जब अचरेकर सर के एक तमाचे ने सचिन को बदल डाला

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- Author, प्रदीप कुमार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- पढ़ने का समय: 6 मिनट
सचिन तेंदुलकर ने जब दिसंबर, 2013 में टेस्ट क्रिकेट से संन्यास लिया था तो मैच के बाद अपने संबोधन में उन्होंने कोच रमाकांत अचरेकर को कुछ यूं याद किया था, "11 साल का था, तब मेरा करियर शुरू हुआ था. मैं अचरेकर सर को स्टैंड में देखकर बहुत खुश हूं. मैं उनके स्कूटर पर बैठकर दिन में दो मैच खेलने जाता था."
"सर मुझे स्कूटर में ले जाते थे ताकि मैं मैच मिस नहीं कर सकूं. आज जब माहौल थोड़ा हल्का है तो मैं बताना चाहता हूं सर ने मुझे कभी नहीं कहा- वेल प्लेड, क्योंकि वे कभी नहीं चाहते थे कि मैं थोड़ा भी लापरवाह हो जाऊं. लेकिन सर अब आप ऐसा कह सकते हैं क्योंकि मैं अब क्रिकेट नहीं खेल रहा हूं."
200 टेस्ट और 463 वनडे में क़रीब 35 हज़ार रन और सौ शतक जमाने वाले क्रिकेटर की इन बातों से शायद आपको अंदाज़ा हो रहा होगा कि रमाकांत अचरेकर क्या आदमी रहे होंगे. लेकिन अंदाज़ा लगाने से पहले उस दौरान रमाकांत अचरेकर क्या कर रहे थे, ये जान लीजिए.
तब रमाकांत अचरेकर बीमार थे और कुछ सालों से टीवी पर भी क्रिकेट नहीं देख पा रहे थे. टीवी सेट के सामने भी वे नहीं बैठ पाते थे. बोलने में तकलीफ़ थी. लेकिन घर वालों को मालूम था कि मुंबई के वानखेड़े स्टेडियम में सचिन जब आख़िरी बार टेस्ट खेलने उतरेंगे तो ये अचरेकर के लिए बहुत भावुक पल होने वाला है, लिहाजा उनकी बेटी कल्पना मुरकर को ये मालूम था कि पिता जी को स्टेडियम लेकर जाना ही होगा.
सचिन तेंदुलकर को क्रिकेट के मैदान पर देखने के लिए अचरेकर पहली बार स्टेडियम में गए थे. वह भी तब, जब वे उनके संन्यास के फ़ैसले से नाराज़ थे. उन्होंने तब मुझसे फ़ोन पर हुई बातचीत में कहा था, धक्का लगा. अचरेकर की बेटी के मुताबिक पिताजी को लगता था कि सचिन तेंदुलकर अभी कुछ साल और खेल सकते थे.

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बहरहाल, बात उस मुलाक़ात की, जिसके कारण क्रिकेट के आसमान पर सचिन तेंदुलकर जैसा सितारा छा गया. ये मुलाक़ात हुई थी रमाकांत अचरेकर और 11 साल के सचिन तेंदुलकर की. इस मुलाकात का ख़ूबसूरत ज़िक्र सचिन तेंदुलकर ने अपनी आत्मकथा 'प्लेइंग इट माय वे' में किया है.
उन्होंने लिखा है कि उनके भाई अजीत तेंदुलकर उन्हें अचरेकर सर के पास शिवाजी पार्क में ले गए थे, जहां अंडर-15 समर कैंप के लिए ट्रायल लगा हुआ था. कोई भी बच्चा नेट्स पर प्रैक्टिस कर सकता था, जिसे देखने के बाद ही अचरेकर तय करते थे कि उस बच्चे को कैंप में लेना है या नहीं.
सचिन ने अपने अनुभव के बारे में लिखा है, "मैंने इससे पहले नेट्स में कभी बल्लेबाज़ी नहीं की थी. आस-पास बहुत सारे लोग भी जमा थे. जब मुझे बल्लेबाज़ी करने को कहा गया तब मैं बिलकुल कंफर्टेबल नहीं था. सर बहुत गंभीरता से देख रहे थे और मैं कोई प्रभाव नहीं डाल पाया था. मेरी बल्लेबाज़ी ख़त्म होने के बाद सर ने अजीत को बगल में बुलाकर कहा था मैं कैंप के लिए बहुत छोटा हूं, मुझे बाद में लेकर आना चाहिए."
सचिन ने ये भी लिखा है कि इस बातचीत में वे शामिल नहीं थे लेकिन उनकी उम्मीद ख़त्म होने वाली थी. मगर अजीत को उनपर भरोसा था.

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अजीत अचरेकर सर को ये समझाने में कामयाब रहे है कि सचिन नर्वस हो चुका है, आप ऐसा कीजिए कि दूर से उसे बल्लेबाज़ी करते हुए देखिए. अचरेकर मान गए और फिर वो सिलसिला चल निकला, जिसके बाद महज पांच साल के अंदर सचिन भारतीय टीम में पहुंच गए.
रमाकांत अचरेकर ने शुरुआती दिनों में ही सचिन को घंटों नेट्स पर पसीना बहाना सिखाया, जिसे सचिन पूरे करियर में अपनाते दिखे. ये भी दिलचस्प है कि कोचिंग के दिनों में रमाकांत अचरेकर ने एक नियम लागू किया था- सचिन तेंदुलकर को अभ्यास में आउट करने वाले गेंदबाज़ों को इनाम वह एक सिक्का देंगे तो सचिन ने तय कर लिया कि यह सिक्का दूसरों के पास भला क्यों जाए.
इस नियम का दूसरा रूप यह था कि सचिन अगर दिन भर किसी भी गेंदबाज़ से आउट नहीं होते तो वह सिक्का सचिन को मिलता. रमाकांत अचरेकर से सचिन तेंदुलकर ने एक-एक करके कुल 13 सिक्के हासिल किए जिन्हें उन्होंने आज भी बेहद संभाल कर रखा हुआ है. सचिन के मुताबिक़ ये उनके लिए बेशकीमती इनाम से कम नहीं हैं.
सचिन तेंदुलकर को तराशने से करीब दो दशक पहले पहले रमाकांत अचरेकर स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया के कर्मचारी हुआ करते थे. घर में क्रिकेट का माहौल था, क्योंकि उनके पिता, विजय मांजरेकर के दादाजी के साथ न्यू हिंद क्लब की ओर से क्रिकेट खेलते थे.

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इसलिए रमाकांत अचरेकर ने भी क्रिकेट खेलना शुरू किया, लेकिन वे घरेलू क्रिकेट से आगे नहीं बढ़ पाए. हालांकि वे न्यू हिंद क्लब के सचिव ज़रूर बन गए. ये बात 1964-65 के आसपास की थी.
एक दिन अचानक क्लब के मैदान के पास के स्कूल दयानंद बालक विद्यालय के छात्रों ने क्लब के मैदान में अभ्यास की अनुमति मांगी और इसके बाद ही शौकिया कोचिंग का सिलसिला शुरू हुआ.
इसके बाद आचरेकर की पहचान की एक कोच की बनने लगी. 1981-82 तक उनकी पहचान इलाके में बेहतरीन कोच की बन चुकी थी. लिहाजा अजीत तेंदुलकर ने जब अपने भाई सचिन को क्रिकेटर बनाने के बारे में तय किया तो उन्हें सबसे पहले अचरेकर जी ही याद आए.
अचरेकर ने सचिन तेंदुलकर के अंदर छिपी क्रिकेट की प्रतिभा को सबसे पहले भांपा था. सचिन भी उनके पैमाने पर ऐसे खरे उतरे के दादर के इस क्रिकेट कोच को क्रिकेट की दुनिया हमेशा याद रखेगी- सचिन तेंदुलकर जैसा बेमिसाल क्रिकेटर देने के लिए.
हालांकि, उनकी झोली में विनोद कांबली, प्रवीण आमरे और अजीत अगरकर जैसे क्रिकेटर भी शामिल थे लेकिन इन सबमें कोहिनूर तो सचिन तेंदुलकर ही निकले, जिन्होंने ना जाने कितने ही मौक़ों पर अपने कोच का सीना चौड़ा कर दिया.
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सचिन में भरा था अनुशासन
सचिन की शानदार कामयाबी की वजह बताते हुए अचरेकर हमेशा एक ही बात कहते थे - अनुशासन. सचिन के पूरे करियर पर नज़र रखने वाले लोग इस तथ्य को बख़ूबी जानते हैं कि सचिन अपने पूरे करियर में बेहद अनुशासित क्रिकेटर रहे. अनुशासन में थोड़ी कमी हो जाए तो विनोद कांबली जैसा बल्लेबाज़ भी पटरी से कब उतर जाए, इसका पता नहीं चल पाता है.
दरअसल सचिन तेंदुलकर में अनुशासन की नींव और कामयाबी के लिए लगातार अभ्यास का जज़्बा रमाकांत अचरेकर ने नन्ही उम्र में ही डाल दिया था. सचिन के 24 साल तक लगातार क्रिकेट खेल पाने की सबसे बड़ी वजह यही रही कि अचरेकर ने उन्हें क्रिकेट के बारे में इस सहजता से बताया कि घंटों अभ्यास करना सचिन के लिए कभी बोझ नहीं रहा.
शुरुआती दिनों में सचिन तेंदुलकर ने एक बार कोताही दिखाई तो अचरेकर ने गुस्से में उन्हें एक थप्पड़ भी लगाया था. सचिन ने ख़ुद इस घटना का ज़िक्र किया है कि कैसे एक बार अपने स्कूल की सीनियर टीम का फ़ाइनल मैच देखने के लिए वो अपना मैच खेलने नहीं गए.
अचरेकर ने तब सचिन को देखा और जब सुना कि वो क्यों खेलने नहीं गए तो उन्होंने सबके सामने सचिन की गाल पर एक तमाचा जड़ते हुए कहा, "लोगों को तुम्हें देखकर ताली बजानी चाहिए ना कि तुम स्टैंड में बैठे ताली बजाओ."
और अचरेकर के मुताबिक उसके बाद सचिन ने उन्हें कभी शिकायत का मौका नहीं दिया. और तो और, 24 साल के लंबे करियर में सचिन हमेशा हर सिरीज़ से पहले अपने कोच से सलाह मशविरा करना नहीं भूले.

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वैसे तो ये बात सही है कि सचिन तेंदुलकर की कामयाबी के सामने रमाकांत अचरेकर के दूसरे शिष्य पिछड़ते गए. विनोद कांबली का करियर थोड़े समय तक चमकदार ज़रूर रहा लेकिन वे लंबे समय तक नहीं खेल पाए. प्रवीण आमरे ने दक्षिण अफ्रीकी पिच में टेस्ट करियर की शतकीय शुरुआत ज़रूर की लेकिन वहां से आगे नहीं बढ़ पाए. अजीत अगरकर ज़रूर लंबे समय तक खेल पाए पर सचिन जैसा उन्हें दूसरा नहीं मिल पाया. अब द्रोणाचार्य को भी तो दूसरा अर्जुन नहीं ही मिल पाया था.
सचिन सहित दूसरे क्रिकेटरों को तलाशने के उनके योगदान के चलते ही अचरेकर को 1990 में कोचों को दिया जाने वाला सबसे बड़ा सम्मान द्रोणाचार्य पुरस्कार मिल गया था और इसके क़रीब 20 साल बाद 2010 में उन्हें पद्मश्री से भी सम्मानित किया गया.
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उनके निधन के बाद सचिन तेंदुलकर ने ठीक ही कहा है कि अब अचरेकर सर की मौजूदगी से स्वर्ग में भी क्रिकेट समृद्ध होगा. लेकिन क्रिकेट प्रेमियों को अचरेकर हमेशा के लिए याद आएंगे- सचिन तेंदुलकर को तराशने के लिए.
जब जब सचिन का नाम लिया जाएगा, अचरेकर भी याद आएंगे.
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