टोक्यो ओलंपिक: पीवी सिंधु में है पदक का रंग बदलने का माद्दा

    • Author, मनोज चतुर्वेदी
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए

टोक्यो ओलंपिक खेलों में भारतीय दल में पदक जीतने का सबसे मजबूत दावेदार कोई है तो वह निश्चय ही पीवी सिंधु हैं. वह पांच साल पहले रियो ओलंपिक में रजत पदक जीतने में सफल रहीं थीं. इस तरह वह ओलंपिक खेलों की बैडमिंटन में रजत पदक जीतने वाली पहली शटलर बनीं थीं.

लेकिन टोक्यो ओलंपिक खेल कोरोना महामारी के बीच पैदा हुई तमाम मुश्किलों के बीच आयोजित हो रहे हैं. इस दौरान अन्य खिलाड़ियों की तरह ही सिंधु की भी तैयारियां प्रभावित हुई हैं.

अब सवाल यह है कि क्या सिंधु अपने तमगे का रंग बदलकर पीला यानी स्वर्ण कर पाएंगी. सिंधु के जज़्बे को देखकर तो लगता है कि वह इस बार पदक का रंग बदलने में जरूर कामयाब होंगी.

सिंधु के पिछले ओलंपिक खेलों में भाग लेने और इस बार भाग लेने में काफ़ी फ़र्क है. पिछली बार वह अंडर डॉग की तरह उतरीं थीं. लेकिन इस बार वह पिछले खेलों में रजत पदक जीतने वाली खिलाड़ी के तौर पर उतर रहीं हैं. इस कारण देशवासियों को उनसे खासी उम्मीदें हैं. इस सच से सिंधु भी वाकिफ हैं.

वह कहती हैं, "मैं किसी भी मेजर टूर्नामेंट में जब भी कोर्ट पर उतरती हूं, तो मुझसे पदक जीतने की उम्मीद की जाती है. पर इन उम्मीदों पर खरे उतरना आसान नहीं है. मैं इन उम्मीदों के दबाव में आए बगैर अपने खेल पर फ़ोकस करती हूं."

बेहतर परिणाम की उम्मीद

पीवी सिंधु की टोक्यो ओलंपिक में संभावनाओं को लेकर छह बार राष्ट्रीय चैंपियन रहीं मंजूषा कंवर कहती हैं, "रियो ओलंपिक के फ़ाइनल में केरोलिन मारिन के हाथों हार की यादें अब भी ताजा हैं. पर सिंधु निश्चय ही पदक जीतने की मजबूत दावेदार हैं. लेकिन इसके लिए उन्हें पूरे टूर्नामेंट के दौरान अपने को 150 प्रतिशत फिट रखना होगा. वह पिछले तीन-चार महीनों से कोरियाई कोच पार्क तेई सेंग की देखरेख में कड़ी मेहनत कर रही है. इस कड़ी मेहनत का बेहतर परिणाम आना चाहिए."

पीवी सिंधु का जापानी खिलाड़ियों के खिलाफ रिकॉर्ड अच्छा है. पर इस बार जापानी खिलाड़ी अपने घर में खेल रहीं होंगी, इसका उन्हें फायदा मिलना तय है.

इस संबंध में मनीषा कंवर कहती हैं, "सिंधु के लिए जापानी खिलाड़ियों को जापान में हराना थोड़ा मुश्किल होगा. अगर ऐसा ड्रा पड़े जिसमें सिंधु को शुरुआती मैचों में जापानी खिलाड़ियों से नहीं भिड़ना पड़े तो बेहतर होगा. यह ज़रूर है कि सिंधु मैच अभ्यास की कमी का शिकार हैं."

"लेकिन मौजूदा स्थिति में लगभग सभी खिलाड़ियों की यही स्थिति है. पर इतना जरूर है कि सिंधु इस बार पदक जीतने की मजबूत दावेदार है."

पीवी सिंधु को पिछले ओलंपिक में खेलने का अनुभव तो है ही, इसके अलावा इस बार वह विश्व चैंपियन के तौर पर भाग लेने जा रही हैं. सिंधु ने 2019 के अगस्त माह में बासेल में हुई विश्व चैंपियनशिप में जापानी खिलाड़ी नोजोमी ओकुहारा को 21-7, 21-7 से हराकर यह ख़िताब जीता था.

उन्होंने क्वार्टर फाइनल में चीनी ताइपे की ताई यू जिंग को हराया था. इन मैचों के दौरान सिंधु के खेल में जो फ़र्क नजर आया, वह था कि वह प्रतिद्वंद्वी के खेल के विपरीत खेल को बदलना सीख गई हैं. पहले वह आक्रामक रुख अपनाकर अपनी पूरी ताकत शुरुआत में ही झोंक देतीं थीं. इसकी वजह से कई बार खिलाड़ी बाद में उनकी ऊर्जा की कमी का फायदा उठाने में सफल हो जाते थे. पर अब उनका खेल बदल गया है.

तैयारी का तरीका बदला

हम सभी जानते हैं कि कोरोना महामारी की वजह से ज्यादातर टूर्नामेंटों को रद्द कर दिया गया, जिसकी वजह से तैयारी मुश्किल हो गई. इसका तोड़ उन्होंने अलग अंदाज से अभ्यास करके निकाला है. वह आजकल बेंगलुरू में गाउची बाउली स्टेडियम में सुचित्रा अकादमी के सहयोग से ट्रेनिंग कर रही हैं.

यह ट्रेनिंग दक्षिण कोरियाई कोच पार्क तेई सेंग की देखरेख में की जा रही है. ट्रेनिंग में यह व्यवस्था की गई है कि जिस तरह ओलंपिक में अलग अंदाज वाली खिलाड़ियों से मुकाबला होगा क्योंकि ओकुहारा, यामागुची और रत्चानोक के खेलने का अंदाज एकदम से अलग है. इसे ध्यान में रखकर ही वह प्रतिदिन अलग-अलग तरह के खिलाड़ियों के साथ खेलती हैं.

इसमें कभी बाएं हाथ वाले खिलाड़ी को तो कभी दाएं हाथ वाले खिलाड़ी से और कभी आक्रामक तो कभी रक्षात्मक खिलाड़ी से उन्हें खिलाया जाता है.

साथ ही टोक्यो वाली स्थितियां ही यहां भी तैयार की गई हैं. सिंधु कहती हैं कि ट्रेनिंग के दौरान अलग-अलग तरह के खिलाड़ियों के साथ खेलने से उनके खेल में एक नयापन आ गया है.

सिंधु ने समय का किया है सदुपयोग

कोरोना महामारी के दौरान सिंधु ने समय का अच्छा उपयोग किया. उन्होंने मार्च माह में स्विस ओपन के फ़ाइनल तक चुनौती पेश करने के बाद ऑल इंग्लैंड बैडमिंटन में भाग लेकर मैच अभ्यास की कमी को कुछ हद तक पूरा कर लिया है. पर वह मौके का फ़ायदा उठाकर ऑल इंग्लैंड ख़िताब को अपने नाम नहीं कर पाई.

टूर्नामेंट के ओलंपिक क्वालिफायर में शामिल नहीं होने की वजह से चीन, दक्षिण कोरिया और चीनी ताइपे की खिलाड़ियों ने इसमें भाग नहीं लिया और इंडोनेशिया और ब्रिटेन की कोरोना के कारण हट गए.

इस स्थिति में लग रहा था कि इस बार सिंधु का खिताब का सपना पूरा हो जाएगा. लेकिन थाईलैंड की पोर्नवावी ने सेमीफाइनल में पूरे दबदबे वाले खेल का प्रदर्शन करके सिंधु की उम्मीदों पर पानी फेर दिया. पर सिंधु कहती हैं कि इस समय का मैंने तकनीक और कौशल सुधारने में इस्तेमाल किया है.

"आमतौर पर होता यह है कि आप टूर्नामेंटों में खेलते हैं और लौटने पर ग़लतियों को सुधारते हैं. आपको तकनीक पर काम करने के लिए समय ही नहीं मिल पाता है. पर इस बार मैंने इस काम अंजाम दिया है."

पदक की राह में यह हैं बाधा

यह सही है कि रियो ओलंपिक की स्वर्ण पदक विजेता केरोलिन मारिन इस बार भाग नहीं ले रही हैं. पर फिर भी सिंधु की राह आसान नहीं रहने वाली है.

उनकी इस राह की प्रमुख बाधा जापानी खिलाड़ी नोजोमी अकुहारा और यामागुची के अलावा विश्व की नंबर एक खिलाड़ी चेन यू फेई और नंबर दो चीनी ताइपे की ताई यू जिंग और थाईलैंड रत्चानोक इंतानोन हो सकती हैं.

इसमें कोई दो राय नहीं कि इन सभी खिलाड़ियों के खिलाफ सिंधु का रिकॉर्ड बेहतर है. लेकिन यामागुची और ओकुहारा को घर में खेलने का लाभ मिलेगा, हालांकि पर दर्शकों के मौजूद नहीं रहने पर दर्शकों के उत्साहवर्धन की कमी से शायद ज्यादा फायदा नहीं मिल सकेगा.

चेन यू फेई के खिलाफ भी सिंधु का रिकॉर्ड 6-4 का है. लेकिन इस युवा चीनी खिलाड़ी ने 2019 के बीडब्ल्यूएफ फाइनल्स में सिंधु के हराने के बाद खासी प्रगति की है. वह इस बार सिंधु ही नहीं सभी खिलाड़ियों के लिए ख़तरा बनने का माद्दा रखती हैं.

बैडमिंटन में पुरुषों से पदक की उम्मीद कम

सिंधु के अलावा पुरुष एकल में बी साई प्रणीत और पुरुष युगल में सात्विक साईराज रैंकीरेड्डी और चिराग शेट्टी की जोड़ी भाग ले रही है.

प्रणीत ने 2019 के विश्व चैंपियनशिप में कांस्य पदक जीतकर अपने ओलंपिक पदक का दावा तो किया है, पर पुरुष वर्ग में दिग्गजों की भरमार होने और युगल जोड़ी को अंतरराष्ट्रीय मैच खेलने का अनुभव कम होने से पदक की उम्मीद लगाना उचित नहीं होगा.

इस संबंध में मंजूषा कहती हैं, "प्रणीत ने 2017 में बहुत ही शानदार प्रदर्शन किया था पर पिछले कुछ समय में उनका प्रदर्शन ऐसा नहीं रहा है कि पदक लाने की उम्मीद की जाए."

"वैसे भी पुरुष ड्रा बहुत ही मुश्किल है. यहां तक युगल जोड़ी की बात है तो इसमें ज्यादा से ज्यादा अंतरराष्ट्रीय मैच खेलने का लाभ मिलता है. लेकिन मौजूदा समय में अंतरराष्ट्रीय मैचों में नहीं खेल पाने से उन्हें मजबूत दावेदार नहीं मान सकते. उन्हें इस स्तर पर आने में अभी कुछ और साल लग सकते हैं."

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