कुमार सानू: 1100 रुपये उधार से शुरू हुआ मुंबई का सफ़र - कहानी ज़िंदगी की
- Author, इरफ़ान
मुंबई में वो एक खुशनुमा सुबह थी. वीरा देसाई रोड पर थोड़ी ही देर बाद ट्रैफ़िक की बदहाली शुरू हो जानी थी. मैं और मोहनलाल शर्मा तयशुदा समय से थोड़ा पहले ही पहुंच गए थे और बिल्डिंग के सामने खड़े होकर उस ग्यारहवीं मंज़िल पर नज़र डाल चुके थे जहां प्लेबैक सिंगर कुमार सानू हमारा इंतज़ार कर रहे थे.
कैमरा टीम के आने तक ट्रैफ़िक रुकी हुई चाल से चलने लगा. मेन रोड पर चाय के कुल्हड़ हमने निपटाए ही थे कि टीम आ गई.
लिफ़्ट में हमें जो आदमी मिला वो समझ गया कि हमें ग्यारहवें फ्लोर पर जाना है, सानू दा के पास. उसकी बग़ल में एक थर्मस दबा था, जिसमें वह अपने लिए चाय लेने जा रहा था. उसने बताया, वह कुमार सानू का केयर टेकर है.
90 के दशक में जब छाया आवाज़ का जादू

लिफ़्ट 11वें फ्लोर पर रुक चुकी थी. घर का दरवाज़ा खुला था. घुसते ही बड़ा-सा हॉल था जिसमें ट्रेडमिल और दूसरे वर्कआउट और फ़िटनेस इक्विपमेंट लगे थे. बड़े-बड़े सोफ़ों और दीवारों पर सजे सैकड़ों पुरस्कारों, सम्मानों और प्रमाणपत्रों पर से फिसलती हुई हमारी नज़रें दीवार पर लगे उस बड़े से टीवी स्क्रीन पर पड़ीं जिस पर प्लेबैक सिंगर कुमार सानू की भी नज़रें गड़ी थीं, उनके हाथ में टीवी रिमोट था.
वो एक कैज़ुअल-सा टी-शर्ट और शॉर्ट्स पहने हुए थे. 68 वर्षीय कुमार सानू के शरीर में ताज़गी और फुर्ती थी. उनके चेहरे पर हमसे मिलने का उत्साह आसानी से देखा जा सकता था.
शुरुआती हाय-हेलो के बाद हिंदी फ़िल्मों के मशहूर प्लेबैक सिंगर कुमार सानू हमसे लंबी बातचीत करने लिए तैयार थे. 90 के दशक में जिन गानों ने उस दौर की युवाओं के दिलों को छुआ, उनमें से ज़्यादातर में कुमार सानू की आवाज़ का जादू था.
पूजा पंडाल में गाने से हुई शुरुआत

कुमार सानू की आवाज़ में एक ऐसी मिठास और गहराई है, जो सीधे दिल को छू जाती है. इस मुलाक़ात में हमने उनकी ज़िंदगी, करियर और संगीत की दुनिया के कई पहलुओं पर बातें कीं.
केदारनाथ भट्टाचार्य से कुमार सानू बने इस गायक ने अपने करियर की शुरुआत किशोरकंठी के रूप में की थी और पूजा पंडालों में अच्छा नाम कमाया था.
कोलकाता में जन्मे कुमार सानू ने बताया कि संगीत उनके ख़ून में था. उनके पिता एक संगीतकार थे और घर में हमेशा संगीत का माहौल रहता था. मुंबई पहुंचने के बाद यहां की चकाचौंध भरी दुनिया में जगह बनाना आसान नहीं था.
हालांकि कुमार सानू ने बड़ी खुशी से यह बात मानी कि उनकी प्रतिभा के पारखियों ने उन्हें भरपूर समर्थन और प्रोत्साहन दिया. फिर जब 1989 में फ़िल्म 'जादूगर' में उन्हें गाने का मौक़ा मिला, तो लगा कि वहां से उनकी क़िस्मत ने करवट ली.
90 का दशक कुमार सानू के लिए सुनहरा दौर था. 'आशिक़ी' फ़िल्म के गानों ने उन्हें रातोरात स्टार बना दिया. 'दिल है कि मानता नहीं', 'साजन', 'बाज़ीगर' जैसी फ़िल्मों के गाने आज भी लोगों की ज़ुबान पर हैं.
एक दिन में क्यों गाए 20-25 गाने?
कुमार सानू ने बताया कि उस समय वे एक दिन में 20-25 गाने इसलिए भी रिकॉर्ड करते थे क्योंकि उनके म्यूज़िक टूर विदेश में लगे रहते थे. टूर पर चले जाने के बाद किसी कमिटमेंट का असम्मान ना हो, इसलिए वो जी-जान से काम करते.
भूलना नहीं चाहिए कि अपनी ख़ास आवाज़ के साथ उनकी मेहनत और लगन ही थी जिसने कुमार सानू को वो मुक़ाम दिलाया, जहां हर संगीतकार उनकी आवाज़ का दीवाना था.
हमने उनके पसंदीदा गानों की बात की, तो उन्होंने कुछ गाने हमें गाकर भी सुनाए.
अपनी ज़िंदगी की कहानी में कुमार सानू ने आज के संगीत पर भी अपनी बेबाक राय रखी. वे मानते हैं कि आज टेक्नोलॉजी ने संगीत को आसान तो बना दिया है, लेकिन उस दौर की आत्मा आज के गानों में थोड़ी कम नज़र आती है. फिर भी, वे नए गायकों की तारीफ़ करते हैं और मानते हैं कि प्रतिभा हर दौर में अपनी जगह बनाती है.
कुमार सानू ने अपने फ़ैंस के लिए भी एक ख़ास संदेश दिया. उन्होंने कहा, "संगीत दिल से निकलता है तभी दिल तक जा सकता है. मेरे गाने सुनकर अगर आपके चेहरे पर मुस्कान आती है, तो मेरा गाना सफल है."
उनकी सादगी और गर्मजोशी ने इस बातचीत को और ख़ास बना दिया. यहां आप उनकी ज़िंदगी के अनछुए पहलुओं को और भी क़रीब से जान सकेंगे.
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