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कोरोना के पहले मरीज़ का भारत में इलाज कैसे हुआ था?
- Author, इमरान क़ुरैशी
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
भारत में कोरोना संक्रमण का पहला मामला सामने आने का एक साल हो गया है. कुछ लोगों के लिए ये एकांतवास का साल रहा तो कुछ के लिए ये जेल जैसा था.
भारत में सख़्त क्वारंटीन को सबसे पहले महसूस करने वाली केरल के त्रिसूर की एक बीस वर्षीय छात्रा थीं जिन्होंने प्रशासन को फ़ोन करके अपने गले में ख़राश होने की जानकारी दी थी.
और जब एंबुलेंस उन्हें लेने उनके घर पहुँचा तो वे बहुत ख़ुश हुईं थीं. केरल की चर्चित स्वास्थ्य मंत्री केके शैलजा ने उनकी माँ को फ़ोन करके भरोसा दिया था कि उनकी बेटी का बहुत अच्छा ख्याल रखा जाएगा.
अप्रैल में एक टीवी चैनल को दिए साक्षात्कार में चीन के वुहान में रहकर मेडिकल की पढ़ाई कर रही इस छात्रा ने बताया था कि अस्पताल में उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती एकांतवास में रहना था. उन्होंने वहां अकेलापन महसूस किया.
त्रिसूर मेडिकल कॉलेज में जनरल मेडिसिन के प्रोफ़ेसर डॉ. जिजिथ कृष्णा ने बीबीसी हिंदी से कहा, 'वो उनके लिए जेल जैसा था. हमने बाद में उसे क्वारंटीन का नाम दिया.'
वो 27 जनवरी से 30 जनवरी के बीच त्रिसूर के जनरल अस्पताल में थीं. इस दौरान उनके सैंपल की जाँच की जा रही थी. बाद में 31 जनवरी से 20 फ़रवरी तक उन्हें त्रिसूर मेडिकल कॉलेज अस्पताल में भर्ती रखा गया था.
आज वो और उनके साथ आए दो सहपाठी अपने आप को मीडिया से दूर ही रखते हैं. उनके पिता ने बीबीसी से कहा, "वो अब मीडिया से बात करना नहीं चाहती हैं."
वो चिंतित थीं और डॉक्टर भी चिंतित थे
लेकिन पहली कोरोना पॉज़िटिव रिपोर्ट से सिर्फ़ पहली मरीज़ ही चिंतित नहीं थीं. सरकार ने जब छात्रा को जनरल अस्पताल से थ्रीसूर मेडिकल कॉलेज शिफ्ट करने का फ़ैसला लिया तो यहाँ के डॉक्टर भी चिंतित हो गए थे.
डॉ. कृष्णा कहते हैं, "हमने वायरस के बारे में पढ़ा था और हम अपने अस्पताल को कोविड के मामलों से निबटने के लिए तैयार कर रहे थे. और फिर एक दिन हमें बताया गया कि भारत में कोरोना संक्रमण की पहली मरीज़ त्रिसूर से हैं. इससे हमें थोड़ी चिंता और तनाव ज़रूर हुआ था."
हालाँकि अस्पताल का रेस्पांस बहुत तेज़ था. जल्द ही 25 बिस्तर वाली इमारत से बाकी सभी मरीज़ों को हटा लिया गया ताकि कोविड की पहली मरीज़ को यहां भर्ती किया जा सके.
डॉ. कृष्णा बताते हैं, "मरीज़ को मेरी निगरानी में भर्ती किया जा रहा था. स्वास्थ्य मंत्री और मुख्य सचिव त्रिसूर आ रहे थे इससे हमें तैयार होने में ज़रूर मदद मिली. ये सब एक ही दिन में कर लिया गया था."
वे कहते हैं, "स्वास्थ्य मंत्री सुबह दो बजे तक बैठकें कर रहीं थीं. इससे हमें क्षमता विकसित करने में मदद मिली."
डॉ. कृष्णा कहते हैं, "उस समय हमारे पास मेडिकल बोर्ड भी नहीं था. ये सब बाद में आया. हमारी सबसे पहली चिंता दूसरे डॉक्टरों को ब्रीफ़ करने की थी. जैसे ये बताना की पीपीई किट कैसे पहनी जाती है, मरीज़ को कब देखना है. हमें बाद में पता चला कि उस पहली मरीज़ में कोरोना संक्रमण के मध्यम लक्षण थे."
"उसे निमोनिया नहीं था. हमने उसका ऐसे ही इलाज किया जैसे फ्लू के सामान्य मामलों में किया जाता है. लेकिन हम हर समय इस बात को लेकर चिंतित थे कि हमें ज़रूरत से ज़्यादा चीज़ें नहीं करनी है. निस्संदेह प्रवृति नई चीज़ें अपनाने की होती है."
डॉक्टर इस बात को लेकर भी स्पष्ट थे कि उन्हें मरीज़ पर नज़दीकी नज़र रखनी है क्योंकि यदि कोई जटिलता आनी है तो उन्हें तुरंत रेस्पांड करना है. वायरस से मध्यम संक्रमण के 70 प्रतिशत मामलों में शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली स्वयं ही वायरस से लड़ती है.
"ज़ाहिर तौर पर वो कुछ चिंतित थीं, वो चीन से आईं थीं और पहली मरीज़ थीं. लेकिन वो एक मेडिकल छात्रा भी थीं और उनका स्वभाव संयमित था. वो हमारे इलाज को समझ रही थीं और डॉक्टरों की टीम के साथ उन्होंने अच्छे रिश्ते बना लिए थे."
बदलता इलाज
पहले मरीज़ के इलाज के दौरान डॉक्टरों के सामने सबसे बड़ी चुनौती ये थी कि ये एक नया वायरस था.
डॉ. कृष्णा कहते हैं, "मेडिकल इलाज सबूतों के आधार पर किया जाता है. और सबूत जुटाने के लिए समय चाहिए होता है. और पक्के सबूत जुटाने के लिए बड़ी तादाद में मरीज़ों पर अध्ययन करना होता है. यही चुनौती थी. हम ये नहीं कह रहे हैं कि कोई दवाई उपलब्ध नहीं थी. हम ये कह रहे हैं कि उस समय हमारे पास इस वायरस को लेकर पहले से कोई अनुभव नहीं था. मेडिकल सबूत नहीं थे."
"पहला मामला सामने आने के बाद से अब तक ट्रीटमेंट का प्रोटोकॉल बहुत बदल गया है. हमने उसका कोरोना के मध्यम लक्षणों के लिए इलाज किया था. हमने अज़ीथ्रोमाइसिन दवा दी थी. बाद में कई नई दवाएँ आईं. कुछ को दिया गया और बाद में वापस भी ले लिया गया. हम प्लाज़्मा थेरेपी में रूचि ले रहे थे. तथ्य ये है कि आज भी हमने एक मरीज़ का इलाज प्लाज़्मा थेरेपी से किया है."
कोझीकोड के बेबी मेमोरियल अस्पताल में क्रिटिकल केयर फिज़ीशियन डॉ. अनूप कुमार केंद्रीय सरकार से प्लाज़्मा थेरेपी के इस्तेमाल की अनुमति माँगने वाले पहले डॉक्टर थे.
डॉ. कुमार कहते हैं, "हमें बाद में पता चला कि इंफ्लेमेटरी रिएक्शन की वजह से कोरोना संक्रमितों में जटिलताएं आ रहीं थीं."
"साइटोकीन रिलीज़ सिंड्रोम (इससे बुखार आता है और कई अंग एक साथ काम करना बंद कर देते हैं) की वजह से दिक्कतें आ रहीं थीं. शुरू में स्टेराइड का अधिक इस्तेमाल नहीं किया गया. लेकिन बाद में गंभीर मरीज़ों में स्टेराइड की अधिक डोज़ देने से मदद मिली. हम बीमारी के अंतिम चरणों में वायरस संक्रमण की वजह से होने वाले इंफ्लेमेशन को रोकने पर काम कर रहे थे."
भारत में कोरोना के पहले मरीज़ के इलाज ने डॉक्टरों की क्या सहायता की?
इस पर डॉ. कृष्णा कहते हैं, "जब ये वायरस महामारी बना तो हमें लोगों का इलाज करने का विश्वास आया."
डॉ. कृष्णा बताते हैं, "बीते एक साल से हमारी छह यूनिट में से प्रत्येक हर सप्ताह कम से कम कोरोना संक्रमण के तीस मरीज़ों के इलाज कर रही है. संक्रमण के पीक के दौरान ये संख्या इससे भी कहीं अधिक थी."
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