नो हॉर्न प्लीज़!
जब मैं किसी भारतीय सड़क पर होता हूं, एक लम्हा ज़रुर आता है जब किसी के ज़ोरदार और हिंसक तरीके से हॉर्न बजाने से झल्ला जाता हूं.
मुझे लगने लगता है कि अभी यहां कोई बड़ा दंगा-फ़साद होने वाला है या किसी का शरीर क्षत-विक्षत हो गया है या कम से कम हॉर्न बजाने वाले को सड़क पर कोई दस मीटर गहरा गड्डा दिख गया है. लेकिन ये तो किसी भी आकस्मिक लम्हे की आकस्मिक यात्रा के दौरान कोई भी ड्राइवर (जो हमेशा पुरूष होता है) हो सकता है.
तो जब भी हॉर्न बजता है तो मैं ड्राइवर के चेहरे को देखने के लिए मजबूर हो जाता हूं और जब मुझे उस चेहरे भाव बेपरवाह सा लगता तो मैं सोचता हूं, "जैसे ही कोई भारतीय मर्द ड्राइविंग सीट पर बैठता है तो उसे क्या हो जाता है?"
ठीक है कि ऐसी घटनाएं दक्षिण लंदन के मेरे इलाके में भी होती हैं. लेकिन वो इतनी अधिक तो कतई नहीं होती जितनी आधुनिक शहरी भारत में.
क्या इसकी वजह ये है कि भारत में कारें अब भी सिर्फ़ पांच प्रतिशत लोगों के पास ही हैं और इनके मालिक ख़ुद को ख़ास, ताक़तवर और सड़कों का बादशाह समझते हैं?
दिल्ली की सड़कों पर गाड़ी चलाने वाले एक आम ड्राइवर के बारे में सोचिए. मसलन वो कितनी बार पीछे घूमकर सावधानी से गाड़ी को सड़क पर मोड़ते हैं? आपको नहीं कि ये लोग सिर्फ़ सामने देखते हैं और हॉर्न बजाते हुए ये उम्मीद करते हैं कि उनके पीछे वाले उनसे दूर रहेंगे और आगे वाले उनके लिए डर के मारे रास्ता छोड़ देंगे.
मुझे एक बार मुंबई में एक टैक्सी वाले ने बताया, "रियर-व्यू मिरर का कोई मतलब नहीं है क्योंकि सभी हॉर्न बजाते रहते हैं इसलिए आपको हमेशा पता होता है कि कौन कहां है."
साधारण और एक एकदम वास्तविक राय. तो इसका रिश्ता ताक़त या घमंड से नहीं है. इसका मकसद है - आगे निकलना.
इस बीच मैं लाल प्लास्टिक की कुर्सी पर बैठकर राज कचौरी का आनंद ले रहा हूं. दक्षिण दिल्ली के छोटे से बाज़ार में मैं कुत्तों के एक झुंड को काफ़ी दिलचस्प और मंनोरंजक पाता हूं.
तभी अचानक ज़ोरदार हॉर्न बजता है.
संजीदा बात तो ये है कि इतनी ज़ोरदार आवाज़ आप तभी सुन सकते हैं जब आपके बोनेट में 'बर्लिनर फ़िलहार्मोनिक ओर्केस्ट्रा' हो. हॉर्न इतना भयानक था कि कुत्तों के भी कान खड़े हो गए. और फिर एक लग्ज़री कार सामने दिखी. शायद बीएमडब्ल्यू या ऑडी. यहाँ सैंट्रों जैसी छोटी गाड़ी मुश्किल से अंदर घुस पा रही थी लेकिन ताकत और उच्च वर्ग की ये निशानी इस रफ़्तार से अंदर आ रही थी कि जैसे वो यूसैन बोल्ट को शर्मिंदा करना चाहती हो.
फिर मैंने उस कार में बैठे आदमी की शक्ल देखी. वो अपने स्मार्टफ़ोन पर गप्पे लड़ाने में व्यस्त था और उसका दूसरा हाथ चमड़े के कवर वाले स्टेयरिंग व्हील पर था.
उसके हाव-भाव साफ़ थे - तुम में से कोई भी मुझे छू नहीं सकता, अगर तुम्हारी तकदीर अच्छी हुई तो तुम मेरे जूते ज़रुर चाट सकते हो.
लेकिन ये सब हो क्या रहा है? आप इतने-सारे लोगों को अपने चेहरे पर ऐसे भाव के साथ क्यों देखते हैं जैसे कि वो कह रहे हों कि 'मैं अपने आस-पास के लोगों से अधिक महत्वपूर्ण हूं.'
गुड़गांव के एक्सप्रेस-वे पर ट्रक हों, दिल्ली की सड़कों पर बसें या टैक्सियां, सभी दबादब हॉर्न बजाते हैं. इस धातु बक्से के भीतर बैठते ही लोगों को कुछ हो जाता है. जैसेकि ये बक्सा यानी उसका वाहन कह रहा हो, "मैंने तुम्हें चुना है, तुम ख़ास हो, तुम्हें बिल्कुल सीधे उस पैदल यात्री की ओर गाड़ी चलाने का हक़ है क्योंकि अगर उसे बचना है तो हट ही जाएगा."
इस समाज में जाति और वर्ग बहुत महत्त्वपूर्ण हैं लेकिन शायद आम सोच रखने वाले लोग ऐसा कभी ना करें.
ओह...कोई मध्यम दर्जे का सियासतदान बहुत-सी छोटी सुज़ुकी जीपों के काफ़िले के साथ गुज़र रहा है और साथ है कुछ एबेंसेडर गाडियाँ - अपने रहस्यमयी लंबे एंटिना के साथ.
कुत्ते भी अब खिसक रहे हैं. हम भी खा-पीकर निकलते हैं.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें
बहुत अच्छा लिखा आपने ,हॉर्न ड्रामा भारतीय सड़कों का कहानी बयाँ करती है .
धन्यवाद.आपने ठीक विषय चुना, भारत मेँ सङक यातायात के नियम तोङना आम है. पैदल यात्री की तो कोई औकात ही नहीँ है.
सब कुछ सही नही है लोग खुद को दिखाने के लिए सड़क और गाड़ी का इस्तेमाल करते हैं. मगर ये तो कहीं और भी हो सकता है , मैं तो ऐसे छोटे शहर की बात कर रहा हूं जहाँ पर लोग हॉर्न बजाने को ध्यान खींचने का साधन मानते हैं. भले ही आप सही ही क्यों न हों .
उम्दा, उम्दा और बेहद उम्दा ब्लॉग.
आपके लिखने का अंदाज अलग है , मुझे पसंद आया .
मैं आपसे पूरी तरह सहमत हूं , मुझे भी समझ नही आता कि लोग हॉर्न क्यों बजाते हैं
भारतीय सड़कों और उनमें गुज़रने वालों की मानसिकता की बहुत बारीक और सटीक व्याख्या करने की है नील साहब ने...हम भारतीय हॉर्न के शायद इतने आदी हो चुके हैं कि हमें उसमें ज्यादा अस्वाभाविकता नहीं दिखती, लेकिन है तो ये इरिटेट करने वाली आदत. अच्छे लेख के लिए साधुवाद.
आप सही कहते हैं महाशय मैं ऐसी घटनाओं से रोज़ गुजता हूँ. तब पर भी राह मे गुज़रना ख़तरे रे खाली नही लगता हैं. लगता हैं कि कही कोई धक्का मार के न चला जाय.
नील , लंदन वापस जाइए.
इस समस्या से हम सभी भारतीय प्रतिदिन दो-चार होते हैं. मुझे याद आता है कि करीब साल भर पहले मैने दिल्ली में रहने वाले एक अमीर व्यक्ति के बारे में पढा था कि जब से वे अपनी कार की सवारी कर रहे हैं, तब से कभी गाड़ी का हार्न नहीं बजाया. उनका ड्राइवर भी गाडी चलाते वक्त हॉर्न का प्रयोग नहीं करता. इस खबर को पढने के बाद मैने भी निर्णय लिया कि कभी हॉर्न नहीं बजाउंगा, लेकिन मेरी यह प्रतिज्ञा भीष्म की तरह अटल नहीं रह सकी. हम चाहते तो हैं उचित कदम उठाना और उठाते भी हैं, लेकिन कभी स्थितियां हमपर भारी पड जाती हैं.
मैं आपसे शत प्रतिशत सहमत हूँ , मैं भी ऐसे लोगों से तबाह हूँ.
लोग हार्न बजाते है इसलिए नहीं की गाड़ी में बैठा हुआ ड्राईवर खुद को महत्त्वपूर्ण समझ रहा है और दूसरे को तुच्छ, बल्कि ये इस लिए है की ट्राफिक नियंत्रित नहीं है सड़के वाहनों और दुसरे यात्रियों के लिए सहज और व्यवस्थित नहीं है, हर किसी को जल्दी पहुंचना है, सड़क पर कम्पिटीशन का माहौल है. विकशित देशो में सड़के ब्यास्थित है आवागमन नियंत्रित है कड़े कानून है, यहाँ तक की सडको पर थूकने पर भी जुर्माना है, इस लिए विकशित देशो में ट्राफिक जाम होने पर भी हार्न सुनाई नहीं देता है और इंडिया में बगैर हार्न के गाड़ी नहीं चलती.
नील साहब अब तो हम हिन्दुस्तानियों की यह आदत सी बन गई है. कुछ ऐसा अह्सास होता है कि बिना शोर - शराबे के कुछ अधूरा सा लगने लगता है फिर चाहे सडक हो, शादी हो ,कार्यालय ,अस्पताल हो या फिर आम सार्वजनिक स्थान हों . बिना हो हल्ले के लगता है कि काम सम्पूर्ण नहीं होते! सडक पर गाडी वाले आगे वाले के लिये तो हॉर्न बजाया जाता है लेकिन पीछे आ रहे वहन चलक का भी ध्यान रखा जाता है ! वाहनों के पीछे बडे प्यार से लिखा जो होता है - ओ.के .टाटा . होर्न प्लीज़ !!!
खूब कहा , भारतीयों को ये समझना चाहिए , हॉर्न पर प्रतिबंध क्यों नही लगा दिया जाता.
जैसे आप मोबाइल प्रीपेड कार्ड खरीदते हैं, बिजली रिचार्ज कराते हैं, वैसे ही "हौर्न रिचार्ज" मिलना चाहिए. पहले रूपया दें, "होर्न रिचार्ज" कराएं, फिर इस्तेमाल करें ध्यान से.लोग समझ बूझ के इस्तेमाल करेंगे.
भारत के उच्च मध्यम वर्ग में एक ख़ास किस्म का घटियापन है. उनकी जेबों में थोडा पैसा है और दिमाग खाली है
मैं कुछ ची़ज और जोड़ता हूं . हम भारतीय चार या दो पहिया पर सड़क पर चलते हैं तो हमारी मानसिकता घमंडी हो जाती है. हम इस तरह से हॉर्न बजाते हैं जैसे कि इसे बजाना हमारा जन्मसिद्ध अधिकार हो. यहाँ पर मामूली से मामूली बात पर लोगों को जल्दी मची रहती है.
डेल्ही मे तो थोड़ा कम हैं. आप बिहार मुज़फ़्फ़रपुर चले जाए. हर कोई बिना मतलब का हॉर्न बजाता हैं.
बताने पर भी समझने की कोशिश नहीं करते..
कल से मैं हॉर्न बजाना बंद तो नही लेकिन कम जरुर कर दूंगा .
मैं आपसे शत प्रतिशत सहमत हूँ.
भारत मे मानसिकता की बात करे तो अभी भी ये 1947 से पहले की अंग्रेज़ो वाली ही है. लोगो मे डिसिप्लिन का अभी भी अभाव है कोई कब कूद के रास्ते पर तुम्हारी कार के आगे खड़ा हो जाए बोल नही सकते. कुचलने से बच गया तो तुम्हारी किस्मत, कुचल गया तो उसकी किस्मत. फिर दिखावा भी तो है ही, स्कूल मे थे तो अपनी नयी साइकल को दूसरो से अलग दिखाने की कोशिश, कॉलेज के समय ये स्कूटर या बाइक का अलग से बाज़ाने वाला हॉर्न होता था, लोग कह देते अरे वो देखो वो फलना अभी उस गली से गुज़रा है. कार तो फिर भी बड़ी चीज़ है आज भी छोते शहरो मे. बड़े महानगारो की बात करे तो मुंबई का टॅक्सी ड्राइवर सच बोल रहा है, हर कार सवार "आगे से हट नही तो कुचल दूँगा " वाला भाव लिए घूमता है.
एकदम ठीक कहा जनाब आपने.धन्यवाद आपको !!