स्वीडन में क़ुरान जलाने की घटना बार-बार क्यों हो रही है

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- Author, इलगिन कार्लीडैग
- पदनाम, स्वीडन
स्वीडन में क़ुरान जलाए जाने के विवाद ने विदेशों में इसकी छवि पर बुरी तरह असर डाला है.
सिक्युरिटी सर्विस सैपो ने चेतावनी दी है कि इसकी वजह से देश में सुरक्षा के हालात काफी ख़राब हुए हैं.
अधिकांश मुस्लिम बहुत देशों ने इस पर अपनी नाराज़गी ज़ाहिर की. पिछले हफ़्ते ईराक़ में प्रदर्शनकारियों ने जब सुना कि स्टाकहोम में पुलिस ने कुरान की और प्रतियों को जलाने की मंज़ूरी दी है, उसने स्वीडन के दूतावास में आग लगा दी.
इस मुद्दे ने स्वीडिश लोगों को पशोपेश में डाल दिया है क्योंकि यहां बोलने की आज़ादी का ऐतिहासिक और बुनियादी अधिकार 1766 से ही है.
स्टॉकहोम यूनिवर्सिटी फ़ैकल्टी ऑफ़ लॉ के प्रोफ़ेसर मार्टेन शुल्ट्ज़ ने कहा, “बोलने की आज़ादी की रक्षा करने के लिए स्वीडन के पास दुनिया का सबसे मजबूत क़ानून है.”
इस देश ने अपने ईशनिंदा क़ानून को भी 1970 के दशक में ही रद्द कर दिया था.
इसका संविधान हर उस मामले में बोलने की आज़ादी का अधिकार देता है जिसमें धार्मिक संदेशों पर सवाल उठाने से लेकर ऐसे सवाल करना भी शामिल है जिसे आस्थावानों को ठेस पहुंचाने वाला माना जाता है.
लेकिन स्वीडन की दक्षिणपंथी रुझान वाली सरकार अब उस क़ानून में बदलाव पर विचार कर रही है जिससे स्टॉकहोम में कुरान जलाने की अनुमति मिल हुई है.

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वो क़ानून जो देता है बोलने की आज़ादी
इस साल की शुरुआत में किताब जलाने के दो कार्यक्रमों की इजाज़त देने से पुलिस ने मना कर दिया था क्योंकि इससे स्वीडन पर हमले का ख़तरा बढ़ सकता था.
किताब जलाने पर प्रतिबंध लगाने के लिए उन्होंने सार्वजनिक क़ानून व्यवस्था का हवाला दिया था.
लेकिन अदालत ने पुलिस के फैसले को पलट दिया और कहा कि इन सभाओं से सुरक्षा को ख़तरे का कोई पर्याप्त कनेक्शन नहीं दिखता.
क़ानून के अनुसार, लोगों के जुटान पर तभी प्रतिबंध लगाया जा सकता है जब वे सार्वजनिक सुरक्षा के लिए ख़तरा हों.
पिछले हफ़्ते एक इराक़ी ईसाई शरणार्थी को इजाज़त दी गई थी. एक महीने में उसका ये दूसरा स्टंट था.
आलोचकों का कहना है कि यहूदियों के नरसंहार के बाद 1949 से ही, स्वीडन में जातीय समूहों के ख़िलाफ़ भड़काऊ कार्रवाईयों पर प्रतिबंध लगाने वाला क़ानून लागू है.
लेकिन एक्सपर्ट का कहना है कि कुरान जलाने की कार्रवाई लोगों की बजाय एक किताब के ख़िलाफ़ है, इसलिए लोगों के जुटान पर प्रतिबंध लगाने के संदर्भ में क़ानून की यह व्याख्या उचित नहीं है.
प्रोफ़ेसर शुल्ट्ज़ ने बीबीसी से कहा, “बोलने की आज़ादी हमारी संवैधानिक संस्कृति का हिस्सा है. ये सिर्फ क़ानून नहीं है बल्कि बुनियादी उसूल भी है.”
लेकिन इसकी एक क़ीमत है.
इस तरह के प्रदर्शन को कोर्ट की इजाज़त ने तुर्की के राष्ट्रपति रेचप तैय्यप अर्दोआन को नाराज़ कर दिया. यहां तक कि नाटो सैन्य गठबंधन में स्वीडन के शामिल होने का मामला भी खटाई में पड़ता हुआ दिखने लगा था.
स्वीडन की सिक्युरिटी सर्विस के अनुसार, “किताब जलाना और ग़लत सूचनाएं फैलाने के अभियान ने स्वीडन की छवि को एक सुलझे हुए देश की जगह इस्लाम और मुस्लिम विरोधी देश में बदल दिया है.”

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रूस पर ग़लत सूचनाएं फैलाने का आरोप
सैपो ने स्वीडन के पांच चरणों वाले चरमपंथी ख़तरे को लेवल-3 पर ला दिया है. सैपो का कहना है कि ‘सुरक्षा पुलिस इस समय स्वीडन और स्वीडिश हितों पर सीधे हमले के ख़तरों से जूझ रही है.’
सरकार ने मॉस्को पर ग़लत सूचनाएं प्रसारित करने का अभियान चलाने का आरोप लगाया है.
प्रधानमंत्री उल्फ़ क्रिटरसन ने कहा, “रूस ऐसी ग़लत जानकारियां फैला रहा है कि धार्मिक ग्रंथों के अपमान के मामले में स्वीडन की सरकार का हाथ है. ये पूरी तरह ग़लत है.”
सैपो ने कहा कि फ़ेक न्यूज़ कैंपेन में ये भी दावा किया जा रहा है कि मुसलमानों पर हमले हो रहे हैं और सोशल सर्विस मुस्लिम बच्चों का अपहरण कर रही है.
स्वीडन के कलाकार लार्स विल्क्स ने 2007 में एक मरे हुए कुत्ते के साथ पैगम्बर मोहम्मद की तस्वीर बनाई थी.
उसके बाद से बोलने की आज़ादी वाले स्वीडन के उदारवादी क़ानून को लेकर कभी इतनी आलोचना नहीं हुई.
विल्क्स की पेंटिंग के बाद हिंसक हमले शुरू हो गए. स्वीडन में उनके घर पर भी हमला हुआ और 2014 में पड़ोसी देश डेनमार्क में भी उनके ठिकाने को निशाना बनाया गया.
जिस कट्टर दक्षिणपंथी एक्टिविस्ट रासमुस पैलूडन ने ताज़ा विवाद पैदा किया है, असल में उन्हें इससे पहले भी जनवरी में तुर्की दूतावास के बाहर कुरान जलाने की इजाज़त दी गई थी.
स्वीडन से उलट डेनमार्क में लोगों के किसी जगह जुटान के लिए परमिशन की ज़रूरत नहीं होती.
केवल इसी हफ़्ते एक कट्टर दक्षिणपंथी ग्रुप डैनिश पेट्रियोट्स ने कोपेनहेगन में ईराक़ी दूतावास के बाहर क़ुरान की प्रति जलाई थी.
इसे लेकर संयुक्त राष्ट्र में भी हंगामा मचा, जहां कई यूरोपीय देशों ने कहा कि पवित्र किताब का जलाना आक्रामकता और अपमान है लेकिन ये किसी अंतरराष्ट्रीय क़ानून के अंतर्गत नहीं आता.
तुर्की ने अंतरराष्ट्रीय जगत से ऐसे नफ़रत फैलाने वाले अपराध पर संयुक्त कार्रवाई करने की अपील की जो अरबों मुस्लिमों को ठेस पहुंचाते हैं.

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53% स्वीडिश पवित्र ग्रंथों को जलाने के ख़िलाफ़
स्वीडन के वाम रुझान वाले मध्यमार्गी विपक्ष ने सरकार से कहा है कि वो इस मामले में अपनी मंशा स्पष्ट करे.
स्वीडन नागरिकों को पारम्परिक रूप से अल्पसंख्यकों के प्रति सम्मान का भाव रखने वालों के रूप में देखा जाता है और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विवाद से देश में जनमानस पर प्रभाव पड़ना तय है.
सरकारी एसटीवी की एक रायशुमारी के अनुसार, 53% स्वीडिश पवित्र ग्रंथों को जलाने के ख़िलाफ़ हैं जैसे क़ुरान या बाइबिल, जबकि, 34% का मानना है कि इसकी इजाज़त होनी चाहिए.
लेकिन क़ुरान जलाने को इस्लामोफ़ोबिक बताते हुए विदेश मंत्रालय की ओर से जारी निंदा ने बोलने की आज़ादी के अधिकार को लेकर एक बहस छेड़ दी है.
कुछ लोगों को लगता है कि प्रतिक्रिया बहुत ही अनुपयुक्त है.
स्वीडिश लेखकों के एक समूह ने देश में दोबारा ईशनिंदा का क़ानून न लाने को लेकर जनता से अपील की है.
धर्म कोई व्यक्ति नहीं है और जो तर्क दिया जाता है उसकी आलोचना भी उन्हें सुननी चाहिए, हालांकि ये ठेस पहुंचाने या मजाक उड़ाने से अलग है.
स्वीडन में इस्लामिक फ़ेडरेशन के मुखिया ने शिकायत की है कि मुस्लिम संगठनों ने जब सरकार से बातचीत की कोशिश की तो उन्हें कोई जवाब नहीं मिला.
महमूद खल्फ़ी ने कहा, “आपको ठोस तरीके से इन सबके बारे में बात करनी होगी. दुनिया को संकेत दीजिए कि हम इसे गंभीरता से लेते हैं और इसका हल निकालेंगे.”
फिलहाल स्वीडन ये समझाने की पुरज़ोर कोशिश कर रहा है कि मौजूदा संकट के पीछे कुछ चंद लोग हैं न कि सरकार.
स्वीडन सरकार बोलने की आजादी से जुड़े अपने यहां के क़ानून की जटिलता को लेकर ईरान, इराक़, अल्जीरिया और लेबनान को समझाने की लगातार कोशिश कर रही है.
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