क्या काग़ज़ का टुकड़ा किसी की जान ले सकता है?
लोअर असम के बाक्सा ज़िले के एक गांव का सूखता तालाब. इसी तालाब किनारे अपने घर के बाहर रूखे चेहरे के साथ माबिया बीबी बैठी हैं.
माबिया कहती हैं, 'पति अच्छा ख़ासा खा-पीकर घर से निकला.एनआरसी लिस्ट देखी तो अपना नाम नहीं मिला. उसे तभी दिल का दौरा पड़ा और वो वहीं मर गया.'

माबिया बीबी
माबिया बीबी की ही तरह एक परिवार बिनय चंद्र का है.
पॉलिथीन से अपने बेटे की तस्वीर और काग़ज़ निकालती बिनय की मां. इन तस्वीरों के खींचे जाने और काग़ज़ों के इकट्ठा होने के बीच ही बिनयचंद्र ने दुनिया को अलविदा कह दिया.
बिनयचंद्र की बूढ़ी मां यही मानती हैं कि 'बिनयचंद्र की जान एनआरसी में नाम न आने से गई.'
कुछ महीने पहले नदी किनारे पेड़ से लटकी अपने बेटे की लाश को इस मां ने देखा था. अपनों को गंवा चुके परिवार चाहे कुछ भी कहें, प्रशासन इन 'मौतों के लिए एनआरसी को ज़िम्मेदार नहीं' मानता है.

बिनय चंद्र की मां शांति
ऐसे कई परिवारों की बातों पर यक़ीन करें तो असम में ये 'जानलेवा' काग़ज़ का टुकड़ा बेहद अहम है.
ये दो कहानियां प्रतीक भर नहीं हैं. ये अतीत में हुई उन क्रियाओं को दिखाती हैं, जिनकी प्रतिक्रियाएँ बीते 68 साल से लगातार असम को भोगनी पड़ रही हैं.
इस काग़ज़ के टुकड़े की अहमियत समझने के लिए हमें ऐसे अतीत में झांकना होगा, जिसमें हज़ारों लोगों का खून बहा है और लाखों लोग बेघर हुए हैं.

1971 में एक बांग्लादेशी शरणार्थी
1971 में बांग्लादेश बनने तक शरणार्थियों का भारत आना जारी रहा. तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को भारत से लेकर अमरीका तक शरणार्थियों के मुद्दे पर तीखे सवालों का सामना करना पड़ा.
तब इंदिरा गांधी ने कहा था, ''पानी सिर के ऊपर से बह रहा है. हर धर्म के शरणार्थियों को लौटना होगा. इन शरणार्थियों को हम अपनी आबादी में नहीं मिलाएंगे.''
इस बयान का ज़मीन पर असर यूएनएचसीआर की इस रिपोर्ट से लगाइए. इसके मुताबिक़, हर रोज़ क़रीब दो लाख 10 हज़ार लोग सरहद पार कर बांग्लादेश लौट रहे थे. फरवरी 1972 तक ये संख्या 90 लाख पार कर गई.
हालांकि असम में बाहरियों को लेकर अब तक चली सबसे बड़ी लड़ाई अभी शुरू होनी बाकी थी.

रंगघर
साल 1979. बाहरियों को खदेड़ने की लड़ाई दो मोर्चे पर शुरू हुई. पहला मोर्चा ऑल असम स्टूडेंट यूनियन यानी आसू और ऑल असम गणसंग्राम परिषद का.
दूसरा मोर्चा सिवसागर के रंगघर से शुरू हुए यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम यानी उल्फ़ा का, जिसने आने वाले सालों में खूनी लड़ाई लड़ी. उल्फ़ा की प्रमुख मांगों के केंद्र में भी बाहरियों को खदेड़ना था.
1979 से शुरू हुआ असम आंदोलन आने वाले सालों में सैकड़ों लोगों की जान का दुश्मन बना. 1983 में असम के नेल्ली में हुए नरसंहार में सैकड़ों लोगों की जान गई.

1985 में राजीव गांधी असम समझौते के वक़्त
असम समझौते के तहत...
+ असम में रहने वाले विदेशियों का नाम रजिस्टर से हटाना
+ 25 मार्च 1971 के बाद असम आए लोगों का पता लगाना और बाहर करना
+ धारा-6 में असम की सुरक्षा और भाषाई, संस्कृति पहचान की बात की गई
इस आंदोलन से निकली असम गण परिषद प्रफुल्ल कुमार महंत के नेतृत्व में सरकार बनाने में सफल रही. लेकिन सालों साल घुसपैठ के मुद्दे पर कुछ नहीं हुआ.
2009 में सुप्रीम कोर्ट में एनआरसी को लेकर याचिका दायर की गई. 2010 में पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर एनआरसी प्रक्रिया असम के बारपेटा में शुरू तो हुई लेकिन हिंसक घटनाओं के बाद इसे रोक दिया गया.
साल 2013-14 में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद एनआरसी की प्रक्रिया फिर शुरू होती है. राज्य में कांग्रेस की तरुण गोगोई सरकार थी, जो आने वाले कुछ महीनों में जाने वाली थी.
असम की फिज़ाओं में नया रंग आने वाला था और एनआरसी की जारी लिस्टों से असमिया जिन राहतों को महसूस करने वाले थे, उसे एक नया प्रस्तावित काग़ज़ का टुकड़ा बेचैनियों में बदलने वाला था.
कौस्तुभ डेका जेएनयू से लेकर हॉर्वर्ड यूनिवर्सिटी में पढ़ाई कर चुके हैं.
कौस्तुभ के पिता डिब्रूगढ़ यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर रह चुके हैं.
डिब्रूगढ़ यूनिवर्सिटी में पॉलिटिक्ल साइंस के प्रोफ़ेसर कौस्तुभ मानते हैं,
''बीजेपी अपनी एक ऐसी छवि पेश करती रही है जो हिंदुओं के हित की बात करती है और घुसपैठियों को लेकर बहुत गंभीर है. असम में बीजेपी को ऐसा देखा जाता है कि वो डिलीवर कर सकती है. कांग्रेस और एजीपी से लोगों को ऐसी उम्मीदें नहीं हैं.''

प्रोफ़ेसर कौस्तुभ डेका
कौस्तुभ एनआरसी से मिली राहतों का ज़िक्र करते हैं, ''अपर असम में लोअर असम से काफी मज़दूर आ जाते थे. वहां भू-कटाव काफी होता है. ये लोग बंगाली होते हैं. सालों से ये लोग ऊपरी असम आते हैं. ऐसे लोगों से सांस्कृतिक मतभेद होते हैं. एनआरसी ने ऐसे लोगों को राहतें दी हैं.''
बीजेपी का बहुप्रचारित नागरिकता संशोधन बिल फिलहाल राज्यसभा में लटका है. लेकिन बीजेपी कहती रही है कि चुनावों बाद इस बिल को लाया जाएगा.
इस बिल में मुस्लिमों को शामिल न किए जाने और भारत में रहने की सीमा को 11 से घटाकर छह साल करने की सबसे ज़्यादा चर्चा है. लेकिन ये चर्चाएं अलग-अलग सियासी पार्टी में अपने हिसाब से की जा रही हैं.

असम के सीएम सर्बानंद सोनोवाल और पीएम नरेंद्र मोदी
सर्बानंद सोनोवाल अपने शुरुआती जीवन में ऑल असम स्टूडेंट यूनियन (आसू) के अध्यक्ष रह चुके हैं. बीजेपी में आने से पहले वो एजीपी में भी रहे थे. लेकिन मुख्यमंत्री की कुर्सी मिलने के बाद वो आसू और एजीपी से एकदम विपरीत दिशा में जाते हुए दिखते हैं.
सीएम सर्बानंद के कैब को लेकर रवैये पर आसू में नाराज़गी है. गुवाहाटी में आसू का कार्यालय शहीद भवन का एक कमरा.

समुज्जल भट्टाचार्य
आसू के मुख्य सलाहकार समुज्जल भट्टाचार्य कहते हैं, ''हालात काफी बिगड़े गए हैं. अवैध घुसपैठ की वजहसे बांग्लादेशी किंगमेकर की भूमिका में आ गए हैं. अच्छी बात ये है कि एनआरसी शुरू हो गया है. एनआरसी असम समझौते का हिस्सा है लेकिन कैब इसका उल्लंघन करता है. कैब एक कम्युनल बिल है. भारत में धर्म के आधार पर नागरिकता नहीं दी जा सकती. 1971 के बाद घुसपैठियों का पूरा बोझ अकेले असम ढो रहा है. असम अवैध बांग्लादेशियों का डंपिंग ग्राउंड नहीं है.''
भट्टाचार्य कहते हैं, ''एक विदेशी सिर्फ़ विदेशी है. घुसपैठिया सिर्फ़ घुसपैठिया है. फिर चाहे वो हिंदू हो या मुस्लिम. बातवैध और अवैध की है. हिंदू और मुस्लिम दोनों बांग्लादेशी असम के लिए खतरा है.''
लेकिन कौन वैध है और कौन अवैध. इसकी परिभाषा असम में हर सरकार के हिसाब से बदलती रहती है.

बदरुद्दीन अजमल
इसकी एक परिभाषा एआईयूडीएफ के बदरुद्दीन अजमल की भी है. इत्र के कारोबारी बदरुद्दीन अजमल से हमारी मुलाक़ात बिलासीपारा के एक गांव में देर रात होती है.
मंच पर बदरुद्दीन बोलना शुरू करते हैं, भीड़ एकटक सिर्फ़ अपने नेता को देख रही होती है. तभी कुछ बच्चे मेज़ पर रखे अँगूर देखने लगते हैं.
अजमल अपना भाषण बीच में रोककर बच्चों को अंगूर देते हैं और लगभग चिल्लाते हुए भीड़ से एक सवाल तीन बार पूछते हैं, 'क्या हम लोग बांग्लादेशी हैं?...'

बदरुद्दीन अजमल
भीड़ का जवाब पाकर बदरुद्दीन उस मंच से नीचे उतरकर हमसे बात करते हैं.
''सुप्रीम कोर्ट अगर दखल न देती तो बीजेपी यहां के 70-80 फीसदी लोगों को बांग्लादेशी बना देती. जिन लोगों का नाम नहीं आया है, उनका जल्द आ जाएगा. कुछ लोग शायद बाकी रह जाएंगे. कैब की बात करूं तो आपके पानी का रंग सफेद था. लेकिन जब आप उसमें गुलाबी रंग डाल देंगे तो एक पुराना रंग बदल जाएगा. ये बीजेपी-आरएसएस करना चाह रही है. असमिया ज़ुबान वाले और मुसलमान इसे बिलकुल पसंद नहीं कर रहे हैं. ये बात मज़हब के ख़िलाफ़ है.''
इस सभा में बदरुद्दीन के बोलने से पहले एक महिला बांग्ला में एनआरसी में डी-वोटर के लिए कांग्रेस को ज़िम्मेदार ठहरा रही थी.

तरुण गोगोई
कांग्रेस को लेकर नाराज़गी आम लोगों में भी देखने को मिलती है. इसमें एनआरसी और विकास कार्यों में हुई देरी सबसे अहम है.
गुवाहाटी के अपने घर पर दिन में की प्रेस कॉन्फ्रेंस और लोगों से मुलाक़ात के बाद थके हाल में राज्य के पूर्व सीएम तरुण गोगोई एनआरसी को रद्दी का काग़ज़ बताते हैं.
''एनआरसी को वैल्यूलेस पेपर बना दिया है. एनआरसी एक रद्दी का कागज़ बनकर रह गया है. कैब असम के लिए एक ऐसा जुमला है, जो ख़तरनाक है. बांग्लादेश में कहां लोगों को मारा जा रहा है? पाकिस्तान में भी ऐसी कोई बात नहीं हो रही है. फिर इस बिल को लाने की क्या ज़रूरत है.''
'विस्तार है अपार...प्रजा दोनों पार...करे हाहाकार..'
भूपेन हज़ारिका का ये गाना असम की मौजूदा हालत को बयान करता है.
भूपेन हज़ारिका को भारत रत्न देकर कांग्रेस के ख़िलाफ़ प्रचार करने वाली बीजेपी, तब मुश्किल में नज़र आई जब कैब को लेकर नाराज़गी हज़ारिका के परिवार की तरफ़ से भी ज़ाहिर की गई.

बैकुंठ नाथ गोस्वामी
लेकिन कैब की आड़ में हिंदुत्व की ज़मीन मज़बूत करती बीजेपी ने इसकी फ़िक़्र नहीं की.
ये नज़रिया देने वाले वरिष्ठ पत्रकार बैकुंठ गोस्वामी कहते हैं, ''बीजेपी ये छवि बनाना चाहती है कि हिंदुओं के लिए दरवाज़ा खुला है. चाहे फिर वो कहीं भी हों. इंडिया के वोटर्स में बीजेपी ये भरोसा पैदा करना चाह रही है कि बीजेपी हमारे समुदाय की फ़िक़्र करती है. नेहरू ने भारत की जो सेक्यूलर छवि बनाई थी, कैब के आने से इस छवि को सबसे ज़्यादा नुकसान होगा.''
अगर कैब आता है तो बांग्लादेशी हिंदुओं की संख्या असम में बढ़ सकती है और असमिया लोग कम हो सकते हैं. असमिया अभी राज्य की भाषा है. असम के लोगों का डर ये है कि कैब आने से उनकी भाषा, संस्कृति न खो जाए.
कैब का फ़ायदा बीजेपी को बाकी राज्यों में भी मिल सकता है.
इसी क्रम में गोस्वामी कहते हैं, ''कैब का असर बाकी राज्यों पर भी होगा. पश्चिम बंगाल में इसका सबसे ज़्यादा असर होगा. चुनावों में बीजेपी को इस असर का फायदा भी होगा. बांग्लादेश से आए बंगालियों का वोट बीजेपी को मिलेगा. मानिए कि 1971 के बाद एक हिंदू और एक मुस्लिम भारत में घुसा. कैब के आने से हिंदू को नागरिकता मिल जाएगी लेकिन मुस्लिम को नहीं मिलेगी. हिंदू बांग्लादेशी को इससे राहत मिलेगी.''
कैब की पूरी बहस में सुई जब हिंदुओं पर आकर टिक गई है,तब बीजेपी के थिंक टैंक और हिंदुत्व की बात करने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का इस पर क्या कहना है?

गौरीशंकर चक्रवर्ती
ये समझने की कोशिश में हम डिब्रूगढ़ में संघ की एक शाखा में सुबह छह बजे गए. लाठी से अभ्यास और संघ की प्रार्थना के बीच कुछ लोग ऐसे भी थे,जिनकी आंखों में नींद इस कदर थी कि वो सावधान मुद्रा में भी विश्राम करते नज़र आए.
आरएसएस प्रचारक गौरीशंकर चक्रवर्ती कहते हैं, ''संघ का मानना है कि जो हिंदू मूल के लोग अगर कहीं से सताए जाने के बाद भारत आते हैं तो उन्हें शरण देनी चाहिए. पाकिस्तान और बांग्लादेश एक इस्लामिक देश है. इन देशों से आने वाले मुसलमानों के पास भारत आने की कोई वजह नहीं है. या तो कुछ कमाने के लिए आते हैं या कुछ डिजाइन से आते हैं. ये लंबी बात हो जाएगी. देश विभाजन के सबसे बड़े कारीगर जिन्ना ने कहा था कि असम को एक सिल्वर प्लेटर में पूर्व पाकिस्तान को भेंट करेंगे. इसलिए कैब में किसी मुसलमान को नहीं आना चाहिए. इन लोगों के धर्म पर कोई हमला नहीं हुआ है.''
डिब्रूगढ़ से चलते हुए कई पड़ावों के बाद हम उस दिशा में बढ़ते हैं, जिस दिशा से आए लोगों का ख़तरा असमिया लोगों को महसूस होता है. बांग्लादेश बॉर्डर से सटा धुबरी.
बाक्सा से धुबरी की तरफ जाने पर रास्ते में बाज़ार में नीले रंग की लुंगियां बिकती हैं. अपर असम के सिवसागर में इत्र का कारोबार करने वाले मोइनुद्दीन की बात याद आती है.
उधर लोअर असम में लोग लुंगी पहनता है. खूब सारा शादी करता है और ज़ोर-ज़ोर से बोलता है.
कैब को लेकर कई ज़रूरी शर्ते हैं. इनमें शरणार्थी की परिभाषा पर खरा उतरना और ज़रूरी दस्तावेज़ को पूरा पाने पर राज्य सरकार का नागरिकता देने की सिफारिशें भी शामिल हैं.
लेकिन कैब अगर आया तो बंगाली हिंदुओं की आबादी बढ़ सकती है. ऐसे में कैब पर धुबरी के बंगाली हिंदू परिवार का क्या सोचना है.
खोखनचंद कहते हैं, ''ये अच्छा हो रहा है.मुस्लिमों को तो ऐसे ही छोड़ देना चाहिए था. वो सब तो बांग्लादेश से आकर कांग्रेस की वजह से भारत का नागरिक बन गया है. लेकिन हिंदुओं को सालों से भारत में रहने परभी बांग्लादेशी बोल देते हैं. मुस्लिम अगर ज़्यादा होंगे और हिंदू कम होंगे तो दिक्कत तो होगा ही. दंगा वगैरह हुआ तो डर ही तो लगेगा.''

खोखनचंद
कैब की वजह से आए हिंदुओं को खोखनचंद ख़तरा नहीं मानते हैं.
'हिंदू के आने से कोई ख़तरा नहीं होगा, मोदी सरकार सबदेख रहा है.' कहकर खोखनचंद मुस्कुरा देते हैं.
खोखनचंद की कॉलोनी से कुछ दूरी पर एक मुस्लिम बहुल कॉलोनी है. वहां के मुस्लिमों का कैब पर क्या रुख है, ये जानने के लिए जब हम वहां गए तो एक जनाज़ा निकल रहा था. पीछे सैकड़ों लोगों की भीड़ थी. कॉलोनी खाली थी.
धुबरी की इसी कॉलोनी से थोड़ी दूरी पर ब्रह्मपुत्र बांग्लादेश चली जाती है. लेकिन इसके किनारे बसे लोगों के बीच एनआरसी-कैब को लेकर कम-ज़्यादा डर वहीं कायम रहता है.











