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सोशल: भारत में हिंदी मीडियम से पढ़ने पर होते हैं ये दर्द
इरफ़ान ख़ान की फ़िल्म 'हिंदी मीडियम' रिलीज़ हो गई है. इस फिल्म की रिलीज़ के साथ अंग्रेज़ी में हाथ टाइट हिंदीभाषी लोगों का दर्द छलकने लगा है.
ऐसे लोग अच्छी खासी तादाद में हैं, जिन्हें इंग्लिश बोलने में हिचकिचाहट होती है. हमने कहासुनी के ज़रिए बीबीसी हिंदी के पाठकों से इसी विषय पर लोगों की राय पूछी.
क्या होता है भारत में हिंदी मीडियम से पढ़े होने का दर्द?
इस सवाल पर लोगों के किए चुनिंदा कमेंट्स हम यहां आपको पढ़वा रहे हैं. पढ़िए हिंदी मीडियम वालों का दर्द....
किशन सिंह ने लिखा, ''बिलकुल परेशानी हुई. ये हमारी शिक्षा व्यवस्था की नाकामी है कि 12वीं तक साइंस पढ़ने वाले हिंदी में पढ़ते हैं. लेकिन बीएससी इंग्लिश में करते हैं. ऐसे में प्राइवेट सेक्टर में तो आप नौकरी सोच भी नहीं सकते. शुरू से सारे विषय इंग्लिश में पढ़ाए जाने चाहिए.''
पवन कुमार अच्छी इंग्लिश में अपना हिंदी का दर्द बताते हैं. वो कहते हैं, ''इंग्लिश में न बोल पाने की वजह से मुझे काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ा. मर्चेंट नेवी का एग्जाम देते हुए इंग्लिश में जवाब न जवाब दिए जाने की वजह से मेरा सेलेक्शन नहीं हो पाया था.''
नसीम अहमद ख़ान लिखते हैं, ''बचपन से हिंदी में पढ़ाई की थी. एग्जाम में अच्छे से लिख नहीं पाता था. लिखते हुए इंग्लिश की शब्द ही नहीं मिलते. इंग्लिश में बात करने में झिझक महसूस होती. मैंने ऐसा पाया कि जो हिंदी बोलते हैं, उनको समाज में थोड़ा कमतर समझा जाता है. आप फेसबुक पर देखिए, जो लोग इंग्लिश में पोस्ट डालते हैं उन्हें काफी अटेंशन दी जाती है.''
शफीकउर रहमान खान ने लिखा, ''जब मैं पोस्ट ग्रेजुएशन कर रहा था, तब मेरे कुछ साथी और टीचर्स मेरा मज़ाक उड़ाते थे. मैं जब इंटरव्यू के लिए गया, तब भी खुद के इंग्लिश न बोल पाने को मैं कभी नहीं भूल सकता.''
भावेष झा लिखते हैं, ''स्कूली दिनों में इंग्लिश के उच्चारण के कारण मेरा मज़ाक बनाया जाता था. जब मैं पुणे के सिम्बयोसिस यूनिवर्सिटी में ग्रेजुएशन के लिए गया तो अंग्रेजी नहीं बोल पाता था. फिर मैंने शिक्षक दिवस पर हिंदी में भाषण दिया, जिसे सबने सराहा. मेरे अच्छे भाषण की वजह से लोग मुझे जानने लगे. अगर आत्मविश्वास हो तो आप हिंदी के सहारे भी अपनी जगह बना सकते हैं.''
कृष्णा फेसबुक पर लिखते हैं, ''बस पूछिए मत. बहुत दर्द झेलना पड़ता है. जो लोग हिंदी का गुणगान करते हैं. मैंने ऐसे लोगों को इंग्लिश का सपोर्ट करते देखा है.''
शैतान सिंह कहते हैं, ''कई बार ऐसा लगता कि काश हम इंग्लिश मीडियम में पढ़े होते. क्योंकि जब हिंदी से इंग्लिश मीडियम में जाते हैं तो बाकी साथियों की तरह हम सब कुछ समझ पाते.''
विवेक चंद्रा ने लिखा, ''हिंदी मीडियम में पढ़ने से अच्छा है कि ज़ाहिल ही रहें. हिंदी मीडियम में पढ़कर आप उच्च शिक्षा भले ही हासिल कर लें. लेकिन भारत में इससे काम नहीं चलेगा. भारत में इंग्लिश मीडियम की पढ़ाई सिर्फ अमीरों के लिए है, जो शासक हैं वो इसे अच्छे से समझते हैं.''
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