ड्रोन उड़ाने वाले अपराधियों को कैसे पकड़ती है पुलिस?

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पूरी दुनिया में आजकल ड्रोन का इस्तेमाल बढ़ रहा है. पहले इसे टोह लेने के लिए सेनाओं ने इस्तेमाल करना शुरू किया. फिर इसके ज़रिए दुश्मन पर हमले किए जाने लगे. आज बड़ी-बड़ी कंपनियां ड्रोन के ज़रिए पिज़्ज़ा से लेकर दूसरे सामान की डिलिवरी करने की शुरुआत कर चुकी हैं.
हर तकनीक के फ़ायदे हैं, तो ख़तरे भी. ड्रोन के ज़रिए हमारी ज़िंदगी के तमाम काम आसान हो गए. वहीं अब इनके अपराधियों के इस्तेमाल करने का ख़तरा मंडरा रहा है. बल्कि अपराधियों ने भी ड्रोन का इस्तेमाल शुरू ही कर दिया है.

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पिछले साल 25 अप्रैल को लंदन के अपराधी डेनियल केली ने ड्रोन के ज़रिए वहां की एक जेल में तंबाकू और दूसरे ड्रग पहुंचाने की कोशिश की. हालांकि वो पकड़ा गया और उसे 14 महीने क़ैद की सज़ा भी मिली. ड्रोन के आपराधिक इस्तेमाल पर सज़ा की ये पहली घटना थी.
चरमपंथी कर सकते हैं ड्रोन का इस्तेमाल
मगर इसने आने वाले ख़तरों की तरफ़ इशारा कर दिया है. सुरक्षा और क़ानून-व्यवस्था के लिए ज़िम्मेदार लोगों को डर है कि अपराधी और चरमपंथी ड्रोन के ज़रिए बड़ी वारदातों को अंजाम दे सकते हैं.
मसलन वो इसके ज़रिए किसी सुरक्षित इलाक़े में विस्फोटक गिरा सकते हैं. जेल के भीतर ऐसी ही अवैध और प्रतिबंधित चीज़ें पहुंचा सकते हैं. आबादी वाले इलाक़ों में वो जैविक हथियारों से हमले भी कर सकते हैं.

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आज चीन में बने ड्रोन बेहद कम क़ीमत पर दुनिया भर में उपलब्ध हैं. इन्हें दूर सुरक्षित जगह पर बैठ कर उड़ाया जा सकता है. अपराधी को जुर्म करने के लिए मौक़े पर पहुंचने की ज़रूरत ड्रोन की वजह से ख़त्म हो गई है. अब वो मोबाइल और रिमोट की मदद से ड्रोन के ज़रिए वो काम कर सकता है.
दुनिया भर की सुरक्षा एजेंसियों के लिए ये एक नई और बड़ी चुनौती बनकर उभर रही है. इसके ज़रिए लोग बेहद संवेदनशील ठिकानों की जासूसी भी कर रहे हैं. जंगली जानवरों को भी निशाना बना रहे हैं. ख़तरा दिनों-दिन बढ़ता जा रहा है.
ड्रोन डिटेक्टिव यूनिट
अभी पिछले ही महीने एक ड्रोन की वजह से लंदन के गैटविक हवाई अड्डे पर पांच उड़ानों का रास्ता बदलना पड़ा.
ड्रोन का ऐसा बेजा इस्तेमाल करने वालों को पकड़ना आसान नहीं. ये आसानी से उपलब्ध हैं. रिमोट से उड़ाए जा सकते हैं. फिलहाल जो क़ानून हैं उनके तहत ड्रोन के ज़रिए अपराध करने वालों को सज़ा दिला पाना भी बड़ी चुनौती है.
इन ख़तरों को देखते हुए कई देशों ने ड्रोन डिटेक्टिव यूनिट बनानी शुरू कर दी हैं. ब्रिटेन में हाल ही में जेल और पुलिस के अधिकारियों ने मिल ड्रोन डिटेक्टिव फोर्स की शुरुआत की है.
इसकी बड़ी वजह ये है कि इनके ज़रिए जेलों में सिर्फ़ ड्रग नहीं पहुंचाई जा रही हैं. इनकी मदद से जेल में मोबाइल फ़ोन, ब्लेड, छुरी, सिम कार्ड, यूएसबी ड्राइव और डीवीडी प्लेयर भी पहुंचाए गए हैं. ये आसानी से जेल की चहारदीवारी और सुरक्षा घेरे के पार चले जाते हैं.
अब ऐसी हरकतें रोकने के लिए ज़रूरी है कि ड्रोन उड़ाने वाले का पता लगाया जा सके. मगर ये आसान काम नहीं. क्योंकि अगर ड्रोन पकड़ा भी जाएगा, तो ये कैसे पता लगेगा कि उसे कौन उड़ा रहा था.
कैसे लगता है ड्रोन के मालिक का पता

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हर ड्रोन के अंदर फ्लाइट डेटा होता है. इसी की मदद से उसके मालिक तक पहुंचा जा सकता है. मगर कई बार ड्रोन अगर गिर जाता है तो ये डेटा ख़राब हो जाता है.
ड्रोन की बनावट की ठीक से पड़ताल करके ही इसे उड़ाने वाले तक पहुंचा जा सकता है. इसीलिए कई देशों में ड्रोन के फोरेंसिक साइंस की पढ़ाई कराई जा रही है. अब चूंकि भीड़-भाड़ वाले इलाक़ों की निगरानी भी ड्रोन के ज़रिए होती है, तो इनके काम करने के तरीक़े को समझना और ज़रूरी हो गया है.
बोस्टन में रहने वाले अमरीकी जानकार डेविड कोवर कहते हैं कि ड्रोन को उड़ाने के लिए स्मार्टफ़ोन, कंट्रोलर और सेंसर का इस्तेमाल होता है. ये सभी उड़ान के रूट को दर्ज करते रहते हैं. ठीक उसी तरह जैसे जीपीएस सिस्टम में होता है. इसके अलावा ड्रोन के गिर जाने की सूरत में इसके अंदर जमा वीडियो से भी इसके मालिक के बारे में पता लगाया जा सकता है.
ड्रोन के मालिक को पकड़ने का सबसे बड़ा ज़रिया होता है वो फ़ोन, जिसके ज़रिए ड्रोन उड़ाए जाते हैं.
अपराधी भी चालाक

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मगर हर ड्रोन एक जैसे नहीं होते. इसलिए उन्हें किस स्मार्टफ़ोन की मदद से उड़ाया जा रहा था, ये पता लगाना बेहद ज़रूरी हो जाता है.
कई बार ड्रोन को ऐप के ज़रिए उड़ाया जाता है. इस ऐप में उड़ान के रास्ते की जानकारी दर्ज हो जाती है. जांच करने वाले इनके ज़रिए आरोपी तक पहुंचने की कोशिश करते हैं. कई बार ड्रोन के रोटर पर मौजूद बाल या चमड़ी के ज़रिए भी अपराधी तक पहुंचा गया है. इसके अलावा ड्रोन पर मिलने वाले फिंगरप्रिंट भी अपराधी का सुराग दे सकते हैं.
वैसे जितनी चालाकी जांच एजेंसियां बरत रही हैं, अपराधी भी उतने ही शातिर होते जा रहे हैं. एक ड्रोन पर रिसर्च से पता चला कि अपराधी ने अपने मोबाइल पर कुछ सेटिंग बदलकर ड्रोन से अपने संपर्क के सारे निशान मिटा दिए.
यानी ड्रोन वाले अपराधियों और सुरक्षा एजेंसियों के बीच फिलहाल लुका-छिपी का खेल चल रहा है. कभी अपराधी बाज़ी मार लेते हैं, तो कभी जीत सुरक्षा एजेंसियों की होती है.
ख़तरा इस बात का है कि आगे चलकर कहीं बड़े चरपंथी और अपराधी संगठन इनका इस्तेमाल न करने लगें. फिलहाल दुनिया इस चुनौती के लिए तैयार नहीं है.
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