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जुड़े हैं भारत और अमरीका के तार

ज़ुबैर अहमदज़ुबैर अहमद|रविवार, 21 अक्तूबर 2012, 18:18 IST

अमरीका में छह नवंबर को राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव होगा.राष्ट्रपति बराक ओबामा दोबारा राष्ट्रपति बनने के लिए मैदान में आए हैं जबकि मिट रोमनी उन्हें ज़बरदस्त चुनौती दे रहे हैं.

ऊँट किस करवट बैठेगा किसी को नहीं मालूम.चुनाव की रिपोर्टिंग के लिए मैं अमरीका में हूँ.

मेरे विचार में भारत को इससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा कि चुनाव में कौन विजयी होगा क्योंकि भारत उन गिने चुने देशों में से है जिसके बारे में अमरीका की दोनों बड़ी पार्टियां यानी डेमोक्रेटिक पार्टी और रिपब्लिकन पार्टी के बीच कोई मतभेद नहीं. तो कोई भी राष्ट्रपत बने भारत के प्रति उसकी विदेश नीतियाँ नहीं बदलेंगी.

लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि भारत में अमरीकी चुनाव के बारे में कोई दिलचस्पी नहीं है.

अमरीका चुनाव को लेकर काफी दिलचस्पी है.भारत को इस बात का इंतज़ार होगा कि अगर रोमनी राष्ट्रपति बने तो अफ़ग़ानिस्तान में भारतीय भूमिका और असर बढ़ाने में मदद होगी?

पाकिस्तान के अंदर आज़ाद घूम रहे भारत-विरोधी चरमपंथियों को पकड़ने के लिए अमरीका पाकिस्तान को मजबूर करेगा ?

भारत और अमरीका के बीच संबंध काफी मज़बूत हैं. भारत अमरीका के लिए एक बड़ी मंडी है जबकि अमरीका भारत के सॉफ्टवेयर उद्योग का सबसे बड़ा ग्राहक.

इसके इलावा अमरीका चाहता है कि 2014 में अफ़ग़ानिस्तान से निकलने के बाद भारत वहां एक अहम् भूमिका निभाए.

भारत और अमरीका को आज एक दूसरे की ज़रुरत है. विश्व भर में इस्लाम चरमपंथियों के खिलाफ अमरीका की लड़ाई में भारत आगे है.

अमरीकी चुनाव इस लिए भी भारत के लिए महत्वपूर्ण है कि भारत अमरीका की सहायता से पाकिस्तान पर लगाम रख सकता है.

अमरीका में भारत की साख काफी ऊंची है. मैं 2011 में एक साल अमरीका रह कर भारत लौटा हूँ.

इस एक साल के दौरान मैने अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा को ध्यान से देखा,उनकी बातें और उन पर टिप्पणियां ध्यान से सुनीं.

उन्होंने अपने कई भाषणों में भारत और चीन का ज़िक्र किया.ऐसा लगता है कि उन्हें यकीन हैं कि अगर अमरीका ने विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में नई खोज नहीं की तो भारत और चीन अमरीका को पीछे छोड़ देंगे.

अमरीका की दोनों पार्टियाँ भारत को गंभीरता से लेती हैं और भारत के प्रति हमेशा अच्छे शब्द कहे जाते हैं.

इसका अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि 2000 से 2010 के बीच एक दशक में तीन अमरीकी राष्ट्रपतियों ने भारत का दौरा किया.

स्वतंत्र भारत में इस दशक से पहले 50 से अधिक सालों में केवल तीन अमरीकी राष्ट्रपति भारत आए थे.

भारतीय सामानों का अमरीका सबसे बड़ा ग्राहक है.दोनों देशों के बीच व्यापार 60 अरब डॉलर सालाना से अधिक का है.

व्यापार का क्षेत्र हो या राजनीति का या पडोसी देश पर निगरानी रखने का मुद्दा..भारत को अमरीकी राष्ट्रपति की मदद की ज़रूरत है.

इसी लिए भारत की भी निगाहें अमरीकी चुनाव पर टिकी हैं.आपकी भी होगी. आप यहाँ से क्या सुनना और पढना पसंद करेंगे? अमरीका चुनाव के दौरान मेरा और आपका अब साथ रहेगा लगभग एक महीने तक.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 12:18 IST, 23 अक्तूबर 2012 naval joshi:

    जुबैर साहब, आपने कहा कि अमेरिका में भारत की साख बहुत ऊँची है, अमेरिका के बारे में आप बेहतर जानते हैं इसलिए आपसे असहमत होना थोडा कठिन है लेकिन मेरी जिज्ञासा है कि इसी तरह की बात 9/11 से पहले पाकिस्तान भी करता था. 1971 की लडाई में तो अमेरिका ने पाकिस्तान के सहयोग के लिए अपना नौसैनिक सॉतवा बेडा तक भारत के खिलाफ भेज दिया था, अमरीकियों द्वारा भारत को घेरने के लिए ही पाकिस्तानियों के जरिए कश्मीर पर पूरा विवाद उठाया जाता रहा है. पाकिस्तान में दाउद समेत जितने भी आतंकी खुलेआम घूम रहे हैं,उन्हें आज तक भी अमरीकी वरदहस्त है ताकी भारत पर एकतरफा दबाव भी बना रहे. इस बात को समझना कठिन है कि भारत की अमेरिका में साख ऊँची हो चुकी है. आपसे कूटनीतिक भाषा के इस्तेमाल की उम्मीद नहीं है इसलिए यह सवाल है कि भारत का वहॉ साख बनने के क्या कारण हैं? कृपया यह भी बतायें कि क्या कुछ सॉफ्टवेयर इंजीनियरों के कारण क्या इतना बडा नीतिगत बदलाव आ सकता है? भारत के बारे में इसी तरह की बात 1962 से पहले चीन भी करता था. अचानक किस तरह उसने हमारे भ्रम को तोडा यह जगजाहिर है. अमरीका के राष्ट्रपति जार्ज बुश ने कहा था कि जो हमारे साथ नहीं है वह हमारे खिलाफ है, यह अन्दरखाने की सच्चाई है कि भारत भी अमरीकी तेवरों के सामने घुटने टेक चुका है. हमारी पूरी नीतियां अमेरीकियों की भाव-भंगिमा से तय हो रही है. ताकतवर से किसी की भी मित्रता नहीं हो सकती है. आपको उनके अनुसार चलना ही है अन्यथा परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहना होगा. आज अमेरिका तय कर रहा है कि हमें बर्मा से कैसे सम्बन्ध बनाने हैं, ईरान से कितना तेल खरीदना है, कब एफडीआई को आमंत्रित करना है. संक्षेप में इतना तो समझ में आता है कि भारत की अमेरिका में कोई साख बढी हो, यह नहीं कहा जा सकता है, इस महाद्वीप में पाकिस्तान के जरिए अमेरिका अपनी महत्वाकांक्षा पूरी नहीं कर पा रहा है इसलिए अमेरिका ने भारत के लिए थोडी रणनीति बदली है. मनमोहन को सबसे पहले विदेशी के तौर पर खाने पर बुलाया या ओबामा बजरंगबली की मूर्ती के सामने खडे हो गये इससे भारत की छवि का आकलन करना जल्दबाजी है.

  • 2. 20:44 IST, 23 अक्तूबर 2012 triyugee narayan dwivedi:

    मुझे आपकी पत्रकारिता बहुत ही पसंद आई. मैं चाहता हूँ कि आप चुनाव के साथ-साथ वहाँ के बारे में और अमरीका की चुनाव प्रणाली के बारे में भी बताएं. क्या भारत में ऐसा संभव नहीं है कि अमरीकी चुनाव प्रणाली को अपनाया जाए? इससे चुनाव के खर्च भी कम हो जाएँगे. वैसे भी बहुदलीय व्यवस्था से भारत का नुकसान ही हो रहा है. छोटी-छोटी पार्टियाँ पैसा लेकर सरकार बनवाती हैं और जब चाहे ब्लैकमेलिंग करती हैं, और असमय चुनाव करवाना पड़ता है. कृपया अपने विचार जरूर दें.

  • 3. 14:53 IST, 26 अक्तूबर 2012 yogesh dubey:

    जुबैर जी, अमरीकी चुनावों पर आपने बेहद शानदार ब्लॉग लिखा है. उम्मीद है कि चुनावों पर ापकी बेहतरीन रिपोर्टिंग देखने को मिलेगी.

  • 4. 22:33 IST, 29 अक्तूबर 2012 raza husain:

    आज भारत से ज्यादा अमरीका को उसकी जरुरत है.पाकिस्तान के अमरीका के साथ रिश्ते बहुत खराब हो चुके हैं.चीन पर अमरीका ज्यादा भरोसा नहीं करता.एक भारत ही है जो अमरीका का सच्चा दोस्त है.

  • 5. 11:31 IST, 31 अक्तूबर 2012 shiv kumar bishnoi:

    जुबैर सर आपकी रिपोर्टिंग काबिले तारीफ हैं.चुनावी कवरेज के बीच सैंडी तूफान की भी आपने कवरेज दी उसके लिए धन्यवाद.क्या आप बता पाएंगे कि संयुक्त राष्ट्र परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता के लिए मिट रोमनी और बराक ओबामा ने समर्थन क्यों नहीं किया.

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