बीबीसी स्पेशल: ये चुका रहे हैं
    भारत के न्यूक्लियर सपनों की क़ीमत?

    क्या झारखंड में यूरेनियम माइनिंग से आस-पास के इलाकों में रेडिएशन फैला?
    क्या ये भारत के न्यूक्लियर पावर के ख़िलाफ़ एक प्रोपेगैंडा है? बीबीसी हिंदी की ग्राउंड रिपोर्ट.

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    बाद में पता चला कि जिसे लोग भूत कहते हैं वो दरअसल यूरेनियम से होने वाला रेडिएशन था.

    "दो गांवों को जोड़ने वाले रास्ते पर एक बरगद का पेड़ था. लोग बोलते थे कि उस बरगद के पेड़ पर भूत रहता है और किसी गर्भवती महिला को उस रास्ते से गुज़रना नहीं चाहिए वरना उसके बच्चे को भूत खा जाएगा या हाथ-पैर तोड़ देगा. बाद में पता चला कि जिसे लोग भूत कहते हैं वो दरअसल यूरेनियम से होने वाला रेडिएशन था. रेडिएशन का पहला शिकार मां के पेट में पल रहा बच्चा होता है. माइनिंग के बाद रेडिएशन का भूत पूरे इलाक़े में फैल गया."

    ये कहानी सुनने को मिली झारखंड के जादूगोड़ा में. वही झारखंड जहाँ की यूरेनियम खदानों पर भारत के न्यूक्लियर सपनों को पूरा करने का भार है. सलमा, बुत्ती और शांति कहती हैं कि उन्होंने इन सपनों की क़ीमत चुकाई है. सलमा सोरेन के पाँच बच्चे मरे हुए पैदा हुए, बुत्ती को छह मरे हुए बच्चे पैदा हुए और शांति का दावा है कि पाँच बार बिना किसी वजह के उन्हें गर्भपात होता रहा. शायद ये ‘रेडिएशन का भूत’ ही रहा होगा.

    झारखंड में यूरेनियम कॉर्पोरेशन ऑफ़ इंडिया लिमिटेड (यूसीआईएल) कंपनी 1967 से यूरेनियम माइनिंग कर रही है. देश के न्यूक्लियर रिएक्टरों के लिए 50 सालों से वहाँ से यूरेनियम आ रहा है. झारखंड के पूर्वी सिंहभूम ज़िले में सात यूरेनियम माइंस है - जादूगोड़ा, भाटिन, नरवापहाड़, बागजाता, बांदुहुरंगा, तुरामडीह और मोहुलडीह. लेकिन नब्बे का दशक ख़त्म होते-होते यहां पर सैकड़ों बच्चे विकलांग नज़र आने लगे.

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    यूरेनियम निकालने के दौरान काफ़ी मलबा निकलता है. अगर एक किलोग्राम यूरेनियम निकलता है तो 1750 किलोग्राम रेडियोऐक्टिव कचरा बनता है. यूरेनियम कचरा जहां इकट्ठा होता है उसे टेलिंग पॉण्ड या टेलिंग तालाब कहा जाता है. फ़िलहाल जादूगोड़ा और तुरामडीह में कई एकड़ में फैले दो टेलिंग तालाब हैं. यूसीआईएल की अपनी रिपोर्ट भी ये कहती है कि इन टेलिंग तालाबों में रेडियोऐक्टिव तत्व होते हैं.

    लोग इन टेलिंग पॉण्ड के जितना नज़दीक़ रहेंगे उनके स्वास्थ्य को उतना ही ख़तरा बढ़ेगा. आज भी जादूगोड़ा और तुरामडीह टेलिंग पॉण्ड्स के 100-200 मीटर के दायरे में ढेरों परिवार रहते हैं.

    जादूगोड़ा टेलिंग तालाब के पास चाटीकोच्चा टोले में तक़रीबन 70 परिवार रहते हैं.

    वहां रहने वाले रत्न मांझी ने बताया कि बरसात में उस तालाब का पानी उनके घर में घुस जाता है. मांझी के मुताबिक, "हमारी ज़मीन 1997 में कंपनी ने ली थी और बदले में बेटे को नौकरी भी दी. हमें कहा था कि किसी और जगह बसा देंगे, लेकिन अभी तक तो ऐसा हुआ नहीं. हमारी एक एकड़ ज़मीन भी बची हुई है. या तो इसे भी ख़रीद लें या हमें दूसरी जगह ज़मीन दिलवा दें. इस ज़मीन पर अब खेती भी नहीं होती. टेलिंग के पानी से ख़राब हो गई है."

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    इसी टोले के पिथो मांझी बताते हैं, "जिस गांव में हमें बसाया जाना था, उस ग्राम सभा से कंपनी ने एनओसी ही नहीं ली है अब तक."

    टेलिंग पॉण्ड के साथ लगे डुंगरीडीह इलाके का हाल तो और बुरा है. साल 2008 और 2012 में टेलिंग पॉण्ड की पाइप फटने से रेडियोऐक्टिव कचरे वाला पानी लोगों के घरों में घुस गया था.

    लोगों ने बताया कि कंपनी ने उन्हें किसी और जगह बसाने के लिए लिखित समझौता किया था, लेकिन आज तक तो कुछ हुआ नहीं. बस एक पानी की टंकी उन लोगों के लिए वहां बना दी गई है जिससे उनकी रोज़मर्रा की ज़रूरतें पूरी होती रहें.

    इसके अलावा तुरामडीह टेलिंग पॉण्ड के पास चार टोले अब भी रह रहे हैं. मगर इस पूरे मामले पर यूसीआईएल का कहना है कि ये लोग यहाँ से ख़ुद ही नहीं जाना चाहते.

    इस इलाक़े में रेडिएशन के ख़तरों के प्रति लोगों को आगाह करने के लिए काम कर रही है संस्था 'झारखंडी आर्गेनाइज़ेशन अगेंस्ट रेडिएशन'. घनश्याम बिरूली इस संस्था के लिए काम करते हैं. उन्होंने ही मुझे रेडिएशन के भूत की कहानी सुनाई थी. उनकी संस्था ने 90 के दशक में यहां रेडिएशन की समस्या को उठाना शुरू किया था.

    अपनी मां को फेफड़ों के कैंसर की वजह से खो चुके बिरूली बताते हैं कि शुरुआत में यहां लोगों को बताया ही नहीं गया कि रेडिएशन से क्या ख़तरा हो सकता है.

    बिरूली कहते हैं, "यहां के आदिवासी लोगों के साथ ना सरकार नज़र आती है, ना पुलिस नज़र आती है और ना न्यायपालिका. हम जागरूक भी करते हैं लोगों को, लेकिन बेरोज़गारी बड़ी समस्या है. लोग कहते हैं कि रेडिएशन से बाद में निपटेंगे, पहले भूख से तो निपटें."

    घनश्याम बिरूली

    घनश्याम बिरूली

    लोगों में नाराज़गी

    लोग भी धीरे-धीरे उम्मीद खोते जा रहे हैं. आख़िर क्या वजह है कि बाहर के लोगों के लिए दिल खोल देने वाले आदिवासी लोग अब कैमरा देखते ही अपने दरवाज़े बंद कर लेते हैं?

    हमें बांगों गांव में जाने से मना किया गया जहां बहुत से विकलांग लोग रहते हैं. वजह बताई गई कि लोग अब चिढ़ने लगे हैं. यहां तक कि वे झारखंडी आर्गेनाइज़ेशन अगेंस्ट रेडिएशन संस्था के लोगों से भी नाराज़ हैं.

    भाटिन गांव में प्रभावित बच्चों के मां-बाप ने भी बात करने से मना कर दिया. उनका कहना था कि मीडिया को बताने से भी कुछ नहीं होता है.

    जादूगोड़ा में हम 45 साल की बुत्ती के यहां पहुंचे जिन्हें छह बार मरे हुए बच्चे पैदा हुए थे. बुत्ती ने अपनी कहानी तो बताई, लेकिन कैमरे पर बोलने से इनकार कर दिया.

    उन्होंने अपने कच्चे घर की ओर इशारा करते हुए कहा कि बहुत लोग पूछ कर जाते हैं, लेकिन हमारी ज़िंदगी में कोई बदलाव दिख रहा है क्या?

    हालांकि 60 साल की सलमा सोरेन कभी कैमरे की नज़र में नहीं आई थीं. वे फ़िलहाल ख़ुद किसी बीमारी से जूझ रही थीं जिसकी वजह से उनका शरीर स्थिर नहीं था. उन्होंने अपने पाँच मरे हुए बच्चे पैदा होने की कहानी बताई.

    बीबीसी ने 2006 में जादूगोड़ा में कुछ प्रभावित लोगों से मुलाक़ात की थी. इनमें से एक थे छतुआ दास जिनकी सात साल की बेटी शरीर और दिमाग़ से विकलांग थी, लेकिन उनसे मिलकर पता चला कि 2012 में उनकी बेटी की मौत हो गई.

    छतुआ दास बताते हैं कि उन्होंने 2009-10 में आस-पास के गांवों के विकलांग बच्चों की एक लिस्ट बनाई थी. इस लिस्ट में 100 से ज़्यादा बच्चों के नाम थे.

    बीबीसी की रिपोर्ट में एक और नाम था दुनिया उरांव और अलोवती उरांव का. ये दोनों भाई-बहन भी शरीर और दिमाग़ से विकलांग हैं. इनके पिता मरने से पहले यूसीआईएल में काम करते थे. जब हम उनके घर पहुंचे तो उनकी बड़ी बहन ने बात करने से इनकार कर दिया. उन्होंने वजह बताई कि उनके बड़े भाई अब यूसीआईएल में काम करते हैं.

    रेडिएशन से होते हैं ये नुक़सान

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    . रेडिएशन का सबसे ज़्यादा असर गर्भवती महिलाओं और बच्चों पर. गर्भपात, समय से पहले बच्चे होना या मरे हुए बच्चे पैदा होना रेडिएशन का नतीजा हो सकते हैं.

    . इससे कैंसर, ट्यूमर, मोतियाबिंद और आनुवांशिक बीमारियां हो सकती हैं.

    . व्हाइट ब्लड सेल्स को नुकसान हो सकता है. इससे रोगों से लड़ने की शक्ति प्रभावित होती है.

    . विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक 50-100 मिलीसीवर्ट के संपर्क से बच्चों में कैंसर का ख़तरा हो सकता है.

    . वैसे अमरीका के रेडिएशन सुरक्षा मानकों के हिसाब से किसी भी रेडिएशन डोज़ के संपर्क से ख़तरा हो सकता है.

    . विश्व परमाणु संगठन के हिसाब से साल में 100 मिलीसीवर्ट रेडिएशन के संपर्क से कैंसर का ख़तरा बढ़ जाता है.

    जितनी रिपोर्ट्स उतनी बातें
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    ये मामला सबसे पहले 90 के दशक में सामने आया जब सिंहभूम ज़िला बिहार में था. बिहार विधान परिषद की पर्यावरण कमेटी ने जादूगोड़ा जाकर दिसंबर 1998 में अपनी रिपोर्ट पेश की.

    रिपोर्ट में कहा गया कि यूसीआईएल के टेलिंग पॉण्ड में जो यूरेनियम का कचरा डाला जाता है, उससे आस-पास के आदिवासी लोगों की सेहत पर असर पड़ रहा है. बिहार सरकार की मेडिकल टीम ने भी वहां का दौरा किया और यही पाया.

    कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में सुझाव दिए कि टेलिंग पॉण्ड और माइन के पाँच किलोमीटर के दायरे में रहने वाले लोगों को वहां से कहीं और बसाया जाए. यूरेनियम कचरे को ट्रीटमेंट प्लांट में पाइपलाइन से ले जाया जाए और माइनिंग साइट के बाहर चेतावनी के बोर्ड भी लगाए जाएं.

    इससे पहले ख़ुद यूसीआईएल के तत्कालीन डायरेक्टर केके बेरी ने सिंहभूम के डिप्टी कमिश्नर को लिखा था कि उनकी मेडिकल टीम ने 54 लोगों की जांच की है और उनमें से कोई रेडिएशन से प्रभावित नहीं है. हालांकि उसी रिपोर्ट में ये भी लिखा था कि इस स्टेज पर इन लोगों की बीमारियों को रेडिएशन से जोड़ कर भी नहीं देख सकते और ना अलग करके देख सकते हैं.

    इसके बाद 2004 में जापान की क्योटो यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता डॉक्टर हीरोआकी कोडे ने अपनी जांच रिपोर्ट में बताया कि जादूगोड़ा में यूरेनियम माइनिंग से रेडिएशन फैला है.

    आस-पास के गांवों में रेडिएशन की सीमा एक मिलीसीवर्ट/वर्ष से ज़्यादा थी और टेलिंग पॉण्ड के आस-पास 10 मिलीसीवर्ट/वर्ष से ज़्यादा. इसके अलावा हवा में ख़तरनाक रेडोन गैस का स्तर भी ज़्यादा था जो टेलिंग पॉण्ड से फैल रहा था.

    इसी रिपोर्ट के मुताबिक यूरेनियम प्रोडक्ट (येलो केक) को राखा माइन स्टेशन से लापरवाह तरीके से भिजवाया गया जिससे आस-पास के इलाकों में रेडिएशन फैला.

    इसके बाद 2007 में इंडियन डॉक्टर्स फ़ॉर पीस एंड डेवेलपमेंट ने जादूगोड़ा के क़रीब 2000 परिवारों की जांच की और पाया कि माइन के आस-पास रहने वाले लोगों की सेहत बुरी तरह प्रभावित थी. मौत का सबसे बड़ा कारण कैंसर था.

    कोलकाता के जादवपुर विश्वविद्यालय ने 2008 में अपना रिसर्च पेश किया जिसमें पाया गया कि जादूगोड़ा की सुवर्ण रेखा नदी माइनिंग की वजह से प्रदूषित हो रही है. इसी विश्वविद्यालय की 2015 की रिपोर्ट में पाया गया कि नदी के आस-पास की ज़मीन भी प्रदूषित थी जिसका असर लोगों की सेहत पर भी पड़ रहा था.

    यूसीआईएल की स्वास्थ्य और शिक्षा 'सुविधा'
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    यूसीआईएल कहती है कि यहां पर उन्होंने तीन स्कूल और तीन अस्पताल बनवाए हैं. साथ ही लोगों की सुविधा के लिए सामुदायिक चिकित्सा केंद्र भी है, जहाँ मेडिकल कैंप लगाए जाते हैं.

    हमारी नज़र चाटीकोच्चा में ऐसे ही एक सामुदायिक चिकित्सा केंद्र पर पड़ी जिसकी बाहरी दीवार पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था- 'यूसीआईएल के सौजन्य से'.

    मगर ये केंद्र किसी स्टोर रूम की तरह इस्तेमाल किया जा रहा था.

    वहां रहने वाले लोगों से पता चला कि पहले तो महीने में एक बार डॉक्टर आते थे, लेकिन पिछले दो साल में तो कोई नहीं आया है.

    बागजाता माइन्स में काम करने वाले कांट्रैक्ट मज़दूरों ने बताया कि पिछले चार साल से उनके गांव में कोई मेडिकल कैंप नहीं लगा है.

    उन्होंने बताया कि उन्हें स्कूल के बदले ही स्कूल मिला है क्योंकि बागजाता माइन्स परिसर में माइनिंग शुरू होने से पहले एक स्कूल था जिसके बदले बाहर एक स्कूल बना दिया गया.

    डुंगरीडीह में रहने वाले लोग ज़्यादातर कांट्रैक्ट मज़दूर हैं. वहां भी उन्होंने बताया कि यूसीआईएल के स्कूल उनके स्थाई कर्मचारियों के बच्चों के लिए ही हैं.

    यूसीआईएल ने भी मुझे बताया कि यूं तो उनके स्कूलों में कोई भी पढ़ सकता है, लेकिन इन स्कूलों में दाख़िले के लिए कुछ मापदंड हैं.

    अगर कंपनी की नौकरी चली जाए...

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    34 साल के सागर बिसरा ने तुरामडीह माइन्स में 2007 में स्थाई कर्मचारी के तौर पर काम शुरू किया था.

    उनके परिवार ने 15 एकड़ ज़मीन माइनिंग प्रोजेक्ट के लिए बेची थी. इसके बदले में उन्हें मुआवज़ा भी मिला और परिवार में छह नौकरियां भी.
    चूंकि वे स्थाई कर्मचारी थे, इसलिए उन्हें रहने के लिए क्वार्टर भी मिला और बाकी सुविधाएं भी.

    उनका आरोप है कि जब उनकी मज़दूर यूनियन 'झारखंड क्रांतिकारी' कंपनी के रवैये के ख़िलाफ़ सक्रिय होने लगी तो 2013 में उन्हें नोटिस देकर काम से निकाल दिया गया. उनके साथ एक और कर्मचारी के ख़िलाफ़ भी कार्रवाई हुई.

    इसके बाद उन्हें अपना क्वार्टर भी छोड़ना पड़ा और ज़मीन तो वो पहले ही अपनी कंपनी को दे चुके थे. उन्होंने बताया कि ज़मीन बेचने वाले लोगों को हेल्पर के तौर पर रखा जाता है और 2013 तक उनकी तनख़्वाह 9000 के क़रीब थी जिसे 2013 में 17 हज़ार कर दिया गया.

    उनका सात साल का बेटा शरीर और दिमाग़ से विकलांग है. उनका मानना है कि टेलिंग पॉण्ड और माइन के आस-पास रहने से शायद उनके बेटे पर असर हुआ हो.

    वहीं तुरामडीह माइन में काम करने वाले एक स्थाई कर्मचारी की पत्नी शांतिलता ने बताया कि उन्हें भी पाँच बार गर्भपात हुआ. डॉक्टरों को भी वजह समझ नहीं आई थी.

    वो बताती हैं कि पहले तुरामडीह टेलिंग के बीच से ही गुज़र कर लोगों को जाना होता था और शायद रेडिएशन का असर ही उनके गर्भपात की वजह रही हो. इसके अलावा उनके परिवार में एक और बच्ची विकलांग पैदा हुई.

    अस्थाई मज़दूरों के लिए स्थाई कुछ भी नहीं

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    वैसे यहाँ के लोगों के लिए सिर्फ़ रेडिएशन ही मुश्किल का सबब नहीं है. माइन्स में काम करने वाले मज़दूर बुनियादी सुविधाओं का मसला भी उठाते हैं.

    मज़दूर गणेश हेंब्रम के घर कई लोग थे, लेकिन सन्नाटा पसरा हुआ था. उनके घर वालों को उनके शव का इंतज़ार था जो अभी पोस्टमॉर्टम के लिए अस्पताल में ही था.

    एक दिन पहले ही बागजाता माइन्स में खुदाई के दौरान गणेश और मातू हांसदा की मौत हो गई थी.

    स्थानीय अख़बारों की रिपोर्ट में लिखा था कि कांट्रैक्ट मज़दूरों ने लूज गिरने की आशंका जताई थी, लेकिन फिर भी उन्हें वहां ज़बरदस्ती भेजा गया.

    न्यूक्लियर इंडस्ट्री पर कई सालों से काम रहे पत्रकार कुमार सुंदरम ने बताया कि 2016 में भी एक कांट्रैक्ट मज़दूर सोनाराम किसकु की अपने दो साथियों के साथ तुरामडीह माइन के अंदर मौत हो गई थी.
    उन्होंने बताया कि मज़दूरों को रेडियोऐक्टिव कचरे को हाथों से निकालने का काम दिया गया था जिसे मशीन से निकाला जाना चाहिए था. जिस कांट्रैक्टर ने उसे काम पर लगाया था, एक आरटीआई से पता चला कि उसका लाइसेंस भी ख़त्म हो गया था.

    यूसीआईएल कंपनी में 2500 के क़रीब अस्थाई मज़दूर काम करते हैं. कंपनी ने एक ज़रूरी और ख़तरनाक काम के लिए मज़दूरों की ज़िंदगी को ठेके पर दे दिया है.

    भारत के लेबर क़ानून के मुताबिक अगर कोई काम लंबे समय के लिए है और किसी इंडस्ट्री के लिए ज़रूरी है तो वहां कांट्रैक्ट लेबर का इस्तेमाल नहीं होना चाहिए.

    लेकिन इसी क़ानून के मुताबिक किसी काम में कांट्रैक्ट लेबर का इस्तेमाल होगा या नहीं, इसका आख़िरी फ़ैसला भी सरकार के हाथ में दे दिया है.

    यूरेनियम का खनन लंबे समय से हो रहा है. लोकसभा में सात मार्च को अपने जवाब में राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह ने बताया था कि यूसीआईएल अगले 15 साल में यूरेनियम खनन 10 गुना बढ़ाने वाली है. तो फिर अस्थाई मज़दूर क्यों?

    बागजाता माइन्स में 10 साल से अस्थाई मज़दूर के तौर पर काम कर रहे रूपाई हांसदा ने बताया कि कंपनी के स्थाई और अस्थाई मज़दूरों की हालत में काफ़ी अंतर है.

    "स्थाई और अस्थाई मज़दूर दोनों ही ड्रिलिंग और ब्लास्टिंग करते हैं, लेकिन दोनों की तनख़्वाह में बहुत अंतर है. उन्हें मेडिकल इंश्योरेंस मिलता है, हमें नहीं. उनके लिए घर है, बच्चों के लिए स्कूल है, लेकिन हमारे लिए नहीं."
    यूसीआईएल में काम करने वाले अस्थाई मज़दूर सरकार की तय की गई न्यूनतम दिहाड़ी पर ही काम करते हैं.

    आज भी लोग पड़ रहे हैं बीमार

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    जल जंगल ज़मीन संस्था ने 2016 और 2017 में जादूगोड़ा में तीन मेडिकल कैंप लगाए. इन कैंपों में 206 मरीज़ आए जिनमें से 175 कई तरह की बीमारियों से पीड़ित थे.

    इस संस्था की कार्यकर्ता रूबिया मोंडल कहती हैं कि समस्या को समस्या ही जब तक नहीं मानेंगे तो इलाज कैसे होगा.
    "रेडिएशन से इन बीमारियों को सीधे तौर पर नहीं जोड़ा जा सकता, लेकिन इनकार भी नहीं किया जा सकता."

    यूसीआईएल की सफ़ाई
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    यूसीआईएल के सीएमडी ए के असनानी से बीबीसी ने इंटरव्यू के लिए दो बार लिखा, लेकिन उनका जवाब आया कि अभी उन्हें इसकी इजाज़त नहीं मिली है.

    फिर भी जादूगोड़ा जाने के बाद हमने यूसीआईएल के अधिकारियों से बात करने की कोशिश की और उनके दफ़्तर पहुंच गए.
    वहां फ़ोन या कैमरा ले जाने की इजाज़त नहीं थी और इसलिए कोई वीडियो इंटरव्यू नहीं हो सका.

    लेकिन अधिकारियों ने सभी सवालों के जवाब देने की कोशिश की.
    उनका कहना था कि भारत की न्यूक्लियर पावर के ख़िलाफ़ सक्रिय लॉबी ही इस तरह की अफ़वाहें उड़ा रही है.

    उन्होंने कहा कि जादूगोड़ा पर भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर की रिपोर्ट कहती है कि लोगों में बीमारियां रेडिएशन के कारण नहीं हैं. अगर यहां रेडिएशन है भी तो वह ख़तरनाक स्तर पर नहीं है.

    कंपनी के हिसाब से लोगों के रहन-सहन और कुपोषण की वजह से ये बीमारियां फैली हैं.

    उन्होंने बताया कि यहां पर कंपनी ने तीन स्कूल और तीन अस्पताल भी खोले हैं.

    विश्व स्वास्थ्य संगठन चुप क्यों?

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    विश्व स्वास्थ्य संगठन रेडिएशन की समस्या पर स्वतंत्र रूप से बोल नहीं सकता और ना ही जांच में अपनी भूमिका निभा सकता है.

    इसका कारण संयुक्त राष्ट्र की अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) और विश्व स्वास्थ्य संगठन के बीच 1959 में हुआ एक समझौता है.

    नोबेल पुरस्कार विजेता 'इंटरनेशनल फ़िज़िशियन्स फ़ॉर प्रिवेंशन ऑफ़ न्यूक्लियर वॉर' संस्था ने रेडिएशन के बारे में लोगों को सही जानकारी ना देने के लिए इन दोनों संस्थाओं की आलोचना की है.

    अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी ने भारत की अपनी रिव्यू रिपोर्ट में कहा था कि भारत को न्यूक्लियर सुरक्षा और रेडियोऐक्टिव कचरा प्रबंधन पर एक राष्ट्रीय नीति बनाने की ज़रूरत है. साथ ही इमरजेंसी के वक्त बेहतर इंतज़ाम करने की ज़रूरत है.

    सवाल जो बाकी हैं ...

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    अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी ने आम लोगों के लिए रेडिएशन सीमा रखी है एक मिलीसीवर्ट/वर्ष और परमाणु उद्योग में काम करने वाले मज़दूरों के लिए ये सीमा 20 मिलीसीवर्ट/वर्ष है. ये अंतर क्यों?

    यूसीआईएल कंपनी अगर माइन में काम करने वालों का रेडिएशन एक्सपोज़र मापती है तो वे नतीजे सामने क्यों नहीं रखे जाते?

    लोगों पर रेडिएशन के बुरे प्रभाव की पड़ताल आख़िर राष्ट्रीय सुरक्षा का विषय कैसे है?

    इतनी सारी जाँच रिपोर्ट आने के बाद भी टेलिंग पॉण्ड के आस-पास के लोगों को कहीं और क्यों नहीं बसाया गया?

    परमाणु ऊर्जा का मामला प्रधानमंत्री दफ़्तर के तहत आता है पर अगर रेडिएशन से लोग प्रभावित हो रहे हैं तो एक स्वतंत्र जांच का आदेश प्रधानमंत्री दफ़्तर क्यों नहीं देता है?

    क्या लोगों का स्वास्थ्य राष्ट्रीय सुरक्षा का विषय नहीं है?

    किसी ख़तरनाक काम के लिए पहले ही सुरक्षा के सभी नियमों का पालन क्यों नहीं किया गया?

    क्यों अस्थाई मज़दूरों का इस्तेमाल अब तक जारी है?

    ०००

    रिपोर्टर: सर्वप्रिया सांगवान
    फ़ोटो: शुभ्रजीत सेन
    डिज़ाइनर: गगन नरहे
    कैमरा व एडिट: देबलीन रॉय
    शॉर्टहैंड: शादाब नज़मी

    सभी तस्वीरें सर्वाधिकार सुरक्षित