क्या दुनिया भर की सरकारें फेल हो चुकी हैं

संसद

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    • Author, रेचल नीवर
    • पदनाम, बीबीसी फ्यूचर

हर देश की सरकार दावा करती है कि वो बेहतरीन है. जनता की भलाई के लिए बहुत से अच्छे काम कर रही है. उनके राज में समाज के हर तबक़े की सुनवाई होती है. हर वर्ग की उम्मीदें पूरी की जाती हैं.

मगर, हक़ीक़त ये है कि दुनिया के कमोबेश हर देश की सरकारें आउटडेटेड हो चुकी हैं. यानी उनके काम-काज का ढर्रा पुराना पड़ गया है. वो न तो आज के दौर से तालमेल बिठा पा रही हैं. न ही जनता की उम्मीदें पूरी कर पा रही हैं.

प्रशासन का जो रूप हम आज देख रहे हैं, उसने उन्नीसवीं सदी में पश्चिमी देशों में शक्ल ली थी. तब न तो संचार के ज़रिए इतने ज़्यादा थे. न ही आंकड़ों का ढेर था. ऐसे में जो प्रशासनिक ढांचा उस वक़्त तैयार किया गया, उसमें दर्जे और पायदानों पर ज़ोर दिया गया.

सरकारें बंद दरवाज़ों के भीतर काम करती थीं. जनता न उनके काम करने का तरीक़ा जान पाती थी, न ही फ़ैसलों में साझेदार थी. उस दौर में सरकारों की ज़िम्मेदारी नागरिकों की सुरक्षा और उन्हें इंसाफ़ देने तक सीमित थी.

सरकार

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बदलते दौर के हिसाब से बदलें सरकारें

आज, दुनिया के लोग एक-दूसरे के क़रीब आ रहे हैं. जानकारी बड़ी तेज़ी से धरती के एक कोने से दूसरे छोर तक पहुंच जाती है. जनता के पास सोशल मीडिया से लेकर संचार के कई और माध्यम हैं. उसके पास आंकड़े हैं. लेकिन, सरकारें उसी उन्नीसवीं सदी के ढर्रे पर चले जा रही हैं.

दावोस में होने वाली विश्व आर्थिक मंच की बैठक ने दुनिया के कई क़ाबिल लोगों को मिलाकर ग्लोबल फ्यूचर काउंसिल ऑन इनोवेशन ऐंड आंत्रप्रेन्योरशिप बनाई है. इसके प्रमुख ज्योफ़ मुलगन कहते हैं कि आज की सरकारें बेहद पुरानी पड़ चुकी हैं. वो उस दौर की उपज हैं, जो बहुत पीछे छूट चुका है.

आज, जबकि संचार के इतने माध्यम मौजूद हैं, फिर भी लोकतांत्रिक प्रक्रिया में पब्लिक की भागीदारी बहुत सीमित है. लोग बस एक तयशुदा वक़्त पर वोट देकर सरकार चुनने के हक़दार होते हैं. इसके बाद अगले चुनाव तक लोकतांत्रिक प्रक्रिया में उनका कोई दखल नहीं होता.

जानकार कहते हैं कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया में फौरी और इंक़लाबी बदलाव की सख़्त ज़रूरत है.

ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी के नएफ़ अल-रोधन कहते हैं कि लोकतंत्र एक बदलाव और सुधार का नाम है. अगर सरकारें बदलते दौर के हिसाब से नहीं बदलतीं, तो वो लोगों की उम्मीद पूरी करने में अक्सर नाकाम होने लगती है. लोग अपनी सरकारों से नाख़ुश होते हैं. उन्हें पूरा हक़ नहीं मिलता.

पहाड़

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अमीर देशों में भी बिगड़ रहे हालात

अब अमरीका को ही लीजिए. दुनिया का सबसे ताक़तवर मुल्क़ है. मगर यहां आज 14 फ़ीसदी लोग ग़रीबी रेखा के नीचे रहते हैं. जबकि 1973 में ये आंकड़ा 11 प्रतिशत था.

अल-रोधन कहते हैं कि ये स्थिति ख़तरनाक है. समाज के हाशिए पर पड़े लोग सिस्टम के लिए ही ख़तरा बन जाते हैं. वो बाग़ी हो जाते हैं. सरकार के लिए मुश्किलें पैदा करते हैं.

आज कमोबेश हर लोकतांत्रिक देश चुनावी राजनीति पर चलता है. तय वक़्त पर चुनाव होते हैं. ऐसे में इन देशों के नेता और अफ़सर सिर्फ़ अगले कुछ सालों के हिसाब से ही नीतियां बनाते हैं. वो लंबी दूरी के टारगेट पर काम नहीं करते.

नतीजा ये होता है कि अमीर देशों में भी हालात बिगड़ रहे हैं. जैसे कि जर्मनी में बुनियादी ढांचा बिखर रहा है. इसी तरह अमरीका ने एक ख़रब डॉलर की टैक्स रियायतें अपनी जनता को दीं. इससे सरकारी ख़ज़ाने पर बोझ बढ़ गया. वहीं, इंडोनेशिया में लगातार ख़ुद से उगने वाले जंगल जलाकर बाग़ लगाए जा रहे हैं. इससे क़ुदरती चक्र को नुक़सान हो रहा है.

सुधार

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स्कूल सिखा रहा फ़र्ज़ी ख़बरों की पहचान

वर्ल्ड एनर्जी काउंसिल की एंजेला विल्किंसन कहती हैं कि आप ऐसी नीतियों पर कुछ साल तो चल सकते हैं. मगर बुरे हालात जल्द ही आप पर हावी हो जाएंगे.

वैसे, हमारे कहने का ये मतलब नहीं कि हम मौजूदा सरकारों को, आज के लोकतांत्रिक सिस्टम को तोड़कर फेंक दें.

ज्योफ़ मुल्गन कहते हैं कि हमें मौजूदा सिस्टम में ही सुधार लाकर इसे ज़्यादा जवाबदेह बनाने की कोशिश करनी चाहिए. क्योंकि अगर हम मौजूदा सरकारी ढांचे को उखाड़ फेंकेंगे, तो हालात दक्षिणी सूडान जैसे हो जाएंगे. जहां पुराने निज़ाम को एक झटके में ख़त्म कर दिया. आज वहां पूरी तरह से अराजकता फैल चुकी है.

आज सरकारों को ज़्यादा तेज़-तर्रार और लोगों से संवाद करने वाली बनना होगा. उन्हें ताज़ा आंकड़ों की बुनियाद पर फ़ैसले लेने होंगे. तकनीक के इस्तेमाल से जनता से नज़दीकी बढ़ानी होगी.

कुछ सरकारों ने ये काम शुरू भी कर दिया है. जैसे कि स्वीडन में छात्रों को स्कूल में ही सिखाया जाता है कि वो फ़र्ज़ी ख़बरों को कैसे पहचानें.

इसके बरक्स, अमरीका के राष्ट्रपति ही झूठी ख़बरों को बढ़ावा देते रहते हैं.

सरकार करें सुधार

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मुट्ठी भर लोग ही तय कर रहे देश का मुस्तकबिल

एक तरफ़ स्पेन, ताईवान और आइसलैंड जैसे देश हैं, ऐसे तरीक़े तलाश रहे हैं जिसमें लोकतांत्रिक फ़ैसले मिल-जुलकर लिए जाएं. जनता की अक़्ल का बेहतर इस्तेमाल हो. वहीं, रूस और तुर्की जैसे देशों में एक नेता की तानाशाही बढ़ती जा रही है.

इन छोटे-मोटे सुधारों को छोड़ दें तो अमरीका, यूरोप और एशिया की ज़्यादातर हुकूमतें बेकार हैं. पुरानी हैं. जनता ख़ुद को निज़ाम में साझीदार नहीं महसूस करती. उसे लगता है कि मुट्ठी भर लोग ही देश का मुस्तकबिल तय कर रहे हैं. आम लोगों को लगता है कि उनकी सुनवाई नहीं हो रही है.

अक्सर सरकारों में इतनी जड़ता आ जाती है कि वो बदलाव के लिए राज़ी ही नहीं होते. तभी तो अरब क्रांति नाकाम हो गई. दक्षिण अफ्रीका, नेल्सन मंडेला के ख़्वाबों वाला इंद्रधनुषी देश नहीं बन सका.

एंजेला विल्किंसन कहती हैं कि अफ़सर बदलाव के सबसे बड़े विरोधी होते हैं. निजी क्षेत्र तो कुछ नए आइडिया पर काम भी करता है. मगर, सरकारें उनको अपनाने में भी इतनी देर कर देती हैं, कि जब तक उन पर अमल होता है, वो विचार भी पुराने पड़ चुके होते हैं.

दक्षिण सूडान

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नए तजुर्बे कर रहे हैं कुछ देश

वैसे, कुछ देशों ने अपने यहां की लोकतांत्रिक प्रक्रिया में बदलाव के छोटे-छोटे क़दम उठाए हैं.

जैसे, कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूड्यू ने तय किया है कि वो कुछ फ़ैसले पूरी तरह से आंकड़ों के आधार पर लेंगे. फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रों ने बजट का एक हिस्सा इस बात की रिसर्च के लिए निकाला है, जो सरकार के बेहतर काम करने पर रिसर्च करेगा. इसी तरह संयुक्त अरब अमीरात की सरकार अपने बजट का 1 फ़ीसद नए तरीक़े तलाशने में ख़र्च करेगा.

ज्योफ़ मुल्गन इसे सही दिशा में उठा क़दम मानते हैं. वो कहते हैं कि सरकारें अक्सर प्रयोग करने से डरती हैं. उन्हें लगता है कि जैसे ही प्रयोग का नाम लिया, ये संदेश जाएगा कि इस नए क़दम को लेकर वो ख़ुद आश्वस्त नहीं. लेकिन, किसी भी नई चीज़ को छोटे पैमाने पर आज़माना ठीक होता है. काम किया तो अच्छा, वरना कुछ और नया करें.

यूरोपीय देश स्लोवेनिया की सरकार यही तजुर्बा कर रही है. उसने लोगों के सामने विज़न ऑफ़ स्लोवेनिया को 2015 में पेश किया था. जनता से कहा गया कि वो प्रशासन को बेहतर बनाने के लिए नए सुझाव दें. ताकि लोग ज़्यादा ख़ुशहाल हो सकें. उन्होंने इसके लिए 2050 का टारगेट रखा है.

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मिलकर फ़ैसला लें, गलतियां होंगी कम

एंजेला विल्किंसन कहती हैं कि एक केंद्रित सरकार बहुत कारगर नहीं होती. आज ज़रूरी है कि फ़ैसले लेने में ज़्यादा से ज़्यादा लोग भागीदार हों. कई लोग मिलकर फ़ैसले लें. किसी एक की दादागीरी न चले. इससे ग़लतियां कम होने के आसार बढ़ जाएंगे.

अल-रोधन कहते हैं कि सरकार जनता की सुने इसके लिए ज़रूरी है कि समाज के हर तबक़े को सम्मान दिया जाए. किसी भी नागरिक को ये न लगे कि वो देश में दोयम दर्जे की ज़िंदगी जी रहा है. उसे भी सुरक्षा का एहसास हो, बराबरी का मौक़ा मिले. इंसाफ़ मिलने में देरी न हो. देश की तरक़्क़ी तभी है, जब हर नागरिक उसमें भागीदार हो.

बहुत से ऐसे देश हैं, जिन्होंने तरक़्क़ी तो ख़ूब कर ली है, मगर जनता को बराबर की भागीदारी नहीं दे पाए. यूरोप का देश फिनलैंड ऐसी ही मिसाल है. जहां लोगों को लगता था कि उनके पास अपने देश में कुछ नया करने के बहुत कम मौक़े हैं. नतीजा, बड़ी तादाद में क़ाबिल लोग अपना फिनलैंड को छोड़कर दूसरे देशों में जाकर बस गए.

ज्योफ़ मुल्गन कहते हैं कि सिंगापुर, कनाडा, चिली और ऑस्ट्रेलिया की सरकारें पब्लिक की भागीदारी बढ़ाने के लिए छोटे-छोटे क़दम उठा रही हैं. अगले 20-30 सालों में इसके नतीजे दुनिया के सामने होंगे.

भारत में ऐसा हो रहा है क्या?

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