सई परांजपे: नसीरुद्दीन शाह 'काम की तलाश में थे' लेकिन तनुजा के साथ 'मैंने ग़लत किया'
- Author, इरफ़ान
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार
सई परांजपे एक ऐसी शख़्सियत हैं, जिन्होंने अपनी कहानियों, संवेदनशीलता और हल्के-फुल्के हास्य से भारतीय सिनेमा को नया रंग दिया.
मराठी और हिन्दी सिनेमा की दुनिया में उनकी पहचान एक ऐसी फ़िल्मकार की है, जो आम इंसान की ज़िंदगी को पर्दे पर ज़िंदा कर देती हैं. जिनकी फ़िल्मों के विषय हमारे रोज़मर्रा के सवालों के इर्द-गिर्द घूमते हैं.
सई परांजपे का जन्म 1938 में पुणे में हुआ. उनके पिता यूरी स्लेप्टज़ॉफ एक रूसी वाटर कलर आर्टिस्ट थे और माँ शकुंतला परांजपे मराठी-हिंदी फ़िल्मों की अभिनेत्री, लेखिका और सामाजिक कार्यकर्ता थीं.
शकुंतला को 1930-40 के दशक में वी. शांताराम की फ़िल्म दुनिया ना माने (1937) में उनके अभिनय के लिए जाना जाता है. बाद में वह राज्यसभा सांसद बनीं और 1991 में पद्म भूषण से सम्मानित हुईं.
आठ साल की उम्र में छपी पहली किताब
छोटी सी उम्र में ही सई ने अपनी माँ के नक़्शेक़दम पर चलते हुए लिखना शुरू किया और आठ साल की उम्र में उनकी पहली मराठी किताब छप गई.
सई परांजपे ने पुणे में पढ़ाई के दौरान नाटकों और लेखन में रुचि दिखाई. कॉलेज में उन्हें अभिनय के लिए पुरस्कार भी मिले.
इसके बाद सई परांजपे ने ऑल इंडिया रेडियो के साथ काम शुरू किया, जहाँ उन्होंने नाटकों और प्रोग्राम्स के लिए स्क्रिप्ट लिखीं.
रेडियो के लिए उनका लेखन, उनकी कहानी कहने की कला का पहला पड़ाव था. यहां उन्होंने मराठी, हिन्दी और अंग्रेज़ी में बच्चों और बड़ों के लिए प्रोग्राम्स लिखे. इस अनुभव ने उनकी कहानियों में सहजता और संवादों में धड़कनें लाने की कला को और निखारा.

एफ़टीआईआई से सीखीं फ़िल्मों की बारीकियां
सई परांजपे ने नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा से प्रशिक्षण लिया, जहाँ उन्होंने नाटकों के लेखन और प्रस्तुति की बारीकियां सीखीं, जो बाद में उनकी फ़िल्मों में साफ़ दिखाई दीं.
इसके बाद, सई ने दूरदर्शन के साथ काम किया, जहां उन्होंने बच्चों और बड़ों के लिए कई प्रोग्राम्स बनाए. दूरदर्शन पर उन्हें मिले एक असाइनमेंट ने ही उनकी यादगार फ़िल्म स्पर्श की नींव रखी.
सई परांजपे ने पुणे के फ़िल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंडिया से फ़िल्ममेकिंग की बारीकियां सीखीं. एफ़टीआईआई ने उन्हें तकनीकी और रचनात्मक दोनों स्तर पर तैयार किया. यहीं से उनकी फ़िल्ममेकिंग की यात्रा ने नया मोड़ लिया.
सई ने बच्चों के लिए चिल्ड्रन फ़िल्म सोसाइटी ऑफ इंडिया के बैनर तले कई फ़िल्में बनाईं, जैसे जादू का शंख (1974) और सिकंदर (1976).
इन फ़िल्मों में बच्चों की दुनिया को संवेदनशीलता और मासूमियत के साथ दिखाने की उनकी कला ने उन्हें अलग पहचान दिलाई.
स्पर्श और चश्मे बद्दूर जैसी फ़िल्में

उनकी सबसे मशहूर फ़िल्म स्पर्श (1980) ने उन्हें राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय ख्याति दिलाई.
इस फ़िल्म में एक दृष्टिहीन स्कूल प्रिंसिपल (नसीरुद्दीन शाह) और एक टीचर (शबाना आज़मी) की संवेदनशील प्रेम कहानी दिखाई गई है. स्पर्श को 1985 में फ़िल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ निर्देशक पुरस्कार और दो राष्ट्रीय पुरस्कार मिले.
उनकी अगली फ़िल्म चश्मे बद्दूर (1981) एक मज़ेदार रोमांटिक कॉमेडी थी, जिसमें तीन दोस्तों (फ़ारूख़ शेख़, रवि बासवानी, राकेश बेदी) और उनकी पड़ोसन (दीप्ति नवल) की कहानी को मनोरंजक और दिलकश अंदाज़ में पेश किया गया.
कथा (1983) और दिशा (1990) जैसी फ़िल्मों में सई परांजपे ने सामाजिक मुद्दों को हल्के-फुल्के ढंग से उठाया.
कथा में मध्यम वर्गीय जीवन की छोटी-छोटी महत्वाकांक्षाओं को हास्य के साथ दिखाया गया जबकि दिशा में ग्रामीण भारत के प्रवासी मज़दूरों की ज़िंदगी को संवेदनशीलता से चित्रित किया गया.
सई परांजपे की फ़िल्मों की ख़ासियत है कि वे गंभीर मुद्दों को भी मनोरंजक और सहज तरीक़े से पेश करती हैं. उन्हें पद्म भूषण और 2013 में किशोर कुमार सम्मान से नवाज़ा गया.
फ़िल्मों से जुड़ा पूरा परिवार
सई परांजपे की शादी मराठी अभिनेता अरुण जोगलकर से हुई, जो भले ही ज़्यादा ना चली लेकिन दोनों दोस्त बने रहे और साथ काम करते रहे.
उनके बेटे गौतम मराठी सिनेमा में निर्देशक हैं और बेटी विनी अभिनेत्री हैं. सई आज भी सिनेमा और साहित्य की दुनिया में प्रेरणा की मिसाल हैं. उनकी कहानियां हमें हँसाती हैं, सोचने पर मजबूर करती हैं और ज़िंदगी को एक नया नज़रिया देती हैं.
उनकी किताब 'अ पैचवर्क क्विल्ट: अ कोलाज ऑफ़ माय क्रिएटिव लाइफ' से उनके जीवन और रचनाकर्म को ठीक से समझा जा सकता है.
अपनी ट्रेनिंग के दौरान सई परांजपे ने बीबीसी के हम्फ्री ब्रायन से क्या सीखा, उन्होंने 'कहानी ज़िंदगी की' में इस बारे में भी बताया.
आप नीचे दिए गए लिंक्स पर क्लिक कर 'कहानी ज़िंदगी की' के पुराने एपिसोड्स देख सकते हैं.
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