट कटवाए जा रहे हैं."

बीजेपी ने इस आरोप को निराधार बताया है.

फ़ॉर्म 7 के बारे में शिकायतें

ज़ैनुल आब्दीन ख़ान

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इमेज कैप्शन, बदायूं के ककराला नगर पालिका के वॉर्ड मेंबर ज़ैनुल आब्दीन ख़ान का नाम हटाने के लिए भी फ़ॉर्म 7 जमा करवाया गया है
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फ़ॉर्म 7 भरने के लिए आवेदक को संबंधित विधानसभा का मतदाता होना ज़रूरी है. दूसरे विधानसभा का मतदाता किसी और विधानसभा में फ़ॉर्म 7 के ज़रिए मतदाता सूची पर आपत्ति नहीं कर सकता.

नाम हटाने के लिए आवेदक को पहले खुद का विवरण भरना होता है. इसके बाद जिस मतदाता का नाम कटवाना है उसका विवरण देना होता है. मतदाता का नाम काटे जाने की का स्पष्ट कारण भी सही खाने में टिक करना ज़रूरी होता है.

भरे हुए फ़ॉर्म को संबंधित बूथ के बीएलओ को देना होता है, जो इसकी जांच करने के बाद आगे की कार्रवाई करता है.

उत्तर प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी नवदीप रिणवा ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा, "जिन लोगों के नाम कटवाने के लिए फ़ॉर्म 7 मिला है, उन्हें नोटिस दिए बिना और सुनवाई के बगैर नाम नहीं काटे जाएंगे."

लेकिन बदायूं के समाजवादी पार्टी के सांसद आदित्य यादव ने ज़िलाधिकारी को एक सूची सौंपकर आरोप लगाया है कि सूची में दिए गए लोग, एक योजना के तहत वोट कटवाने के लिए आवेदन कर रहे हैं.

ज़िलाधिकारी को दी गई शिकायत में कहा गया है कि बदायूं ज़िले में फ़ॉर्म में शेखुपूरा गांव की नाज़िमा का नाम काटने का आवेदन है. यह आवेदन भगवान सिंह ने दिया है. इसमें कहा गया है कि मतदाता इस स्थान पर नहीं रहती हैं. लेकिन नाम काटने के लिए ये फ़ॉर्म आवेदक भगवान सिंह ने दिया है.

इसी तरह बदायूं ज़िले के ककराला नगर पालिका के वॉर्ड नंबर 5 मेंबर ज़ैनुल आब्दीन ख़ान का नाम हटाने का फ़ॉर्म 7 भी भगवान सिंह के नाम से दाखिल किया गया है.

ख़ान ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा, "मैं वॉर्ड का निर्वाचित सदस्य हूं, 2017 से लगातार नगर पंचायत का सदस्य हूं, इसके अलावा ज़िला कार्य योजना समिति का भी सदस्य हूं. मैं 2012 से मतदाता हूं, मेरा नाम को कटवाने के लिए फ़ॉर्म 7 आया है."

बीबीसी हिन्दी ने भगवान सिंह के नंबर पर कई बार कॉल किया लेकिन किसी ने फ़ोन उठाया नहीं.

बदायूं के दातागंज विधानसभा में नासिरूद्दीन का वोट काटने का आवेदन है विजय कुमार सिंह की ओर से दिया गया है.

उन्होंने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से फ़ोन पर बात की और कहा, "मैं बीजेपी का विधानसभा संयोजक हूं. मुझे पार्टी की तरफ़ से कुछ फ़ॉर्म मिले थे, हमने इसे साइन कर दिया, लेकिन मैं निजी तौर पर नासिरूद्दीन को नहीं जानता."

86 फ़ॉर्म 7, सभी में मुसलमानों के नाम

इस तरह के मामलों की शिकायत लेकर ज़िला सिद्धार्थनगर में कई लोग थाना मिश्रौलिया पर पहुंचे थे.

एक शिकायतकर्ता आगा मैनुद्दीन ने कहा, "हमारे गांव में साजिश के तहत तकरीबन 86 लोगों के नाम काटे जा रहे हैं , ये सभी लोग गांव में रह रहे हैं. इनमें से एक-आध लोग बाहर कमाने के लिए गए हैं. हम लोग इसकी शिकायत थाने में दर्ज कराने के लिए आए हैं."

सिद्धार्थ नगर में भैंसाईं के बीएलओ पुजारी प्रसाद ने स्थानीय मीडिया को बताया कि उनको 86 फ़ॉर्म किसी धर्मेंद्र मौर्य ने दिए थे.

पुजारी प्रसाद ने स्थानीय मीडिया से कहा, "सभी 86 फ़ॉर्मों में जिनके नाम काटने के लिए आवेदन किया गया है वे सभी मुसलमान हैं. सभी मौजूद भी हैं. इसलिए जैसा जो भी है, मैं अपनी रिपोर्ट लगा दूंगा."

हालांकि बीएलओ यह नहीं बता पाए कि धर्मेद्र मौर्य कौन हैं.

समाजवादी पार्टी के नेताओं ने इस सिलसिले में शिकायत भी दर्ज कराई है.

गोंडा के पूर्व मंत्री योगेश प्रताप सिंह ने कहा, "मेरी विधानसभा 298 कर्नलगंज में 6 हज़ार से ज़्यादा वोट काटने की प्रक्रिया चल रही है. जब पूछा जाता है तो लोग कहते हैं कि यह सूची ऊपर से आई है."

योगेश प्रताप सिंह ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी को प्रिंटेड फ़ॉर्म दिखाए. इनमें से एक में "ज़िले का नाम, पोलिंग स्टेशन और विधानसभा का विवरण दर्ज था. मतदाता विश्नुपुर कलां की सबीना का नाम है. लेकिन इस फ़ॉर्म में नाम काटने वाले आवेदक का नाम दर्ज नहीं था."

योगेश प्रताप सिंह का आरोप है, "इस तरह के फ़ॉर्म दिए जा रहे हैं जिसमें सिर्फ आवेदक का नाम भरकर बीएलओ के पास जमा किया जा सकता है."

इसके अलावा जिस कॉलम पर आपत्ति का कारण दर्ज करना होता है, सभी फ़ॉर्मों में उनमें 'पहले से नामांकित' पर टिक किया गया है. इसका अर्थ यह हुआ कि जिसका नाम कटवाने के लिए आवेदन किया जा रहा है उसका नाम मतदाता सूची में कहीं और दर्ज है.

समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने लखनऊ में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, "पहले से तय है कि किसका वोट कटना है. पीडीए और मुस्लिम मतदाताओं को निशाना बनाया जा रहा है. जान-बूझकर मुस्लिम मतदाताओं के प्रिंटेड फ़ॉर्म 7 जमा कर उनके वोट काटने का षड्यंत्र किया जा रहा है. यह धांधली पूरे प्रदेश में चल रही है."

अखिलेश यादव कहा, "अब तक जमा किए गए फ़ॉर्म 7 को निरस्त किया जाए. जो फ़ॉर्म जमा कर रहा है, उसकी जांच की जाए. कन्नौज में एक पोलिंग स्टेशन पर 1200 वोट काट दिए गए हैं."

'शिकायतकर्ता का हस्ताक्षर करने से इनकार'


संत कबीर नगर में फॉर्म 7 से जुड़ा विवाद सामने आया है

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समाजवादी पार्टी के आरोपों के जवाब में आयोग ने कहा है कि शिकायत मिलने पर जांच की जाएगी.

हालांकि, भारतीय जनता पार्टी इन आरोपों को निराधार बता रही है.

बीजेपी के प्रदेश प्रवक्ता मनीष शुक्ला ने कहा, "मतदाता सूची से नाम हटाने का अधिकार संविधान ने दिया है. इसकी एक लंबी प्रक्रिया होती है. सिर्फ़ शिकायत करने से नाम नहीं कटता है. अखिलेश यादव को भी चाहिए कि इस प्रक्रिया में शामिल होकर जो नाम अनुचित हैं उन्हें कटवाएं और जो उचित हैं उन्हें जुड़वाएं, लेकिन उनका मकसद भ्रम फैलाने का है."

उन्होंने कहा, "अखिलेश यादव उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य के मुख्यमंत्री रह चुके हैं. उन्हें पूरी प्रक्रिया पता है. वह सिर्फ़ राजनीति करना चाहते हैं."

संत कबीर नगर का एक वीडियो वायरल है. हालांकि बीबीसी हिन्दी स्वतंत्र रूप से इस वीडियो की पुष्टि नहीं कर पाया है.

इसमें कांग्रेस की तरफ़ से आरोप लगाया जा रहा है कि गांव के कुछ लोगों के नाम काटने के लिए फ़ॉर्म 7 जमा किया गया है., लेकिन जिस व्यक्ति की तरफ़ से आवेदन है, उसने हस्ताक्षर करने इनकार किया है.

कांग्रेस के प्रदेश प्रवक्ता मनीष हिंदवी ने इस घटना पर कहा, "जब ये फ़ॉर्म 7 जमा कराए जा रहे थे. तब हमारे लोगों ने पकड़े थे. इसमें जिस व्यक्ति के हस्ताक्षर थे, वह इनकार कर रहा है कि ये हस्ताक्षर उसके हैं."

हिंदवी ने कहा, "यह पूरी प्रक्रिया ग़ैर संवैधानिक है, वोट चोरी करने के लिए यह नए तरह से काम किया जा रहा है."

एसआईआर की प्रक्रिया पर सिर्फ़ सपा ही नहीं बल्कि बीजेपी के नेता ने भी संशय प्रकट किया है.

वाराणसी से यूपी सरकार में मंत्री रवींद्र जायसवाल ने आरोप लगाया है कि वाराणसी दक्षिण में 9200 फर्ज़ी मतदाता दर्ज हैं, "इन मतदाताओं की फिर से जांच होनी चाहिए."

वाराणसी के ज़िलाधिकारी ने मीडिया से कहा, "इस मामले में बीजेपी की तरफ से शिकायत मिली है.अलग-अलग बूथों की शिकायत है. जांच के बाद उचित कार्रवाई की जाएगी."

चुनाव आयोग ने क्या कहा?

चुनाव आयोग के मुताबिक, गलत जानकारी देने पर एक साल तक की जेल और जुर्माने का प्रावधान है

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संत कबीर नगर के मामले पर राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी, नवदीप रिणवा ने कहा, "इस पर उस व्यक्ति को एफ़आईआर दर्ज करानी चाहिए जिनका हस्ताक्षर फर्ज़ी है."

6 फ़रवरी को लखनऊ में प्रेंस कॉन्फ्रेंस में रिणवा ने कहा, "कोई भी राजनीतिक दल का कार्यकर्ता एक दिन में 10 फ़ॉर्म से ज़्यादा नहीं जमा कर सकता है. जो फ़ॉर्म 7 जमा किए गए हैं, उनकी जांच होगी. अभी कोई नाम नहीं काटे जा रहे हैं. जितने नंबर बताए जा रहे हैं, उतने फ़ॉर्म भी नहीं हैं."

"फ़ॉर्म 7 दाखिल करने का अधिकार केवल उसी व्यक्ति को है, जिसका नाम उसी विधानसभा क्षेत्र की मतदाता सूची में पहले से दर्ज है."

मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने बताया कि फ़ॉर्म 7 भरने वाले व्यक्ति को सबसे पहले अपना नाम और अपना मतदाता पहचान पत्र (वोटर आईडी) नंबर दर्ज करना होता है. इसके बाद उसे उस व्यक्ति का नाम लिखना होता है, जिसके विरुद्ध आपत्ति दर्ज की जा रही है, और आपत्ति का स्पष्ट कारण भी बताना होता है.

उन्होंने कहा, "जैसे कि संबंधित व्यक्ति की मृत्यु हो चुकी हो, वह भारत का नागरिक न हो, या उसका नाम किसी अन्य स्थान पर पहले से पंजीकृत हो. फ़ॉर्म 7 दाखिल करने के लिए कारण बताना अनिवार्य है."

मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने कहा, "सभी ज़िला निर्वाचन अधिकारियों और निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं कि जब भी कोई फ़ॉर्म 7 प्राप्त हो, तो यह सुनिश्चित किया जाए कि वह उसी व्यक्ति द्वारा प्रस्तुत किया गया हो, जिसके हस्ताक्षर उस पर मौजूद हैं."

हालांकि अखिलेश यादव का दावा है, "फ़ॉर्म 7 पर ऐसे व्यक्तियों के हस्ताक्षर हैं, जो पढ़े-लिखे नहीं हैं."

आंकड़े क्या कहते हैं?

चुनाव आयोग के मुताबिक 5 फ़रवरी तक नाम कटवाने के लिए 82,684 फ़ॉर्म 7 जमा किए गए हैं

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चुनाव आयोग के मुताबिक 5 फ़रवरी तक मतदाता सूची में नाम जुड़वाने के लिए 37,81,487 फ़ॉर्म जमा किए गए हैं. वहीं नाम कटवाने के लिए 82,684 फ़ॉर्म 7 जमा किए गए हैं.

आयोग ने ज़िलावार विवरण नहीं दिया है.

4 फ़रवरी को जारी आंकड़ों के अनुसार राजनीतिक दलों द्वारा नियुक्त बीएलए के ज़रिए नाम जुड़वाने के लिए 37,412 फ़ॉर्म 6 और नाम कटवाने के लिए 264 फ़ॉर्म 7 दिए गए हैं.

आयोग के मुताबिक नाम जुड़वाने के लिए बीजेपी के बूथ सहायकों ने 23,905 और नाम कटवाने के लिए 203 फ़ॉर्म जमा किए हैं.

समाजवादी पार्टी की तरफ़ से नाम जुड़वाने के लिए 10,262 फ़ॉर्म और नाम कटवाने के लिए 47 फ़ॉर्म दिए गए हैं.

मुख्य निर्वाचन अधिकारी नवदीप रिणवा ने 3 फरवरी को लखनऊ में जारी प्रेस नोट में बताया कि पिछले एसआईआर 2003 से मैपिंग न होने के कारण 1.04 करोड़ मतदाताओं को नोटिस जारी किए जा रहे हैं.

इसके अलावा आयोग ने तार्किक विसंगतियों वाले 2.22 करोड़ मतदाताओं को भी नोटिस जारी किए हैं. इन मतदाताओं को अपने रिश्तेदारों- माता-पिता, दादा-दादी से संबंधित दस्तावेज़ प्रस्तुत करने होंगे.

रिणवा ने कहा, "अब तक 1.69 करोड़ से अधिक नोटिस जारी किए जा चुके हैं, जिनमें से 79 लाख से अधिक नोटिस बूथ लेवल अधिकारियों द्वारा मतदाताओं को उपलब्ध कराए जा चुके हैं."

उन्होंने बताया कि मतदाता सुनवाई के दौरान स्वयं उपस्थित होकर या अपने अधिकृत प्रतिनिधि के माध्यम से निर्धारित दस्तावेज़ प्रस्तुत कर सकते हैं. आयोग के मुताबिक अब तक लगभग 22 लाख से अधिक नोटिसों की सुनवाई की जा चुकी है.

लखनऊ पश्चिम विधानसभा में मतदाता अज़मत अली एक छोटी दुकान चलाते हैं. उन्होंने बताया, "मेरे घर में बड़े बेटे और बहू को छोड़कर सभी को नोटिस आया है, जबकि हमने 2003 की मतदाता सूची की फ़ोटो कॉपी जमा की थी."

उन्होंने कहा, "अलग-अलग दिन सबको बुलाया गया है. अब रोज़ाना वोट सही कराने के लिए जाना पड़ेगा."

इस तरह उनके पड़ोस में रहने वाले राशिद अली को भी नोटिस आया है. उनको भी 2003 की लिस्ट के साथ सुनवाई के लिए बुलाया गया है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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